रचनाएं – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – (बिन्दु)

वर्ण पिरामिड

येबेटीवो बेटामाया जालदुनियादारीरिश्ते और नातेकुदरत की खेल।मैंहमहमारादाव – पेचधन दौलतसब यहीं का हैयहीं पर रहेगा।येरिश्तेचाहतनफ़रतमन का फेरकर्म – धर्म – मर्मकौन यहाँ समझा।येधराआकाशजल – अग्निवायु से बनानिर्जीव – सजीवदेन है ब्रह्मा जी की।जागोआना-जाना लगा रहेगा, किसी का कहाँ ठिकाना हैजागो भैया जागो साथी, सबको एक दिन जाना है।क्यों खोए हो भ्रम में अबतक, सुंदर ये तन जलाना हैलालच के चक्कर में फिर क्यों,अब तक भी दिवाना है।जीवन के इस भाग दौड़ में, क्या हंसना क्या रोना हैजबतक दुनिया में हो तबतक, खोना और कुछ पाना है।जीवन को तू नष्ट न करना,करके ही कुछ दिखाना हैतेरा तन अनमोल रत्न है, दाग से इसे बचाना है।कर्म बड़ा है सबसे उत्तम, धर्म को गले लगाना हैसत्य हमेशा साथ रहे बस, तिमिर को दूर भगाना है।राम का नाम कितना प्यारा, मन लगाकर ही गाना हैइनके चरणों में ही जाकर, मौक्ष प्राप्त कर जाना है।प्रमाणिका छंद12 12 12 12 सम तुकांतचले जहाँ, वहीं गिरे।उठो अभी, डरे डरे।।नहीं रुके, चले फिरे।गली गली, सिरे सिरे।।दिखे तभी, सही सही।रहे जहाँ, सुखी वही।।कमी नमी, कभी रही।कभी मही, कभी दही।।मिले वही, भजे जिसे।चले कहाँ, कहे किसे।।सभी पिटे, सभी घिसे।लिखा जहाँ, वहीं पिसे।।सही कहो, सही गढ़ो।पढ़ो लिखो,चलो बढ़ो।।छलो नहीं, उसे मढ़ो।इधर नहीं, उधर चढ़ो।।अता पता, रही नहीं।बड़े हुए, मिले कहीं।।रहो यहीं, जमो यहीं।मिलो गले, रमो वहीं।।ताटंक छंदएक बिछावन को ही ऐसै, ओढ़े और बिछाये हैंठंढ की कँपकँपी में हमने,ऐसे रैन बिताये हैं।खूब गरीबी देखी मैंने, खूब नसीहत पायी हैदुनिया में रहके ही देखा,कहाँ वो हित-हिताई है।अपने मतलब की है दुनिया,अपना ढ़ोल बजाते हैंहम गरीब अपने में लड़ के, उलझन में पड़ जाते हैं।हमने कइयों को भी आगे, ऐसे बढ़ते देखा हैपंकों में भी फूल खिले है, तुंगों चढ़ते देखा है।मजदूरों का हाल न पूछो, मजदूरी की बातों सेपेट कहाँ भरता है उनका, खून पसीना गातों से।तंगहाल है जीवन इनका,क्या मिलता आजादी सेकहाँ कभी ये बच पाते हैं, नेता जी के खादी से।चूल्हा गैस दिए हैं लेकिन,गैस सिलिंडर खाली हैसात – सात हैं खानेवाले, देते भरदम गाली हैं।एक मंगरुआ काम करता, बोझ बड़ा ये भारी हैलिख लोढ़ा पढ़ पत्थर है ये, ये कैसी लाचारी है।जी हुजूरी की जिन्दगी में, दबकर ये रह जाते हैंछल-कपट होता नहीं मन में,छुपके सब सह जाते हैं।अपने कर्मो के बल से ही, ये परिवार चलाते हैंना हीं मिठाई, मेवा -मिश्री, सूखी रोटी खाते हैं। नव पल्लव नव चेतना, जीवन सुखद वसंतहरियाली से सज गयी, धरा हुई बलवंत।ऋतुराज रज सुगंध का, अभिनन्दन हो आजफाग – चैत दो मास है, उस पर करिये राज।मदमाती मधुमास है, विरह वेदना संगकोयल की फनकार से, यौवन होती तंग।पर्यावरणखेत का बहता पानी बोलेमुझको अभी बचा लोतेरा ही मैं काम आऊँगाजीवन सभी बचा लो।