रचनाएं – (२५) बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – (बिन्दु)

दोकानहम न जननी ई पपिया, हैरान कइले बाहमरे घरवा के आगे, दोकान कइले बा।हम न जननी कि अतना, ई पागल करीहमरे दिलवा के ऐसे, ई घायल करी।अब अखिया के काहे, लोभाए लगलरह रह के ई हमरा, भरमाए लगल।हमरे मनवां के काहे, परेशान कइले बाहमरे घरवा के आगे, दोकान कइले बा।नींद ले गइल चोराके, हम केकरा कहींचैन मिले नाहीं तनिको, अब केतना सहीं।रात करवटे में ऐसे, ही भोर हो गइलधीरे धीरे में सगरे, अब शोर हो गइल।प्यार कैसन बा कि जीअल, मोहाल कइले बाहमरे घरवा के आगे, दोकान कइले बा।याद हमरा सतावेला, अब हम का कहींकोई आके बतावा न, हम कइसे रहीं।हो गइल ई दिल दिवाना , मन पागल भइलनजरियाय से ई गुजरिया, लोभाई गइल।हमारे जीयल ई मुअल, बेहाल कइले बाहमरे घरवा के आगे, दोकान कइले बा।कोरोना – भोजपुरीकोरोना के करा ऊपाई ए भैयाघर में रहा लुकाई ए भैया।।सरकारी करफू लागल बा सगरेगाँव मोहल्ला शहर नगरे – नगरे।कोरोना के करा सफाई ए भैयाघर में रहा लुकाई ए भैया।।दूरी बनावा बात करा दूर सेबच के रहा भाई अबहीं टूर से।कोरोना ई नाच नचाई ए भैयाघर में रहा लुकाई ए भैया।।रहबा सतर्क त लाभ मिल जाईबाची जिनगी त ढेरो कमाई।कोरोना ई सब के मुआई ए भैयाघर में रहा लुकाई ए भैया।।केतने ही देशवा एकरे चपेट मेंआपन देश के घूसल बा गेट में।मिलके कोरोना भगाईं ए भैयाघर में रहा लुकाई ए भैया।।जे जहाँ बाटे पड़ल रहा घर मेंछुप जा भैया तकिया के तर में।कोरोना के नैहर पहुँचाई ए भैयाघर में रहा लुकाई ए भैया।।बड़का खतरा छुआछूत के बेमारीसगरे फइलल बा देखा महामारी।कोरोना केतना के खाई ए भैयाघर में रहा लुकाई ए भैया।।बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – (बिन्दु)बाढ़ – पटनादोहा – (कोरोना)संक्रमण एक रोग है, कोरोना का तोपविश्व पटल पर छा गया, महामारी प्रकोप।रहिए इससे दूर ही, संयम रखिए आपमत खोने दें धेर्य को, आया बनके शाप।रहें घर में बंद सभी, कर्फ्यू है कुछ रोजराष्ट्र हित में है कदम, बदलें अपना पोज।मत निकलें बाहर अभी, बचके रहिए आपछुआछूत का रोग है, याद दिलाए बाप।साफ सफाई हो तभी, रह पायेंगे साथआपस में बस प्रेम हो, पर दूरी दो हाथ।पालन हो निर्देश का, है ये अपना धर्मविवश है सरकार भी, करें हम अपना कर्म।नाक मुँह और आँख से, ये कोरोना रोगतीनों द्वार प्रवेश है, काम न आता योग।लाइलाज है रोग यह, दवा न निकला कोयबिना मौत सब मर रहे, जहाँ तहाँ सब रोय।बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – ( बिन्दु )बाढ़ – पटनाडर का आलमडर का आलम थमता नहीं क्योंसंकट है जो टलता नहीं क्यों।कोई रास्ता उपाय बता दोइतना हममें क्षमता नहीं क्यो।।एक कोरोना सब पर भारीसमझ न आया ये महामारी।चीन से फैला है देशों मेंआफत आई कैसी बीमारी।।