शहर बनारस…

कल कल निनाद करती भागीरथ,
ब्रम्हमुहुर्त काल कानो में पडता शंखनाद,ये वही घाट जिसके स्वरूप विराट,मसान में जलती अर्जित तेरी ठाट बाट,महाकाल की कोतवाली में पुलकित अन्तर्मन,अघोर पंथ की भस्म लपेटे नग्न तन,लौह को स्वर्ण कर दे वही ये पत्थर पारस हैशिव अंतः में बसा ये तुलसी का शहर बनारस है
 
बसंत की छाती में जहा बसता है यौवन व्यन्जन की खुशबू में रमता अल्हड मन रामनगर की लीला में अब भी दिखते राम मधुबन में गोपीयो संग मुरली बजाते है श्याम ,दो प्रचलित प्रसाद यहा के भांग खाओ या पान ,अस्सी घाट पर ख्यातिलब्ध है पप्पू की दुकानजिस पछी ने प्रेम सिखाया यही वो पछी सारस हैशहनाई के सुर संजोये ये बिस्मिल्लाह का शहर बनारस है
 
सारनाथ जहाँ धर्मो के शिलापट्ट रखे हो,
धर्मचक्र जहाँ गौतम बुद्धा ने उपदेश गढ़े हो ,मोक्ष प्राप्ति का अंतिम द्वार है काशी ,महाप्रलय को मात है देता ये अविनाशी ,जब अड्भन्गी शिव का डमरु डम ड्म बोले ,प्रेत पिशाच सन्खिनी डकिनी सब बम बम बोले ,इस धरा की कोख से जन्मे यही वीरता का यश हैघूम लो इसके गली गली ये गलियो का शहर बनारस है
                                             
                             लेखक                                              अनुपम शुक्ल.                                सर्वाधिकार सुरक्षित 
                  काशी हिन्दू विश्वविद्यालय

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