इसे प्रदूषित मत तू करनान होने दो खिलवाड़जल और वायु तेरा जीवनकाट मत जंगल झाड़।इतना आप संरक्षण कर लोबनो तुम पहरेदारबात नहीं कोई माने तोसमझो उसे बेकार।जन – मन में यह बात फैला दोरहे न बाकी कोईअगर अब भी नहीं सम्भले तोसमझो जीवन खोई।पर्यावरण को जानो – समझोप्रकृति संतुलन बनाओइसे मत करना छेड़ – छाड़ तुमकचरा दूर हटाओ।स्वस्थ होगे कैसे तुम सबगंदा अब फैलाकरसाफ – सफाई छोड़ दिए तोमरना पैसा खाकर।जीवन को तुम व्यर्थ न करनाचार वर्णो के भाईक्षणिक सुखों में डूबे क्यों होकर्मो की हो कमाई।सत्यम शिवम सुंदरम , शंकराय त्रिलोचनम।चंड – रुद्र विभूषितम, खंड – खंड विभंजनम।हर शम्भू महेश्वर, पिनाकी शशिशेखरम ।वामदेव विरूपाक्ष, कपर्दी नीललोहितम।।भूतपतिम अनिश्वरम , महाकाल शिवाप्रियम।कृपानिधि मृत्युंजयम , प्रजापतिम गिरिश्वरम।।बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दुबाढ़ – पटनामुँदरीआयो कपटी अरु गयो लपटीमुँदरी हमरी ले गयो झपटीकेहु देखत है केहु सूनत हैकेहु बोलत है डपटी – डपटी।गोरि रोवत है मन टोवत हैकेहु पाके सब कुछ खोवत हैसभी सखिया मिल समझावत हैकेहु बातन में अझुरावत है।ताक रही अरु कहीं झाक रहीराह देखत है ठहरी – ठहरीनिरेख लियो सब भितरी – बहरीशोक के बादल गहरी – गहरी।होय गया भूल नादानी मेंबिगड़ती बात क्यों जवानी मेंकछु शेष नहीं अब निशानी मेंमुँदरी वह गयो है पानी में ।साधनानित्य करे जो साधना, मन पुलकित हो जायऔरन की सेवा करे, तनिक नही घबराय।समर्पणप्रेम समर्पण हो जहाँ, हो, जीवन कृतार्थमीठी वाणी बोलकर, बन जाओ सिद्धार्थ।मोक्षपरम तत्व की कामना, जो करता इंसानमोक्ष उसी को है मिला, भक्ति मिले भगवान।बाबाछप्पन ईंच का “सीना”, ढ़ाय किलो का दिल, रखते हैं बलराजसुवह – शाम को , चार – चार किलो, रोज दूध पी जाते बलराज।आठ कटोरी ” चटनी”, तीन कटोरा चाय, पीते हैं बलराज।पीते हैं बलराज रे भाई, पीते हैं……..।जहाँ भी जाते, वे धूम मचाते, कभी ताकत का नहीं गुमानसब के साथ में , घुल – मिल जाते, ऐसे हैं वो नेक इंसान।लम्बी – चौड़ी काया लेकर, मजे में खूब, जीते हैं बलराज।आठ कटोरी “चटनी”, तीन कटोरा चाय, पीते हैं बलराजपीते हैं बलराज रे भाई, पीते हैं……… ।निवलों को भी, मदद हैं करते , कर्म और धर्म उनका प्रधानजो भी चल जाता, शरण में उनके, नहीं करते कभी अपमान।दुखियारों का दिल, समझ के अपना, हरदम सीते हैं बलराज।आठ कटोरी “चटनी”, तीन कटोरा चाय, पीते हैं बलराजपीते हैं बलराज रे भाई, पीते हैं……. ।चलने न देते दवंगई, न जलने देते, उनकी अब बातीऐसे तो अब, बन गये हैं बाबा, दूर – दूर तक उनकी ख्याति।हर अखाड़े की शान हैं, दंगल में हरदम, जीते हैं बलराज।आठ कटोरी “चटनी”, तीन कटोरा चाय, पीते हैं बलराजपीते हैं बलराज रे भाई,पीते हैं…….. ।तेरे बिन हम रह न पाये, क्यों तड़पे बेजानजान से ज्यादा चाहा था, फिर काहे नादान।कटी हुई एक पतंग है जिंदगीउलझनों से भरी तंग है जिंदगी।