मैं देश बचाने आया हूं

मैं देश बचाने आया हूँ।पहन वर्दी और बांध तिरंगा सिर पे,वतन की रक्षा के लिए, निकल पड़ा हूँ घर से।होली दीवाली,ईद मुहर्रम वतन के साथ मनाने आया हूँ,दूर रहो ऐ देश के दुश्मनों, मैं देश बचाने आया हूँ।दुश्मनों का मुंह काला होगा, जिस देश का ऐसा रखवाला होगा।ना झुकेगा ये सर दुश्मनों के आगे,लहू से मातृभूमि को सींचने आया हूँ ।दूर रहो ऐ देश के दुश्मनों ,मैं देश बचाने आया हूँ।हिमालय की तरह अटलऔर, गंगा जैसी सोच है निर्मलतेरे जैसे तूफानों के आगे ,मैं चट्टान बनकर आया हूँ।वार करूँगा तो सीने पे,न पीठ पर खंजर मारने आया हूँ,गोली बारूदों की बौछारों से ,मैं ना घबराने आया हूँदूर रहो ऐ देश के दुश्मनों, मैं देश बचाने आया हूँ।घबरा गया मेरे हौसले से ,निहत्था देखकर वार कियाशर्म नहीं तेरे आँखों में ,जो मानवता का संहार किया। खून से लतपथ पड़ा हूँ भूमि पर ,भारत माँ को आखिरी सलाम किया।ऐ मातृभूमि तेरे एहसानों का मैं ,कर्ज चुकाने आया था।वापस आने का वादा मैं माँ से ,वादा करके आया था।ना भूलना मेरी शहादत साथियों ,मैं देश बचाने आया थातेरी इंतज़ार की घड़ियां खत्म हुई अब,मैं अपना वादा निभाया हूँदेख तिरंगे को माँ मैं ,कफ़न बनाकर लाया हूँ।दूर रहो ऐ देश के दुश्मनों, मैं देश बचाने आया हूँ। स्वाति सौरभ

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