मुझे क्यों नहीं समझते हो!

*मुझे क्यों नहीं समझते हो!!*जब मैं आब कहूँ, दरिया तुम समझते हो,सूल कहूँ जो मैं, शमशीर तुम समझते हो;इल्ज़ाम-तराशी की रिवायत, बनाकर एजेंडा इसे,दूसरों को घटिया, खुद को पाकीज़ा बड़ा समझते हो;क्यूँ आख़िर समझते नहीं, जज़्बातों को तुम मेरे,सच को सच नहीं, बातिल इसे तुम समझते हो;माना गुस्ताख़ियां की होंगी बहुतों ने बहुत सी मग़र,शामिल क्यूँ इसमें, मुक़म्मल क़ौम को समझते हो;बातें-इरादें-फसादें-फ़ितरत, रह जाने सब धरे यहीं,ख़ुद को लेकिन आजकल, खुदा बड़ा समझते हो।_अब्दुल्लाह क़ुरैशी

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