सुकून से जीना मुश्किल लगता हैंखुशी जीतना एक जंग है जिंदगी।कुछ पल ही सही, सट जाने को दिल चाहता हैअपने आप में, सिमट जाने को दिल चाहता है।लोग मुझे पागल समझे या कोई आवाराउनका ही नाम, रट जाने को दिल चाहता है।माँबड़ी से बड़ी गलतियों को माफ़ कर देती है।जानते हो, वह कौन हो सकती है ?सबकी अपनी माँविश्वास दिलाने के लिएवह उसके सीने से सट जाती हैविश्वास पर दुनिया चलती हैयह आभास कराती है माँ।माँ क्या होती हैउस औरत से पूछो ?जिसने एक भी बच्चाजन्म नहीं दियामाँ की आवाज सुनने के लिएवह तड़पती और तरसती हैताने सहती है।मन के अंदरएक घुटन सा प्रतीत होता हैजिंदगी भर तड़प – तड़प करमर जाती है माँ।बेटा खा करपहलवान हो गयाफिर भी कहतीमेरा बेटा भूखा हैये कहती है माँ।माँ को जब भी खाने को पूछोतो कहेगी अभी खायी हूंतुम खा लोअपना ख्याल नहीं रखते ?ऐसा कह देती है माँ।माँ बहुत खुश होती हैजब उसका अपना बच्चाकोई मेडल लेकरअपनी माँ को दिखाता हैगर्व से वह कहती हैदेखो यह मेरा बेटा हैऐसा कहती है माँ।ममता की सागर है माँप्यार भरी गागर है माँदुख – पीड़ा सहन करने कीहर सुकून की आगर है माँ।शिव ही सत्य हैयही तो संसार हैजो वायुमंडल मेंविलिन हो जाता हैन इसका ओर है न कोई छोरशिवलिंगअपने आप में सम्पूर्णजन्म और मृत्यु यहाँपरम सत्य है।एक शिव ही सत्य हैजिसका आदि न अंतपरब्रह्म हैंजिसने ब्रह्माण्ड बनाकरब्रह्मा जी को लायाफिर विष्णु जीशिव का दूतमतलब शिव का छोटा रूपएक रचयिताएक पालन कर्ताऔर खुद शिवसंहारक बनेंशिव का प्रतिरूपअलग – अलग नामों से आएदेवों के देवमहादेवखुद शिव “ऊँ” का प्रतीक हैंसतोगुण, रजोगुण और तमोगुणइनमें विद्यमान हैअनंत शक्ति का भंडारएक विशाल प्रकाश पुँजशंकर के डमरू मेंसातो स्वरशब्दपूरे सृष्टि को जागृत कर देने वालामाया नगरीधरती, आकाश,पवन, अनल और जलजीव – जन्तुमानव प्राणीसभी मेंब्रह्म का स्वरूपयानी आत्माआत्माओं का घर आकाश गंगान जन्म लेती हैन कभी मरती हैबस रूप कास्थानान्तरण होता हैयही संसार है।कारज उत्तम कीजिये, अरु करिये श्रमदानप्रेम का अमृत बाँट कर, करिये हरि गुणगान।करिये हरि गुणगान, काल ने सबको घेराहै अब यही विकल्प, छोड़ दुनिया का फेरा।लिख लो अपना नाम, जिगर है कोरा काग़ज़गीता ज्ञान महान, कर्म है सब का कारज।शिवत्व धारण जो किये, वही किये कल्याणपरम सत्य को जानकर, ही आता है ज्ञान।ही आता है ज्ञान, विज्ञान इसे तुम जानोक्यों बनते नादान, मनुज इसको पहजानो।बनते क्यों अंजान, पा लो तुम भी अमरत्वकर्म धर्म संज्ञान, यही तो होता शिवत्व।जरा सी याद क्या आयी, मुसलसल ख्वाब में डूबेये दिलवर की कहानी है, हम उनके ख्याल में डूबे।ये दिल की बात है कैसी कि धड़कन तेज होती हैइश्क -ए-हाल में डूबे या फिर अपनी चाल में डूबे।गीतिकाछुपा लो सर अब अपना कहीं ये कट न जाएजयचन्दों से हिन्दुस्तान कहीं ये बट न जाए।तुम अपने ही घर आग लगाना अब छोड़ दोबम ये बारुद तुम्हारे सर कहीं फट न जाए।