सूरत-ए हाल बयां किया नहीं जाता हैतुमसे दूर अब तो रहा नहीं जाता हैकहते हो भूल चुके हैं हम तुमको तुमसेनजरें क्या हटाए दिल धड़क नहीं पाता है ना जाने क्यों हर दौर से यह लम्हा गुजर जाता हैलम्हों को देखकर दिल टूट कर बिखर जाता हैतुम कहते हो रखा क्या है इन लम्हों में, अरेइन लम्हों से तो आशिकों का शहर उजड़ जाता है । यूं तो दो गज जमीन में आशिक दफन हो जाता हैख्वाबों को सीने में लेकर आशिक ए कफन हो जाता हैमजाक तो हर कोई बनाते हैं उन आशिको का, लेकिनउससे तो बेवफा उसका दिल – ए सनम हो जाता है  

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