कविता_ “अपनों से पहचान बढ़ाओ”

*अपनों से पहचान बढ़ाओ*दूरियां सारी अब मिटाओ ,अपनों से पहचान बढ़ाओ ;सिवईयां ईद की, इस बारी उनको ख़िलाओ ,अम्मी के हाथों का, हर पकवान चखाओं ;अपनों से पहचान बढ़ाओ ।राखी पे अबके, वचन सारे मिलके निभाओ ,बहनों का उनकी, दिल से सम्मान बढ़ाओ ,अपनों से पहचान बढ़ाओ ।फजीलतें रमजान की, उनको भी सुनाओ ,इफ्तारी में अपने, उनको खूब ख़िलाओ ;अपनों से पहचान बढ़ाओ ।होली में रंग नये, लेके घर उनके जाओ ,रंगों की बारिश, गीत सुहाना कोई गाओ ;अपनों से पहचान बढ़ाओ ।रिवायतें मोहर्रम वाली, उनको भी बतलाओ ,रीति शिया-सुन्नी की, सारी उनको समझाओ ;अपनों से पहचान बढ़ाओ ।नवरातों की गाथा, जन-जन तक पहुंचाओ ,सजी थाल फलों की, भेंट इसे आम बनाओ ;अपनों से पहचान बढ़ाओ ।राम-अली का फर्क मिटाओ, तेरे – मेरे का भेद भुलाओ ,क़दम उनकी ओर बढ़ाओ, उनको अपने नज़दीक बुलाओ ;अपनों से पहचान बढ़ाओ ।दूरियां सारी अब मिटाओ ,अपनों से पहचान बढ़ाओ ;अपनों से पहचान बढ़ाओ ।_©✍️अब्दुल्लाह क़ुरैशी

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