मजदूर हूँ साहब

रोजगार के लिए पलायन कर गांव से शहर आया था,एक कपड़े की गठरी और कपड़े में लिपटी दो रोटी साथ लाया था|शहर आया ठोकरे खाया फिर कहीं जाकर कुछ काम मिला, दो वक्त की रोटी और सोने को खुला आसमान मिला|अभी रहने को कोई आशियाना भी नहीं था,और सुना यहां कोरोना महामारी का बुखार आया है |अब ना तो करने को काम है, ना कमाने को पैसा,कभी भूख रुलाती है तो कभी घर वालों की चिंता सताती है|सड़के सुनसान है, गलियां वीरान है, लेकिन अभी भी कुछ देवदूत है जो कभी जीने के लिए खाना दे जाते हैं|मैं अकेला तो नहीं इस बुरे समय में,एक दिन यह बुरा समय भी टल जाएगा |इसी उम्मीद में अपने परिवार को याद कर यहां अकेले हर रोज मर कर भी जीता हूँ |मजदूर हूँ साहब हर पल अपने आँसू खुद ही पीता हूँ |इम्तियाज भारती

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