बेवड़ा:-विजय

जीने भले तू कम दे
पीने हमे तू रम दे
बेरंग हो गई है सुबह
रंगीन शाम तो होने दे

अब हमें आज़ाद होने दे
खुल के दो बात कहने दे
कब से था गला ये सूखा
सोमरस से इसे तर जाने दे

अब जो होता है होने दे
कोरोना को मरने,मारने दे
लाश जैसे रहते है हम यहाँ
पीकर जीने का भ्रम हो जाने दे

व्यवस्थाओं को अब टूटने दे
बोतलों को हमे अब लूटने दे
राजकोष खाली जो है पड़ा
हम बेवड़ो को उसे भरने दे

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