कविता_ “क़ुदरत इस बारी”

*क़ुदरत इस बारी*कुदरत ने इस बारी, कैसा ये रूप दिखाया है;ज़ख्मों को उसके, अनदेखा हमने बनाया है।परत दर परत हम उसे, यूहीं क़ुरदतें रहें;रोती वसुधा ने, दर्द कई बार सुनाया है।चीख सुनी ना ही, तरस बेचारी पर खाया है;सुनामी,भूकंप, तांडव कई दफ़ा दिखाया है।थककर अन्त में, ब्रहमास्त्र उसने यह उठाया है;ना चाहकर भी, हथियार कोरोना को बनाया है।क़ुदरत का यौवन, फिर से देखो खिल आया है;लालों के बलिदानों से, सबक़ हमको सिखाया है।_______अब्दुल्लाह क़ुरैशी

Оформить и получить экспресс займ на карту без отказа на любые нужды в день обращения. Взять потребительский кредит онлайн на выгодных условиях в в банке. Получить кредит наличными по паспорту, без справок и поручителей

Leave a Reply