संगम नहीं करते – शिशिर मधुकर

सजा मालूम होती गर मुहब्बत हम नहीं करते अपनी आंखों को देखो आंसुओं से नम नहीं करते मिला कुछ भी नहीं होता स्वप्न ज़िंदा तो रह पाते मिला जो लुट गया ये सोच कर के गम नहीं करते बड़ी फ़ितरता अलहदा है हमारी जान लो तुम भी बदलते वक्त के संग हम मुहब्बत कम नहीं करते कोई तो बात है तुझमे जो हम सर को झुकाते हैं वरना पूजा तो हम भगवान् की हरदम नहीं करते बहा करता था ये दरिया फकत ले मीठे पानी को काश खारा सा होने को जलधि से संगम नहीं करते शिशिर मधुकर

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4 Comments

  1. डी. के. निवातिया 07/03/2020
    • Shishir "Madhukar" 08/03/2020
  2. DEVESH DIXIT 11/03/2020
    • Shishir "Madhukar" 14/03/2020

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