रचनाएं – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – (बिन्दु)

मनुष्य

मनुष्य तामसी क्यों हो गयालालची, स्वार्थी हो गया।मनु का ये सुपुत्र भी होकरकैसे वह नार्थी हो गया।।हकीकत को जानता नहींसत्म को भी समझता नही।कौन इंसान कौन हैवानधर्म को भी मानता नहीं।।शैतानगी है हद से पारअवारगी की है बुखार।दवंगई की बात न पूछोदेखावटी हो गया प्यार ।।मुख में राम बगल में छुरीकैसी मानव की मजबूरी।ऐसे वो प्रपंच रचातेआग लगाके शोर मचाते।।क्या मिलता है इससे भाईलोग कहेंगे तुम्हें कसाई।बन जाते हो आतंकवादीजीवन क्यों करते बर्बादी।।इंसानियत शिष्टाचार खतमपढ़े लिखे संस्कार हजम।ऐसे – कैसे देश बचेगाबढ़ा रहा यह आगे कदम।।इतना तो अब तुम करो जतनहोने मत दो सभ्यता पतन।धेर्य और विश्वास जगाओप्यारा कितना यह तेरा वतन।।बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – (बिन्दु)बाढ़ – पटनाअपना गाँवतुझको तेरा शहर मुबारक, मैं तो अपना गाँव चलाजहाँ मैं पला बढ़ा पढ़ा था, घर पर उल्टा पाँव चला।जहाँ मिला था माँ का साया, वहीं दुलार पिता का थाभैया – भाभी बहन का प्यार, इक नाता, रिश्ता का था।ना कोई भरमाने वाला, सब कोई दिलवाला थायहाँ ऐसी थी हरियाली, चारो ओर उजाला था।ए सी पंखा तुझे मुबारक, पीपल नीम की छाँव चलाजहाँ मैं पला बढ़ा पढ़ा था, घर पर उल्टा पाँव चला।यहाँ न कोई भेद भाव था, न कोई लुच्चा पाजी थासद्विचार था सबके मन में, न कोई मुल्ला हाजी था।मस्त यहाँ चौपाल था ऐसा, मंदिर – मस्जिद प्यारा थाहोली दिवाली संग साथ था, दशहरा ईद न्यारा था।ऊँची महल मुबारक तुझको, मैं तो अपना ठाँव चलाजहाँ मैं पला बढ़ा पढ़ा था, घर पर उल्टा पाँव चला।बहकावे में शहर गया था, कुछ पैसों की लालच थीअहो भाव समझे तो देखे, फ़ज़ीहत बड़ी कचकच थी।मतलब नहीं किसी से होता, सब मतलब की यारी हैंछुपे रुस्तम ऐसे कि जैसे, बड़ा सेठ व्यापारी हैं।भीड़ – भाड़ हो तुझे मुबारक, मैं तो अपना दाँव चलाजहाँ मैं पला बढ़ा पढ़ा था, घर पर उल्टा पाँव चला।बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – (बिन्दु)बाढ़ – पटनाजगदम्बे माँआशा और विश्वास हमें है अम्बे माँदूर करो विपदा आके जगदम्बे माँ।जब – जब भीर पड़ी दुनिया में तब आईकाली, दुर्गा रूप में दुश्मन पर छाई।रक्त बीज जैसे दानव को मारा हैमहिषा को ऐसे तुमने ललकारा है।।इतना तो आभास हमें है अम्बे माँदूर करो विपदा आके जगदम्बे माँ।त्राहि माम में फंस गये मैया हम सारेदिखता नहीं ऊपाई जैसे सब हारे।शुंभ – निशुंभ मैया तुमने संहारे हैंमधु – कैटभ ललकार के तुमने मारे हैं।।तुमसे बड़ी आश हमें है अम्बे माँदूर करो विपदा आके जगदम्बे माँ।एक कोरोना दानव बनके आया हैधरा के हर कोने में जाल बिछाया है।कलियुग की माया को कौन यह जानेगावायरस का है खेल बड़ा सताएगा।।अब तेरी है तलाश हमें है अम्बे माँदूर करो विपदा आके जगदम्बे माँ।बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – (बिन्दु)बाढ़ – पटनामेरी संगिनीमैंने दिल जो दिया था आपकोबड़ी मुश्किल से पाया आपको।ये दिल का लगाना गजब ही रहाअपने जिगर से लगाया आपको।कितने बहके ऐसे हम प्यार मेंअपने घर में ले आया आपको।वो वादे इरादे न समझे थे हमअपने मन में बसाया आपको।चैन खोए, तड़पे, जिस प्यार मेंसरगम बनके सजाया आपको।मेरी संगिनी खुश रहो कुछ कहोकुछ रिझाया फीर हंँसाया अपको।न होना अलग ये न सोचो कभीअपना दिल जो दिखाया आपको।बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – (बिन्दु)बाढ़ – पटनाईश्वरजिसे सम्हलना आता नहीं वो सम्हालने आते हैंप्रभु की माया तो देखो उसे भी पालने आते हैं।कौन शिथिल है कौन है निर्बल कौन है दुर्बल भाईऊपरवाला रखवाला है वो सबका करे भलाई।लाचारी की बात अलग है पर बात कुछ कर्मो का हैसच्चे मन से काम करे तो फल देना धर्मों का है।हर जर्रे पर नज़र है उनकी हर शै की खबर रखते हैंकोशिश करनी है तुमको वो अपने दर से लखते हैं।बुरा करोगे तो बुरा ही होगा आज नहीं तो कलबुरे काम का बुरा नतीजा भैया तुमको देगा छल।सत्य सादगी जीवन ही रखना मत घबराना भाईभवसागर से तुम पार भी होगा बनो नहीं कसाई।आफत में भी मत घबराना धेर्य हमेशा साथ रहेरो – बिलखके निकल जायेगा ईश्वर का बस हाथ रहे।बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – (बिन्दु)बाढ़ – पटनानव्य वर्षडाली – डाली महकेगी अब, हर पत्ता भी बोलेगाहर शजर तैयार है इतना, झूम – झूमकर डोलेगा।नव्य वर्ष की वेला है ये, खुशियों और उल्लासों काबागों में बहार है आयी,चमक- धमक उजासों का।माटी चंदन सी लगती है,दिखता जैसे जन्नत हैसज जाती है धरा हमारी, जान उनकी शोहरत है।रंग – बिरंगे फूल खिले हैं, खेतों में हरियाली हैइस देश का चमन है महका,कोयल धून निराली है।देखो सारे पेड़ फल गये, अनाज भरे खलिहानों मेंझूमे – नाचे खुशी मनाए, उमंग भरा किसानों में।वन – उपवन में मयूरा नाचे, मोरनी ताल लगावेरंग-रंग के फुदक चिरैया, सब का ही दिल बहलावे।हवा वसंती पुरवाई में, अपना ई खेल दिखावेविरहिन की तो बात अलग है,दर्द देह में भर आवे।बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – (बिन्दु)बाढ़ – पटना

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