कविता- देश में फैली ये तमाम बातें कैसी?

इंसानियत की बात करते हो हरदम,
फिर ये  फैली नफरत की आग कैसी?….
सुकून की तलाश में निकले हो सब
फिर ये आतंक – हिंसा की बात कैसी?…
रहते हो तुम सब अमन चैन से,
फिर ये उठती आज़ादी की मांग कैसी?…
आधार प्रूफ तुम सब रखते हो तो ,
फिर इसमें डरने की ये सब बाते कैसी?….
लड़ जाते थे तुम दोस्त के खातिर दुश्मनो से भी,
फिर आज अपनो पर ही ये चोटे – आघाते कैसी,?….
तुमने भी चले हो सड़को पर अमन के खातिर कभी,
आज उन्ही सड़को पर खून से लतपथ लाशें कैसी?….
करुणा दया तुम भी रखते हो ,अपने ज़िगर में,
फिर ये बढ़ती दरिंदगी की राते कैसी?….
तुम जब ठहरे सच्चे भारत वासी
फिर ज़हन में उठती आतंकी नारेबाजी कैसी?….
बात करते हो तुम  ,बापू के अतुल्य विचारों की,
फिर राजनीति के गलियारों से, षडयंत्रो की बाते कैसी?..
कसम दिया करते थे कभी जिस हिंदुस्तान की तुम ,
आज उसी के बर्बादी की सौगाते कैसी?..
रहो चैन से तुम भी यहाँ, रहे चैन से हम भी यहाँ,
आखिर इक ही परिवार में, ये तमाम प्रकार की बाते कैसी?
कबिता- देश मे फैली ये, तमाम बातें कैसी?
  • Written by~azad verma (AJ.)

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