न जाने क्यूं

न जाने क्यूं इतनी घबराहट हो रही हैशायद तुम्हारे दूर जाने की घड़ी नजदीक आ रही है 😞बेबस हूं सूखे पत्तों सा मैबहुत रही हरियाली, फिर वही पतझड़ कि ऋत आ रही हैडरा सहमा सा बैठा हूं, अपने ही साये से मैमुझे मेरे ही चेहरे से नफ़रत सी होती जा रही हैमै वाक़िफ हूं, मेरी नजर मुझे ही लगेगीमेरी खुशियां फिर से मुझसे नज़रे चुरा रही हैंएक डर, शिकन साफ झलक रही हैं मेरे चेहरे परये तेज होती धड़कने मुझे और डरा रही हैंन जाने क्यूं इतनी घबराहट हो रही हैशायद तुम्हारे दूर जाने की घड़ी नजदीक आ रही है 😞

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4 Comments

  1. CB Singh 02/03/2020
  2. DEVESH DIXIT 02/03/2020
  3. vijaykr811 02/03/2020
  4. डी. के. निवातिया 03/03/2020

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