पिता की व्यथा

अरमानों से सजी पालकी में बिठाना है तुझे, घर अपने पिया के पहुँचाना है तुझे।तुम्हारे जन्म से ही संजोये रखे हैं कई ख़्वाब, इन्ही ख्वाबों से सजाना है तुझे।इस घर की रौनक हो तुम, तुम ही हो सबकी जान,तुम्हे विदा कर पाना न होगा आसान, पर अथाह धीरज धर के, तुम्हारा करेंगे कन्यादान। दहेज़ तो न जुटा पाया हूँ,पर संस्कारों की पोटली भर भर कर दूंगा।हमारा आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ रहेगा,तुम्हारे अच्छे भविष्य की कामना करूँगा। कह तो देते हैं लोग भरोसा रखिये, बहु नहीं बेटी लेकर जा रहे पर कर ना पाता विश्वास पिता का दिलकई सवाल मन में गोते खा रहे।मन की उलझनों को दरकिनार करके बेटी को ख़ुशी-ख़ुशी विदा करना है, उसका ससुराल ही उसका घर होगा जहाँ वो घर घर खेली,अब वो उसका घर कहाँ है।बेटियां परायी होती है यही समाज की रीती यही विधि का विधान है,चाहे कितना ही बड़ा हो वो दानी कन्यादान करने वाला, पर वो भी एक इंसान है।

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2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 15/04/2020
  2. अरुण अग्रवाल अरुण अग्रवाल 18/04/2020

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