।। मेरे उदगार।। ( दिनांक ३१/०३/२०२० को होने वाली अवकाशप्रप्ति हेतु मेरे उदगार )

फोटोप्रतीक्षा की है निश्चित अवधि ना घटती है, ना बढती हैसमय की धुरी पर पल पल यह आगे चलती रहती है ।। १ ।।समय पूर्ण होते ही, प्रतीक्षा भी होती समाप्त।कार्य करा कर पूर्ण समय से, हो जाती है पुनर्व्याप्त ।। २ ।।एक प्रतीक्षा पूर्ण हुई, अविलम्ब दूजी ने लिया जन्म।प्रतीक्षारत की प्रतीक्षा में, इक नई कड़ी का बढ़ा मर्म ।। ३ ।।मैं भी दीर्घकाल से, अवकाशप्रप्ति की करता रहा प्रतीक्षा ।कब होगी अवधि समाप्त, जब स्वामी होगी मेरी इच्छा ।। ४ ।।वर्ष पैंतीस माह दो दिवस चौदह की, जब होगी परीक्षा पूर्ण ।समय की सीमा होगी समाप्त, जीवन होगा उल्लासपूर्ण ।। ५ ।।पाए खोए का विश्लेषण करने को, है उत्सुक मन ।करता हूँ समय का विश्लेषण, ईश्वर को करते हुए नमन ।। ६ ।।समय की सरिता की बहती धारा में, क्या खोया और क्या पाया ।क्या बहा धारा के प्रवाह में, क्या सिमट मुट्ठी में आया ।। ७ ।।यह सब खोजने हेतु, अतीत की गहराई में लगाना होगा गोते ।गहराई को नापकर ही नाविक हैं, कुछ पाते खोते ।। ८ ।।गुरुवार जनवरी सत्रह वर्ष उन्नीस सौ पचासी ।ओरिएंटल का बना सदस्य, ज्यों पाई अनुपम रासी । । ९ ।।हे दयालु परमेश्वर ! तूने इस याचक पर कितना बड़ा उपकार किया । सुख दुख में साथ खड़ा होने वाला, “ओरिएंटल” सा परिवार दिया ।।१०।। समय की परिवर्तनशील गति में, अनेकों आगंतुक जुड़े परिवार में । कुछ बिछड़े सदा के लिए, काल की बहती धार में ।। ११।। इस वर्ष ही खोए हमर्ने, 'अशोक' और ' मुकेश 'से कर्मवीर । जिनके बिछोह की पीड़ा ने, किए हमारे हृदय अधीर ।। १२ ।। ईश्वरीय विधान पर मानव का, जोर न कदापि चल पाता है । दुख दाता ही दुख हर्ता बन कर, बेड़ा पर लगाता है ।। १३ ।। ईश्वर से करता हूँ विनती कि, असमय बिछुडो की आत्माओं को शांति प्रदान करें । दुख सहन कर सकें परिजन, ऐसी शक्ति प्रदान करें ।। १४ ।। “ओरिएंटल” की अवधि की गाथा भी, संतोष से परिपूर्ण रही । संतुष्टि असंतुष्टि के थपेड़ों खाकर जीवन की थी नाव बही ।। १५ ।। सेवा अवधि के दौरान, तीन पीढ़ियों से अनुभव पाया । बढ़ती उम्र बढ़ते अनुभव, ने मुझको परिपक्व बनाया ।। १६ ।। पहली पीढी़ को प्रणाम, जिनसे मैंने बहुत कुछ सीखा । जो रहे हमारे बड़े वरिष्ठ, उनसे कार्यालय का तरीका सीखा ।। १७ ।। उनकी सीखों और अनुभव से, बहुत कुछ समझ में आया । गुरु क्यों होता आदरणीय, तब यह अनुभव में आया ।। १८ ।। प्रथम पीढी़ हुई अवकाश प्राप्त, हम उम्रों का समय आया । सेवा की बढ़ती अवधि में, अपना अनुभव भी गहराया ।। १९ ।। कभी हम उनके कभी वो हमारे, बने थे सहयोगी । एक दूसरे के अनुभव, हुए हम सबके उपयोगी ।। २० ।। दूसरी पीढी़ का भी, हूँ मैं ह्रदय से आभारी । जिनसे पाया वह सम्मान, जिसका था मैं उचित अधिकारी ।। २१ ।। इस पीढी़ के साथ ही, फिर इक नया युग आया । जिसमें बच्चों के साथ भी, मिलने का नव अवसर पाया ।। २२ ।। बच्चे मेरे अफसर हुए, पर मैंने 'बेटा' कहकर बुलाया । यह भी इक उपलब्धि बड़ी, सम्मान बड़ों सा मैंने पाया ।।२३ ।। उच्चाधिकारियों का सहयोग, नई पीढी़ का सम्मान । यह सब मिलकर कराते मुझको, संतुष्टि का भान ।। २४ ।। ईश्वर को आभार मेरा कि, कितना बड़ा परिवार दिया । जो हर सुख दुख का साथी है, जिसने भरपूर प्यार दिया ।। २५।। प्रथम पीढी़ का आशीर्वाद लिए, हम उम्रों को मेरी शुभेक्षाएं । पाएं वे जीवन में सब कुछ, जो हैं उनकी आशाएं ।। २६।। नवपीढी को संदेश मेरा, यदि किसी स्तर पर मैं लगा अच्छा । मेरी अच्छाई को तुम भी अपनाओ, ताकि भावी पीढी भी तुम्हे कहे अच्छा ।। २७।। अच्छा अब लेता हूँ विदा, मायूस न होना मेरे प्रियजन । आँसू न मुझको भाते हैं, करो प्रफुल्लित अपना मन ।। २८ ।। जब तक श्वासों की डोर चलेगी, सदा तुम्हारे साथ रहूँगा । जब भी मुझको याद करोगे, बीच तुम्हारे खड़ा हूँगा ।। २९ ।।
आपका अपना अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव

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