दर्दों-ग़म सारे मेरे

*दर्दों – ग़म सारे मेरे*आज सहने दें, सितम सारे तेरे,आज कहने दे, दर्दों-गम सारे मेरे;दिखता हूँ मैं खुश, इक राज है ये,पलकें भीगी और मन उदास है ये;जानता मैं सब कुछ, कहता मग़र कुछ नहीं,टूटे सपने मेरे, लबों पर अल्फाज़ कुछ नहीं;नदियों का नीर कहाँ, अब वैसा कलकल करता है,बारिश में बादल भी कहाँ, वैसा सा अब गरजता है;पंछी, पवन, परवाने सारे अब रूठ गए है,यादें, यारियां, शीशमहल से सब टूट गए है;कहते फिरते थे, रोशन इक दिन कर जाऊँगा,मान बढ़ाके तेरा, नाम सबसे ऊँचा कर जाऊँगा;वो कोरी बातें भी अक्सर, मुझको ये कहती है,जब से टूटा दिल मेरा, बैचैनी हरपल रहती है;बसन्त,ग्रीष्म,शीत मौसमों का, आनन्द सारा भूल गये है,फ़र्क लाल, नीले, हरे रंगों का, जानें कब का भूल गये है;चाँदनी रात हो या हो सुर्ख काली रात कोई,तुम बिन सूनी महफ़िल, ना उसमें बात कोई;गोल-गप्पों की सूखी पपड़ी, आदत वो छूट गई है,टुकड़ों में जामुन खाने की, चाहत वो छूट गई है;नमकीन,गुंजिया,पापड़, सारे फ़ीके पड़ गये है,जाने कितने गुलाब, किताबों में ही सड़ गये है;कॉलर वाली टी-शर्ट, जो तुझको बहुत भाती थी,मुझको पहने देखे बिना, नींद कहाँ तुझको आती थी;कॉलर उस टी-शर्ट की, किनारों से फट गई है,सिलने जो दी, पर्ची दर्ज़ी वाली गल गयी है;आँख मिचौली, नैन मटक्का, फुरसत के वो सारे पल,ओझल हुई दिल्लगी सारी, रह गये तन्हाई के पल;आज, कल और परसों, बातें बस तेरी गुनता हूँ,साथ बिताये लम्हों के, नग़में सारे सुनता हूँ;जगजीत-रफ़ी ये सब, ख़ास मेरे हो गये है,गीत दर्द वाले, बस येही पहचान हो गये है;बिस्तर,तकिया पड़ी है चद्दरें सूनी बेचारी,ढूंढते फिरते है, हंसी और हया की लाली;घड़ी की टिक-टिक, शिकायत हर रोज़ करती है,सुइयाँ तो चलती है, रातें पर मुश्किल से कटती है;आज सहने दे, सितम सारे तेरे,आज कहने दे, दर्दो-ग़म सारे मेरे;आज कहने दे, *दर्दो-ग़म सारे मेरे*।_©✍️अब्दुल्लाह क़ुरैशी

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