सोच अलग हो सकती है। क्या ममता भी खो सकती है बात अपनी मनवाने को क्या इनसानियत भी खो सकती है इक जान जिसको जन्म दिया ख़ातिर चन्द सिक्कों के जाने कैसे उसे वार दिया गर्म बिरयानी खाने को मासूम साँसों से हिसाब किया क्रूर इतना कोई हो सकता है अपने ही बच्चे को क्या यूँ ही कोई खो सकता है इक माँ ने आज माँ होने का अर्थ ही बदल दिया क़िस्से बहुत सुने थे हमने भूखी रह कर भी माँ बच्चे की जान बचाती है बिरयानी की ख़ातिर आज बच्चे की जान गँवाती है सिर शर्म से झुक जाता है जब एैसी बातें होती हैं ममता शर्मसार होती है आँखें नम हो जाती हैं यह कैसी माँ और कैसी ममता कहाँ गई वो सी ए ए की रट्ट कुछ ही समय में सब गया पलट अब पसरी है ख़ामोशी वहाँ शाहीनबाग़ में शोर मचाया मासूमों से जिहाद करवाया मगर दिल को रहम न आया करते थे जो सी ए ए का बहाना दीवाने सब वो कहाँ गए स्वार्थ जब हो गया पूरा सब आँख बचा कर निकल गए इनसानियत को शर्मिन्दा कर गए ममता का अर्थ बदल गए सोच अलग हो सकती है हार जीत के लिये क्या ममता भी खो सकती है

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