दुनिया हमारी

“दुनिया हमारी”मतलब-बेमतलब की दुनिया ये सारी,मेहनत मजदूरी से चलती दुनिया हमारी;लेखा जोखा नहीं आने वाले कल का,आज का जुगाड़ लगाती दुनिया हमारी;जानें कित्ती ऊँची इमारतें बनाई हमनें,झुग्गी में साहब बसती दुनिया हमारी;महँगे पकवानों का बस नाम सुना हमनें,राशन की कतारों में रेंगती दुनिया हमारी;ऊँची तालीमें कहाँ नसीब हम बेचारों को,मिड डे स्कूल पार लगाती दुनिया हमारी;बेशक़ फुटपाथ बने है चलने को तुम्हारे,रोज़ी रोटी वहां से कमाती दुनिया हमारी;विथ-विथाउट चीज़ का रिवाज़ नहीं पता हमें,एक टेम की रोटी से मुस्कुराती दुनिया हमारी;✍️अब्दुल्लाह क़ुरैशी

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