इंतेहा ज़ुल्म की बहुत हुई

*इंतेहा ज़ुल्म की बहुत हुई*लिंचिंग की बेज़ा आदत, हदें सारी पार हुई,इस बारी पालघर में, इंसानियत तार तार हुई;बैरागी थे जो सह गये, उफ़्फ़ तलक भी ना हुई,मिलकर रब से रूहें उनकी, मानो जैसे पाक हुई;साधु-संतों का मुल्क़, बनी जाहिलों की नगरी नई,पीर फ़क़ीरी करना मानो, आफ़त बहुत बड़ी हुई;कभी मज़हब कभी गफ़लत, भूल हमसे बहुत हुई,सड़कों पर छिनती जानें, कुर्बानी यह आम हुई;वक़्त रहते जगा लो, लाज़ हमवतनों सोई हुईइंतेहा ज़ुल्म की सारी, नख से शिख पार हुई;✍️दुख और अफ़सोस भरी क़लम से____अब्दुल्लाह क़ुरैशी

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