भीतर घात बहुतों कर लिए तुम नाकाब मेंरखिये गहरी नज़र इस पे कहीं हट न जाए।चुन – चुन कर मार दो गोली बंदूक तानकररहो सभी तैयार जब तक ये निपट न जाए।फांसी दो उन सबको जो गद्दारी करते हैंचैन से कहाँ सोना जब- तक ये सिमट न जाय।क्यों खोते अस्तित्व लालच के चक्कर में तुमये वतन तेरा है भाई कसम मिट न जाए।देख लो सीमा पर कितने वीर शहीद हुएअपनी तो रक्षा कर कहीं दुश्मन लिपट न जाय।पतझड़पतझड़ की वाहों में ऐसे लिपट गया वसंतफाग खेलकर आया है बनने को ये कंत।नये कोपलों में सजकर मन को ऐसे भायीहरियाली भी वन- उपवन में हो गयीं मतवाली।डाल – डाल पर कोयल कूके झूमें नाचे मोरचैती गाके मन बहलावे खूब मचावे शोर।इसी माह राम है जन्में दशरथ जी के लालखुशियाँ लेकर दुगनी आई बाजे मृदंग झाल।रंग – बिरंगे फूलों पर तितलियाँ शोर मचातीउसके पराग चूस – चूसकर अपना रंग जमाती।विरह की हाल मत पूछ जिसके पिया नहीं घर मेंआस लगा कर आने को बैठ गई है दर में।वहारों के मौशम में खग सारे धूम मचातेपेड़ – पौधे, झुरमुटों में नीड़ ही नीड़ बनाते।प्रजनन से संसार चलता मौशम बड़ा सुहानाहर जगह होती है मस्ती मस्त औरत – मर्दाना।फागुन – चैत बड़ा रंगीला “बिन्दु” को मन भाएप्रदेश में रहने वाले घर छुट्टी लेकर आए।कुण्डलियाअपना उनको जान कर, मरहम दिया लगायमर तो हम खुद ही गये,अपना फर्ज निभाय।अपना फर्ज निभाय, देखो बहुत हम तड़पेकरे कहाँ विश्वास, रातो – दिन हम कलपे।अंतर्मन बेहाल, देखा उसी का सपनापराई हुई आज, जो नहीं था अब अपना।किस्मतवालादौलत पाकर भी भूखा है, वाह रे दौलतवालाचैन कहाँ मिलता है उनको, वाह रे किस्मतवाला।देखन भर का पेट बड़ा हैखाते तीन ही रोटीदवा – दारु बीस – बीस पुड़ियासाथ चार – चार गोटी।कई बिमारी अंदर उनकेलगी है ऐसे भाईनींद कहाँ आती है उनकोचिंता है बस कमाई।पैसे पर जिंदा रहते हैं, वाह रे हिम्मतवालाचैन कहाँ मिलता है उनको, वाह रे किस्मतवाला।सात हवेली बड़ी – बड़ी पररहनेवाले हैं पाँचएक है बेटी दो पत्नियाँबूढ़ी माता है साँच।माँ छोड़ो, चारों को देखोसबके हैं अलग मिजाजबेटी की तो पूछ मत भाईनाक पर काटे प्याज़।धोटाले में नाम किया, वाह रे शोहरतवालाचैन कहाँ मिलता है उनको, वाह रे किस्मतवाला।कब – तक है ठगना दुनिया कोकारागार है जानाआज नहीं तो कल पकड़ेगेदेंगे लोग सब ताना।जितना जमा पुँजी है तेरीसभी पर होगा धावाबच पाओगे कैसे तुम अबचलेगा नहीं दिखावा।फर्क नहीं पड़ता है उन पे ? वाह रे कलियुगवालाचैन कहाँ मिलता है उनको, वाह रे किस्मतवाला।खुलने में तकदीर को, लग जाती है देरहिम्मत नहीं बिसारिये, कालो का सब फेर।माझी भी मझधार में, यही सोचता रोजआज तो भूखे रह गये, फिर होगा कल खोज।प्रदत्त शब्द पर दोहेपरमधाम आनन्द है, योग तप अरु ध्यानप्रेम नहीं तो कुछ नहीं, क्या है ज्ञान – विज्ञान।परमहंस का है नमन, सुनलो नाथ पुकारनाव बीच मझधार है, उसको कर दो पार।यह जीवन अनमोल है, पैसो में मत तोलसत्य न्याय अरु धर्म की, बाजे हरदम ढ़ोल।