महाशक्ति कहे जाने वालेलगा लिये क्यों मुंह पे ताले।हैकड़ी हो गई गुम सभी कीखोज रहे मिल जाए रखवाले।।इसका है एक अभी परहेजखुद अपने को तुम रखो सहेज।मत करना तुम सभी मनमानीकोरोना को अब वापस भेज।।साफ सफाई तुम रखो भरपुरबात भी करो तुम रहके दूर।सरकारी कर्फ्यू को मानोमत समझो हम हैं मजबूर।।राष्ट्र हित की बात हो सबमेंजन मानस की बात हो सबमें।घरों में रहिये बंद सभी अबभाईचारे जज्बात हो सबमें।।इतना तो सभी साथ निभाओदूर रहके ही हाथ हिलाओ।जान रहे तभी लाख उपाईइतना ही बस सद्बुद्धि लाओ।।बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – (बिन्दु)बाढ़ – पटना1222 1222 1222ग़ज़लजबर का सिलसिला कब तक चलेगा येसदन का दीप कब तक साथ देगा ये।उजड़ने पर लगा क्यों है हमारा घरकहर, ढ़ाकर हमारा जान लेगा ये।कभी आतंकवादी तो कभी दुश्मनलगे हैं घात में , अंजाम देगा ये।पड़ोसी मुल्क का धोखा कहाँ कम हैपटक कर मार देगा, क्या बचेगा ये।भगा दो अब इसे तुम दूर कोरोनासिखेगा चाइना, मजबूर चेंगा ये।महामारी मचा है, शोर, धीरज रखजगत के हर ठिकाना तक चलेगा ये।न घर से आप निकलो, बात मानो तोसुझावों पर अमल हों, कब करेगा ये।जबर – अत्याचार, जूल्मसदन – घरबिन्देश्वर प्रसाद शर्मा _ (बिन्दु)बाढ़ – पटनाफिरका परस्तीमुझे नहीं मालुम गम क्या खुशी क्याफ़ितरत के आगे ये ज़िंदगी क्या।कभी मुसीबत कभी जश्न -ए- मसर्रतकिसे पता मौत क्या ज़िंदगी क्या।ये साँसें भी शाख पर है टंगीदुआ क्या दवा क्या ये ज़िंदगी क्या।ये दहशत क्या ये चैन-ओ-अमन क्याये हँसना – रोना ये ज़िंदगी क्या।यहाँ कुदरत क्या यहाँ क़यामत क्यावक्त एक आईना ज़िन्दगी क्या।लोग फंसे हैं फिरका परस्ती मेंभूल गये हम क्या ये ज़िन्दगी क्या।किसे पता अच्छाई क्या बुराई क्यासच – झूठ में पलती ये ज़िन्दगी क्या।वायरसयह वक्त का कैसा तकाज़ा हैख़बर कोरोना की ताजा है।कौन है जो इसका खबर लेगाकिसके पास यह अंदाजा है।।आ गया दूत बनके वुहान सेबहुतों को मारेगा जान से।सतर्क रहो, घर में बंद रहियेजल्द विदा कीजिए जहान से।।इस वायरस को मत फैलाइयेदूर रहकर सबको बचाइये।साफ़ – सफाई ताजा हो खानाऐसा ही आप सब अपनाइये।।धेर्य और साहस दिखाइयेअपना देश मिलकर बचाइये।न दुआ काम आ रही ना दवाशान्ति और अमन चैन लाइये।।चिकित्सक लग गये हैं प्रयास मेंदिनों रात जुटे हैं वो आस में।तकलीफ है मरीज को साँस मेंसोते भी नहीं इतने ह्रास में।।सरकारें अपनी काम कर रहीप्रशासन आपदा से लड़ रही।हमें अपना फर्ज निभाना हैदवंगों की हैकड़ी उतर रही।।मुक्तकहर देश पर आपदा भारी हैलाइलाज बड़ा बीमारी है।क्या सोच के संकट आया हैभारत की बढ़ी लाचारी है।।मनुष्यमनुष्य तामसी क्यों हो गयालालची, स्वार्थी हो गया।मनु का ये सुपुत्र भी होकरकैसे वह नार्थी हो गया।।