मैं:-विजय

कातिल हूं मैं अपने जीवन-मन कासाहिल हूं मैं इच्छाओं के समंदर काबेड़ियां हूं मैं अपने बढ़ते हुए कदम काटूटा तारा हूं मैं अपने ही तारामंडल कारावण हूं मैं अपने ही आराध्य राम काकालिख हूँ मैं अपने ही श्वेत दामन काअंधेरा हूँ मैं अपने घर-आंगन काकीचड़ हूँ मैं अपने ही मन-कमल काकांटा हूँ मैं अपने पुष्पित-उपवन कापत्थर हूँ मैं अपने मंजिल-पथ काजल्लाद हूँ मैं अपने निश्छल तन काराख हूँ मैं अपने स्वप्न-महल कारंक हूँ मैं अपने जन प्रेम-नगर कारोग हूँ मैं अपने कुल-सुदृढ़ बदन कादोष हूँ मैं अपने हितजन-सद्गुण काशोक हूँ मैं अपने ही रंग-महफ़िल का By:-VIJAY

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2 Comments

  1. अरुण अग्रवाल 18/04/2020
    • vijaykr811 18/04/2020

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