सुहागरात:-विजय

जिस्म को जिस्म से मिल जाने देरूह को रूह से उलझ जाने देये जो रात है आज सुहाग कीइस रात में खुद को गुम जाने देवर्षो की प्यास को आज बुझ जाने देतन की आग को आगोश में बुझ जाने देशुरुआत जो हुई है इस रंगीन सफर कीइस सफर को एक हसीन मंजिल मिल जाने देसांसो को सांसो से आज टकरा जाने देलबों की लाली को लबों से फीका हो जाने देइस कमरे में राज जो है खामोशी कीदफन खामोशी को आंखों-आंखों से कर जाने देशरीर के अंग-अंग को आज टूट जाने देथकान के आज सीमा तक पहुँच जाने देसजावट हुई है जो इस मखमली बदन कीइस सजावट को आज बेतरतीब हो जाने दे

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5 Comments

  1. DEVESH DIXIT 15/03/2020
    • vijaykr811 15/03/2020
  2. डी. के. निवातिया 16/03/2020
    • vijaykr811 18/03/2020
  3. harish 13/04/2020

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