कोरोना की मार

वो शहर सुनी सी हो गया हैंजिसमें लोग तारें की तरह जगमगाते थेंवो गलियां जहां से लोग निकलते थेंकुत्ते की आवाज़ भी अब सुनाई नहीं देती हैंअब कुत्ते भी आराम से बैठे हुए हैंवो चौराहे जहां से लोग निकलकर एकजुट होते थेंवो भी सन्नाटे में तब्दील हो गई हैंपता नहीं सुना है कोरोना की मार लग गई हैं।जहां से गाडियां की भीड़ निकलती थीवो भी नहीं निकल रहीं हैंअब लोगों का मन भी उदास सी रहने लगीं हैंपहले लोग अपने जान पहचान से मिलते थेंतो हाथ मिलाकर गले लगाते थेंअब तो लोग बोलने से भी डरते हैंपता नहीं सुना हैं कि कोरोना की मार लग गई हैं।अब क्या करू इस गम सी पल में आराम से बैठ जाता हूंअपने घर की बिस्तरो परवो सब्जी की दुकानेंवो फल की दुकानेंभी उदास सी दिखने लगीं हैं।पहले जाता था तो पूछता थाकि भाई साहब कितने की किलों हैंअब तो वो भी लिखा रहता हैंवो अब बोलतें नहीं हैंपता नहीं सुना हैं कि कोरोना की मार लग गई हैंअब दिन भी सही से कटता नहींपहले बच्चों की किलकारियां सुनाई देती थीअब वो भी नहीं सुन पा रहा हूं।वो उगने वाला सूरज भीअब कभी-कभी बादलों में छिपा रहता हैंपता नहीं सुना हैं कि कोरोना की मार लग गई हैं।पहले लोगों के चेहरे पर मुस्कुराहट और मायुसिया झलकती थींअब तो सिर्फ मास्क ही झलकते हैंअब वो पार्क भी बंद हो चुकी हैंजिसमें लोग हरियाली की दर्शन करने जाते थेंअब वो म्यूजियम भी बंद हो चुकी हैंजिसमें लोग हतिहास को देखने जातें थेंवो चिडियाघर भी बंद हो चुकी हैंजिसमें लोग मन बहलाया करते थेंसारी दुनिया गम में डूबी हुई हैंपता नहीं सुना हैं कि कोरोना की मार लग गई हैं। कवि भूषण कुमार

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