जिन्दगानी माटी के

  1. संगवारी हो, आज जेन विपदा के घड़ी ले हमन गुजर थन, ए हा बढ़ा ही भयावक हे. मोर कविता के माध्यम से मे ए बताए के कोशिश करें हो, कि ये घड़ी टले के बाद मानवता ला भुल मत जाहु, जईसन अभी हाथ बटाय हो, येला बनाए रखहु. धन्यवाद

कल उठ जाबो, जब ऐ कोरोना ले.मत करहु ऐ गुमान गा.माटी के अन , माटी बर बने हन.येही हमर पहचान गा.संझा के बेरा, दुर कुबेराकर लुहू एक बर भगवान गामाटी के अन, माटी बर बने हन,येही हमर पहचान गा.काम नी आये ए धन पोटली,आये नही गुमान गा.सब ला धरहु , सब संग चलहु.मानवता के येही नीशान गा.माटी के अन, माटी बर बने हन.येही हमर पहचान गा.गाड़ी के चक्का तरी ऊपर हेदिन आही तोरो इंसान गा.दिन आही तोरो इंसान गा.माटी के अन माटी बर बने हन,येही हमर पहचान गा.झुके शीश ला, अऊ झन झुकाहु,गीरे मित ला, अऊ झन गिराहू.कर लुहु ओकर सम्मान गा.माटी के अन माटी बर बने हन,येही हमर पहचान गा.एक पईरा उड़ जाथे गईरा,नई उड़ पावे, जब धान गा.तुही बिगाड़हु, तुही बनाहु,तुहरे सुबह अउ‌ शाम गा.माटी के अन माटी बर बने हन,येही हमर पहचान गा.माटी के लोंदा, बने घरोंदाताल के पत्ता, बढ़े निखटटा.हो जाही, एक दिन घर बान गा.माटी के अन माटी बर बने हन,यही हमर पहचान गा.कर्म के खेला ,कोई नी टाले,टाले नहीं इंसान गा.कर्म करव ता झुक जाते,कर्मो भुमि भगवान गा.माटी के अन माटी बर बने हन,येही हमर पहचान गा.📝🖊️ तेज देवांगन

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