हकीकत को जानता नहींसत्म को भी समझता नही।कौन इंसान कौन हैवानधर्म को भी मानता नहीं।।शैतानगी है हद से पारअवारगी की है बुखार।दवंगई की बात न पूछोदेखावटी हो गया प्यार ।।मुख में राम बगल में छुरीकैसी मानव की मजबूरी।ऐसे वो प्रपंच रचातेआग लगाके शोर मचाते।।क्या मिलता है इससे भाईलोग कहेंगे तुम्हें कसाई।बन जाते हो आतंकवादीजीवन क्यों करते बर्बादी।।इंसानियत शिष्टाचार खतमपढ़े लिखे संस्कार हजम।ऐसे – कैसे देश बचेगाबढ़ा रहा यह आगे कदम।।इतना तो अब तुम करो जतनहोने मत दो सभ्यता पतन।धेर्य और विश्वास जगाओप्यारा कितना यह तेरा वतन।।बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – (बिन्दु)बाढ़ – पटनाअपना गाँवतुझको तेरा शहर मुबारक, मैं तो अपना गाँव चलाजहाँ मैं पला बढ़ा पढ़ा था, घर पर उल्टा पाँव चला।जहाँ मिला था माँ का साया, वहीं दुलार पिता का थाभैया – भाभी बहन का प्यार, इक नाता, रिश्ता का था।ना कोई भरमाने वाला, सब कोई दिलवाला थायहाँ ऐसी थी हरियाली, चारो ओर उजाला था।ए सी पंखा तुझे मुबारक, पीपल नीम की छाँव चलाजहाँ मैं पला बढ़ा पढ़ा था, घर पर उल्टा पाँव चला।यहाँ न कोई भेद भाव था, न कोई लुच्चा पाजी थासद्विचार था सबके मन में, न कोई मुल्ला हाजी था।मस्त यहाँ चौपाल था ऐसा, मंदिर – मस्जिद प्यारा थाहोली दिवाली संग साथ था, दशहरा ईद न्यारा था।ऊँची महल मुबारक तुझको, मैं तो अपना ठाँव चलाजहाँ मैं पला बढ़ा पढ़ा था, घर पर उल्टा पाँव चला।बहकावे में शहर गया था, कुछ पैसों की लालच थीअहो भाव समझे तो देखे, फ़ज़ीहत बड़ी कचकच थी।मतलब नहीं किसी से होता, सब मतलब की यारी हैंछुपे रुस्तम ऐसे कि जैसे, बड़ा सेठ व्यापारी हैं।भीड़ – भाड़ हो तुझे मुबारक, मैं तो अपना दाँव चलाजहाँ मैं पला बढ़ा पढ़ा था, घर पर उल्टा पाँव चला।बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – (बिन्दु)बाढ़ – पटनाजगदम्बे माँआशा और विश्वास हमें है अम्बे माँदूर करो विपदा आके जगदम्बे माँ।जब – जब भीर पड़ी दुनिया में तब आईकाली, दुर्गा रूप में दुश्मन पर छाई।रक्त बीज जैसे दानव को मारा हैमहिषा को ऐसे तुमने ललकारा है।।इतना तो आभास हमें है अम्बे माँदूर करो विपदा आके जगदम्बे माँ।त्राहि माम में फंस गये मैया हम सारेदिखता नहीं ऊपाई जैसे सब हारे।शुंभ – निशुंभ मैया तुमने संहारे हैंमधु – कैटभ ललकार के तुमने मारे हैं।।तुमसे बड़ी आश हमें है अम्बे माँदूर करो विपदा आके जगदम्बे माँ।एक कोरोना दानव बनके आया हैधरा के हर कोने में जाल बिछाया है।कलियुग की माया को कौन यह जानेगावायरस का है खेल बड़ा सताएगा।।अब तेरी है तलाश हमें है अम्बे माँदूर करो विपदा आके जगदम्बे माँ।बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – (बिन्दु)बाढ़ – पटनाजेहादी वायरसतबलीगी जमात आकर डाला था ऐसा डेराविदेशों से दिल्ली आया फिर और लगाया फेरा।