कविता_ “राजनीति में आजकल”

राजनीति में आज़कल, चला नया रिवाज़ है,सत्ता की मुख़ालफ़त, देशद्रोह का अपराध है;ना बोलो गर कुछ भी, बेख़बरी का लगता इल्जाम है,निकला जो इक लफ्ज़ भी, ‘रासुका’ लगने को तैयार है;कौन, किसे, अब क्या ही कहें!जम्हूरियत में, फ़ैशन अब यह आम है।_©✍️अब्दुल्लाह क़ुरैशी

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