कविता_ “हम एक नाव पर सवार है”

हम एक नाव पर सवार हैं, मन में भरा क्यूँ इतना गुबार है;ना करो गुस्ताखियां ऐसी यहाँ, जाना तो सभी को उस पार है;क्यों बाँट रहे हो तुम इनको, घायल सारे एक तीर के शिकार है;इलाज नहीं मिलता अगर आज में, जरूरी नहीं फैलाना,नफ़रत का बाजार है ;एक रीत सुनी थी सदा यहाँ, अब इन्हें दवा नहीं, दुआ की दरकार है।*अब्दुल्लाह क़ुरैशी*

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