रिसते हुए नासूर – शिशिर मधुकर

हरदम रहे है साथ मगर दिल तो मिले नहीं बगिया में महके फूल तभी देखो खिले नहीं जाने क्या क्या सोच कर के मैं खामोश हो गया चुप हूं तो ये समझो नहीं मुझको गिले नहीं घावों को देख कर मेरे नफरत हुई उन्हें रिसते हुए नासूर कभी मुझसे सिले नहीं मरने के बाद ही उन्हें शौहरत मिली जरा जो जिद पे अपनी अड़ गए बिलकुल हिले नहीं भीतर कोई ना साथ था और वार हो गया वरना तो मधुकर ये कभी ढहते किले नहीं शिशिर मधुकर

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4 Comments

  1. vijaykr811 13/03/2020
    • Shishir "Madhukar" 14/03/2020
  2. Rambhavan 13/03/2020
    • Shishir "Madhukar" 14/03/2020

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