विनी

विनिविनय के वि, निवेदिता के नि से हुई विनि नाम की कृति।पापा की सादगी और मम्मा की शालिनता ही है उसकी प्रकृति।।चेहरे का उसका ऐसा कमप्लेक्शन।पूनम की रात में होता जैसे चांद से प्रकाश का रिफ्लेक्शन।।शालिनता और सादगी ‌ऐसा, जैसे हो कोई आयस्टर की पर्ल।ब्यूटी और फैशन की है वो पोस्टर गर्ल।।विनि हमारी बस तीन बरस की,अक्ल से है सबकी दादी-नानी।बातें करती ऐसी मनभावन, जैसे हो किसी मूवी की स्क्रिप्टेड कहानी।।पर सामने उसके,जब कोई बनता ज्ञानी।पहले तो होती उससे कट्टीस, फिर सबक सिखाती ऐसे, जैसे अंग्रेजो को झांसी वाली रानी।।वैसे तो शहद-सी मीठी है उसकी वाणी।पर अगर किसी ने उसकी बात ना मानी।।पटना, कोलकाता,पोर्टब्लेयर बन जाता उसका जंगल और वो गरजती ऐसे, जैसे गरजती शेरनी रानी।।कभी बनती पापा की लाडली, तो कभी मम्मा की प्यारी।जब जैसी उसकी जरूरतें हों सारी।।करते हुए नृत्य, चेहरे पर लाती है ऐसा एक्सप्रेशन।देख उसकी ये कला, करीना, कटरीना को भी हो जाए अपने करियर में डिप्रेशन।।खाने में वो करती नखरें हजार।वेज हो या हो नानवेज, या हो फ्रूट्स या वेजिटेबल का कोई प्रकार।।पर पापा को खिलाने से है उसे इतना प्यार।कि रोज परोसती थाल में उनकी, खुद से बनायी रोटी चार।।ईश्वर ने अपनी इस कृति में किया, पिछले सभी गलतियों का करेक्शन।देकर विनि को ब्यूटी और इंटेलिजेंस का बेमिसाल परफेक्शन।।होकर इससे रूबरू, कहते हैं सब अपने यकीन पर।लगता है सच में हैं, तारें जमीन पर।।

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