दोहा ग़ज़लकरना था सो कर गये, तुम मत करना यारइसमें इतना है कहर, छोड़ो करना प्यार।कितने पागल हो गये, अरु कितने बर्बादबात मान लो मीत तुम, जलता ये अंगार।जो भी इसमें है फंँसा, हुआ हाल – बेहालउनसे जाकर पूछ लो, हुआ आज लाचार।तरस-तरस के आदमी, तड़प-तड़प मर जायदिल रोता मन बोलता, चैन – रैन बेकार।पैसौं का यह प्यार है, पैसौं का यह खेलइतना तो मैं कह दिया, अब तो करो बिचार।चाँद और सूरजहम अंँधेरा दूर करते हैं, तुम अंधियारा लातेहम से बैरी क्यों है तुमको, क्यों नहीं मुझे बताते।कर देते उजियारा जग को,हम अपना तन जलातेहोते सांँझ मद्धिम पड़ जाते,नींद पड़ते अकुलाते ।मैं दिनकर, तुम तमस रात की,बैरी क्यों तुम जात कीतुम आते तो मैं भी जाता,मेल नहिं मुलाक़ात की।प्यार का पैगाम है तुझमें, चाँदनी बहार तुझमेंतेरी रात भी है सुहानी, तेरा अधिकार तुझमें।दोनों का है कर्म निराला, धर्म बड़ा मर्म प्याराअपना ही कर्तव्य निभाता,सभी आँखों का तारा।हम सब करते उनकी पूजा,ये शक्ति बड़ा अजूबासमय चक्र इनके हाथों में, कितना नेक मंसूबा।इनसे ही दुनियाँ चलती है, मौशम भी है बदलताधरा हमारी खुश रहती है,जल-वायु जिसमें पलता।पर धरा नाराज़ आज इतनी, काटे सभी वन – उपवनजल को भी ये प्रदुषण करते, बिगाड़ते अपना चमन।क्यों नहीं हम लीख पाते दूसरों की तरहक्यों नहीं कुछ सीख पाते दूसरों की तरह।विचारों के मंथन से शब्द मिल जाते हैंपर क्यों ना दिख पाते हम दूसरों की तरह।शब्दों में केवल जान ही तो खोजने हैंकाश, मंचों पर चीख पाते दूसरों की तरहगीतिकाकिसी ने गम दिया किसी ने हँसाईकैसा मिलन है यह कैसी जुदाई।दर्द – ए – जिगर का होना ना होनाबताए हम किससे मांगे दवाई।वो यादे, बहारें दफ़न हो गयी अबबेवफ़ा बन गयी अब वो हरजाई।बहुत हम तड़पे बहुत चोटें खायीकसमें वो खाकर न वादा निभाई।सफर इश्क का इक तुफ़ानी लहर थाकैसा कहर था जो कस्ती डुबाई।जहाँ भी रहो ये दुआ है हमारीमुबारक हो तुझको तेरी विदाई।मुहब्बत को”बिन्दु”परख कर है देखामजा जितना इसमें सज़ा उतना पाई।वसंती होलीरंग – गुलाल के इस मौसम मेंमस्ती देखो आईघर – घर में खुशियों का आलमहर – बस्ती में छाई।फूलों से सज जाती बगियाहरी – भरी ये धरतीउन पर भौंरे गीत सुनातेतितली खूब उमड़ती ।आम्र – लीची के चढ़ी जवानीतितली हुई दिवानीबूढ़े – जवान, बच्चे भी अबकर देते नादानी।फागुन का दिन बड़ा निरालाहोता हुड़दंग होलीहवा वसंती जब – जब चलतीकसमस करती चोली।कुहू – कुहू कोयल भी गातीमन को बड़ा लुभातीहर बिरहन के मन को देखोकैसे ये भरमाती।इधर सोंधी मिट्टी की खुशबूउधर महक फूलों कीसुरभित कर दे मन की बगियाफौज खड़ी धूलों की।चौपालों पर झाल – मजीरालेकर होरी गाएझूमे – नाचे और खुशी मेंसबका दिल बहलाए।भेद नहीं कुछ मन में रखतेसाथ में भाई – भाईदुश्मन भी दोस्त बन जातेभर जाते सब खाई।चढ़ जाती खुमार होली कीमजे में देवर भाभीभंग की गोली खाकर भैयाबंद अकल की चाभी।

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