खुद से ही दूर हुए जा रहा हूं

खुद से ही दूर हुए जा रहा हूंजिनके दिलों में रहते,पास उनके ना होने की मजबूरी है।घर जिनके हैं पास,उनके दिलों से कितनी दूरी है।इन गैरों की बस्ती में अपनों को तलाशने की नाकाम कोशिश किए जा रहा हूं ।।इनकी स्वार्थ में भी परमार्थ की आस लगाए खुद से ही दूर हुए जा रहा हूं।।महीने की अंतिम तारीख तय करती जहां,आपकी इज्जत का आकार।शालिनता और ईमानदारी आपकी समझी जाती जहां विवशता का आधार।समझते-समझते इन चेहरों की उलझी हंसी खुद को ही खोए जा रहा हूं।।जीवन सरिता में मेरे जिसका अस्तित्व बूंद-भर का भी नहीं,कथनी-करनी से उनके होकर फितुर खुद से ही दूर हुए जा रहा हूं।।जोड़े जाते जहां रिश्ते, गिनकर घर के ईंटें।कद्र नहीं वहां स्वाभिमान की ऐ हमदम,डोर-मेट नहीं, गरीब की चादर में पोंछे जाते जहां कीचड़ के छींटें।रहकर काजल की कोठरी में,कालिख का कुसुर‌ औरों को दिए जा रहा हूं।।कागज़ों से साबित होते रिश्ते जहां,होकर सोल मेट‌ और कामरेड किसी का खुद से ही दूर हुए जा रहा हूं।।रंगने को महफ़िल अपनी बातों से,खुद पर ही हंसता हूं क‌ई रातों से,किया सितम हमने ऐसा अपनी हालातों से,कि खेलने लगे सब आज मेरे जज्बातों से,उनकी पसंद का जीते-जीते हर क्षण मरे जा रहा हूं।।और इन बेवजह लोगों की बेवजह बातों से होकर मगरूर खुद से ही दूर हुए जा रहा हूं।।

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