घुस आया हर राज्य में देखा यहाँ आजादीधर्म प्रचारक बनके आया और करने बर्बादी।मर जायेगा खुद पर दूसरों को मार गिरायेगावायरस साथ लाया है अपना खेल दिखायेगा।जगह मत दो मस्जिदों में कोरोना जहर लाया हैपहले तुम्हें मारेगा मत कहना भरमाया है।धर्म मजहब की बात नहीं आपस में हम एक बनेंसरकारी आदेशों का पालन हो बस नेक बने।सतर्क रहें हम दूर रहें घर में बंद भरपुर रहेंहम पर भी न आँख उठे इतना हम बेकसूर रहें।बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – (बिन्दु)बाढ़ – पटनामेरी संगिनीमैंने दिल से लुभाया आपकोबड़ी मुश्किल से पाया आपको।ये दिल का लगाना गजब ही रहाअपने जिगर से लगाया आपको।कितने बहके ऐसे हम प्यार मेंअपने घर में ले आया आपको।वो वादे इरादे न समझे थे हमअपने मन में बसाया आपको।चैन खोए, तड़पे, जिस प्यार मेंसरगम बनके सजाया आपको।मेरी संगिनी खुश रहो कुछ कहोकुछ रिझाया फिर हंँसाया अपको।न होना अलग ये न सोचो कभीअपना दिल जो दिखाया आपको।बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – (बिन्दु)बाढ़ – पटनाफिरका परस्तीकाफिया /समान्त – अतरदीफ़/पदान्त – के आगे ये जिन्दगी क्याउल्फ़त के आगे ये ज़िन्दगी क्याफ़ितरत के आगे ये ज़िंदगी क्या।कभी मुसीबत कभी जश्न -ए- मसर्रतकुदरत के आगे ये ज़िंदगी क्या।ये साँसें भी शाख पर है टंगीकिस्मत के आगे ये ज़िंदगी क्या।ये दहशत क्या ये चैन-ओ-अमन क्याहसरत के आगे ये ज़िंदगी क्या।यहाँ कुदरत क्या यहाँ क़यामत क्याकुर्बत के आगे ये ज़िन्दगी क्या।लोग फंसे हैं फिरका परस्ती मेंइशरत के आगे ये ज़िन्दगी क्या।किसे पता अच्छाई क्या बुराई क्यामसर्रत के आगे ये ज़िन्दगी क्या।दीपप्रज्वलित कर दो दीप सदन में चन्द्रमा मंगल भी चमकेगानौ अंक है मंगल कारक इसके उर्जा से भुगोल बदलेगा।शुक्ल द्वादशी दुख दूर करेगा किस्मत भी सबका निखरेगावायरस कोरोना मात खा कर ये मेरे देश से निकलेगा।एक साथ प्रकाश पुंज यह वायुमंडल का रूप बदल देगाकरोड़ों – करोड़ जब दीप जलेंगे कोरोना यहाँ से चल देगा।पूरा देश अब एक बना है आज एक आवाज हमारा हैकब तक तेरा खेल चलेगा कोरोना तुमको ललकारा है।तेरा अस्तित्व मिटा देंगे हम दुश्मन को धूल चटा देंगेचाहे जो हो कोई भी दोषी रास्ता से उसे हटा देंगे।हम बलिदानी के बेटे हैं तेरी नानी तुझे रटा देंगे।जितना ऊपर कद उठा है तेरा उतना नीचे घटा देंगे।बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – (बिन्दु)बाढ़ – पटनाग़ज़ल1222 1222 1222 1222फ़क़त अहसास भर तेरा न मेरा है यहाँ कोईकिसे अपना कहें अब हम न फेरा है यहाँ कोई।अगर चाहो मरौअत में हमें इंसान ही रखनान मेरा है यहाँ कोई न तेरा है यहाँ कोई।हमें तुम जान लो अपना बखेरा छोड़ भी तो दोमुझे लगता हँसेंगे अब न घेरा है यहाँ कोई।