यह गरीबी का रेगिस्तान है जनाब-उदयप्रकाश द्धिवेदी

यह गरीबी का रेगिस्तान है जनाबयहाँ नंगे पाँव चलना पड़ता हैकोसों दूर अपनों को चलना पड़ता हैनजाने कितने युगों की अतृप्त प्यास हैलोगों में आज भी नयी जिंदगी की आस हैयह गरीबी का रेगिस्तान है जनाब।जहाँ गैरों के लिए भी कुछ आस हैइस रेगिस्तान में नजाने कितने तलवे जलते हैं,अमीर अपनी मदमस्ती में अपनी इच्छा तलते हैं।यह गरीबी का रेगिस्तान है जनाब।नजाने कितनों से झेल रहे शोषण हैपर फिर भी लोगों का कर रहे पोषण हैं।यह गरीबी का रेगिस्तान है जनाब,जिसने दुनिया को दिया नया गुलिस्तान है जनाब । सन्दर्भ : यह कविता आज २९ मार्च २०२० को मेरे द्वारा लिखी गयी है

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