स्वप्न – बेटी का बाप (Poem)

वो दरवाजे पे खड़ी मुस्कुरा रही थीचिड़ियों को देख खिलखिला रही थीतभी मां ने पीछे से उसको गोद में उठायाऔर वह जोर से चिल्लाई “पापा ओ पापा””देखो ना! माँ मुझे खेलने नहीं दे रही”और अचानक से मेरी नींद खुल गईघडी में सुबह के 9 बज रहे हैंअरे! मुझे तो देर हो गई.. आज तो बॉस पक्का काम से निकलेगामेरा ये रोज का सपना मुझे देश से निकलेगाकल मन की बात उसको बोलूंगामुझे अब बेटी का बाप बनना हैउसकी तोतली आवाजों से मुझे पापा सुनना हैहर रोज सोचता हूँ आज बोलूंगा और हर रोज डर जाता हूँक्या करूँ, अजीब उलझन है.. दोनों की!उसे एक ही बच्चा रखना है और मुझे अपना सपना सच करना है और उसे अपना करना हैये कैसी औरत है भगवान! जिसे सिर्फ बेटा ही रखना हैतभी पीछे से आवाज आई, क्या बात है.. आज आपने चश्मा नहीं पहना..अरे नही! देदो! देर हो रही है ऑफिस के लिए..सुनो..मुझे कुछ कहना था..जानती हो आज फिर वही सपना मुझे आयाखुद को बेटी का बाप बना पाया|रोज रोज बोलती हूँ बेटी नही बेटा चाहिएऔर तुमको बेटी ही क्यू चाहिए??अब उसको क्या बोलूबेटी के सारे त्याग कैसे तोलुकैसे कहूं कि वो बेटी ही है जो हर रिस्तो के ताने बाने को बूना हैमाँ बाप की खुशियों के लिए हर दर्द सहा हैबेटों का क्या आज मेरे कल बीबी के होंगेउनके लिए सब रिस्ते भरम होंगेजिसको हम आज चलना सिखाएंगेवही कल हमको अनाथाश्रम छोड़ आएंगेथोड़ी देर बाद उस आश्रम में बेटी आएगीऔर रोते हुए बोलेगी पापा हम आपको घर ले जायेंगे….

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