मुहब्बत हो गई तुमसे शरारत अब नहीं करनाजिगर में बास हो तेरा न डेरा है यहाँ कोई।मुसलसल याद आती तो पसीना छूट है जातान नखरों में शरारत है न शेरा है यहाँ कोई।बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – (बिन्दु)बाढ़ – पटनाविपदा – (चौपाई)सुनो तात मम संकट भारीभय शंशय बढ़ गयो दुखारी।चहु दिश आफत विपदा घेरागृह माहीं अब लागत फेरा।आ गयो कैसो महामारीभक्षन करहूँ आके खरारी।काल भूत – पिशाच यह आयोबिनु शरीर मानव को खायो।मानव से मानव कौ दूरीराखो भाई अस मजबूरी।आयो रोग संक्रमण पीड़ाशुक्ष्म दर्श बिनु फैलहिं कीड़ा।मानव में घुस मानव माराअब मानव उसको ललकारा।संयम मन में धीरज राखोसब्र करो मीठा फल चाखो।संकट का निदान तुम्हीं हौकलियुगी भगवान तुम्हीं हौ।राखो भाई साफ – सफाईनाहीं करो इससे ठिठाई।वैद्य हकीम शासन जगे सबसरकार की आसन लगे अब।जन मानस में प्रेम विराजैशूर वीर साथे सब बाजै।ग़ज़ल221 221 221 22मस – तफ़- इ x3, मस तफ़देखो जमाना किधर जा रहा हैसमझो इसे बे कदर जा रहा है।मालुम नहीं तो लगाओ पता तुमपूछो अभी तुम जिधर जा रहा है।सोचो नहीं तुम जिसे भी बुलाओढ़ूढ़ो इसे बे असर जा रहा है।दिल से दयावान कोई नहीं अबइंसा यहाँ पे सिहर जा रहा है।जालिम जमाना बना है निशानापागल दिवाना बिखर जा रहा है।दौलत सभी को बिगाड़ा सही मेंलालच दिलों में उतर जा रहा है।मतलब कहाँ है किसी से कहाँ तकयारी वहीं तक मुकर जा रहा है।शिकवा करो या शिकायत अभी तुमऐसा सफ़र जो गुजर जा रहा है।बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – (बिन्दु)बाढ़ – पटनावसुधाना जाने खुश रहते कैसेझुक जाते हो फल देकरअनुपम मनोरम कृति तेरीवसुधा को ये पल देकर।छाया तेरी अजब निरालीधूप प्यास की तुम प्यालीपथिक बेचारे थक के सोतेकरते उनकी रखवाली।हर वर्ष ही जवानी आतीमौसम वसंत आता हैभर देता सब घाव पुरानानया कंत भर जाता है।राग – रागिनी गाने लगतीजैसे है गाती कोयलविरह बेदना बढ़ जाती हैदिल में होती हलचल।सज जाता है वन उपवन सबखिलता है फूल चमन कामहक जाती यह धरा हमारीयाद कराए बचपन का।तितली, भौंरों की मत पूछोमद मस्त पवन में डोलेहवा वसंती जब तब चलतीये बंद अक्ल भी खोले।ग़ज़ल122 122 122 122सफ़र जिंदगी का भुला तो न दोगीज़हर बंदगी में मिला तो न दोगी।कही पे शिकायत कहीं पे नज़ारामुहब्बत किया है गिला तो न दोगी।कसम है हमारी बदलना नहीं तुमरहो तुम जहाँ भी झुला तो न दोगी।वफ़ा ज़िन्दगी को बहुत है भरोसारही बात जादू चला तो न दोगी।कहीं जुस्तजू में भटक हम न जाएंजिगर ज़िन्दगी का जला तो न दोगी।अदू बन गया है जमाना हमारासफ़र में मुझे उलबुला तो न दोगी।बता दो हमें “बिन्दु” क्या सोचती होमुसीबत घिरा है रुला तो न दोगी। दीयादिल का दीया प्रेम की बातीमंजिल तक ले जायेगीदीप जला लो जगमग – जगमगमहफिल तक ले आयेगी।