मैं न:-विजय

रीत दुनिया की मैं न मानू
प्रीत सभी से मैं न मांगू
हार को भी गले लगाता
जीत के मद में मैं न नाचूँ

द्वार सभी के मैं न जाऊँ
प्रलाप किसी को मैं न सुनाऊँ
दर्द को दिल में हूँ रखता
बून्द आंखों से मैं न बहाऊँ

वैर किसी से मैं न चाहूँ
झूठ लबों पे मैं न लाऊँ
गीत प्रेम की सदा हूँ गाता
नफरत के बोल मैं न जानू

दुष्कर्म के पथ पर मैं न जाऊँ
भाग्य भरोसे कुछ न पाऊँ
जो है खुश उसमे हूँ रहता
भाव लालच के मन में न लाऊँ

2 Comments

  1. Devesh Dixit 26/04/2020
    • vijaykr811 26/04/2020

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