मन में इक विश्वास जगाओबाधाओं से लड़ जाओहौसला तेरा कभी न टूटेतूफ़ानों पर अड़ जाओ।चित्मन में प्रकाश फैलाओदीपक एक जलाओ तुमसत्य न्याय के पथ पर चलनाऐसा ही सिखलाओ तुम।तेल में जबतक होगी बातीदीपक तबतक जलता हैजीवन भी ऐसे ही चलताजबतक उनमें क्षमता है।दुख – सुख के चक्की मे पिसताहर मानव इंसान यहाँबेगाने देखेंगे तुझकोनिकलेंगे बस प्राण यहांँ।निश्छल हो बस प्रेम तुम्हारासत्य कर्म ही साथी होउच्च विचार हो, सादा जीवनजगमग जैसे बाती हो।ग़ज़ल212 122 122 22लफ्ज़ को हलक से फिसलने तो दोमौत को पलक से निकलने तो दो।जी लिए बहुत ही लियाक़त में खुदबोझ को कसक से निकलने तो दो।ईश का शुक्र है सलामत थे वोज़िन्दगी नर्क से निकलने तो दो।प्रीत से बड़ी है न कुछ भी यारोंअब उसे सड़क से निकलने तो दो।बात जो करो सच बहुत मीठा होज्ञात हो, नमक से निकलने तो दो।साथ कछ न जाए, कर्म यादों मेंछोड़ दो, चमक से निकलने तो दो।आह जो तड़प कर निकलती है “बिन्दु”रोक मत, सबक़ से निकलने तो दो।शेरआपके जीने की हयात बदल जाएगीमसर्रत- ए- नज़ाकत इल्तिफ़ात बदल जायेगी।कोशिश करियेगा तो अल्ताफ बन जाएँगेमुकद्दर चमकेगा ख़यालात बदल जायेगी।वर्ण पिरामिडहेरामजानकीहनुमानमेरे मन केमंदिर में आनामैं हूँ तेरा दिवाना।मैकरुँवंदनअविरामआठो पहरतेरे चरणों मेंहै मेरा सुखधाम।मैंराहीभटकाअज्ञानी हूँतेरा चरणमेरा जीवन हैछोड़ नहीं जाऊँगा।मैंहाराहे नाथनारायणप्रतिपालकतुम रक्षक होसदा सहायक हो।जोकियाभूल जासोच मतमन बदलसत्य पर चलकिस्मत बदलेगी।मैंनेकइंसानपहचानमेरा वजूदधरा का स्तंभ हूँमैं एक इंसान हूँ ।प्यार की तड़प – गीतअपने गम को दिल से मैंने गीतों में लिख डाला थातड़प तड़प कर मैंने इसे अतीतों में लिख डाला था।द्वंद नहीं था कुछ भी लेकिन पर मन मेरा दिवाना थापागल दिल में घाव बहुत थे घर मेरा मैख़ाना था।अपने हुए बेगाने कितने रिश्ते नये बनाने मेंजिसको समझा था मैं अपना वो भी पड़े जलाने में।अपने दर्द को दिल से मैंने प्रतीतों में लिख डाला थातड़प तड़प कर मैंने इसे अतीतों में लिख डाला था।मन की व्यथा किसे सुनाते मेरा मन ही घायल थादिखता कहाँ कोई मुझको जब मैं उस पर कायल था।यादों की गठरी माथे पर आँखों में घुम जाता थादिन का चैन रातों की नींदे ऐसे ही गुम जाता था।अपने रंज को दिल से मैंने रीतों में लिख डाला थातड़प तड़प कर मैंने इसे अतीतों में लिख डाला था।ज़िन्दगी ज़हर बन गयी मेरी थी मतलबी दुनिया मेंबेवफ़ा बन गयी इश्क में जैसे अजनवी दुनिया में।इंतिख़ाब यह समझ ना पाया मुहब्बत नादानी मेंकस्ती मेरी डूब गयी थी बरबस हुआ रूहानी में।अपने दिल की बातों को मैं प्रीतों में लिख डाला थातड़प तड़प कर मैंने इसे अतीतों में लिख डाला था।

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