हमारी सरकार – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

हमारी सरकार क्या करेगी

पैंतिस वर्ष पूर्व का लिखा अपना एक अनुभव आप सबों के सामने पटल पर रख रहा हूँ, जिसे मैंनें लिपिबद्ध किया है।राष्ट्र के नजर में हम सारे भारतवासी बिलकुल ही स्वतंत्र हैं, पर समाजिक, आर्थिक और राजनैतिक कुरीतियों ने उसके गले घोंट दिए हैं। जनसाधारण इस तरह के दलदल में फंसे अपने सुंदर से पाँच तत्वों का बना शरीर आहूति हेतु उसके लिए ही प्रस्तुत हो गये हैं। राष्ट्र के कुछ कर्णधार अधिकारी अपने ही राष्ट्र के भावनाओं को कैंसर जैसे खतरनाक बीमारी से लादकर विपत्ति में डाल दिया है। हम बुद्धिमान होकर भी अज्ञानता के औषधालय में स्वार्थ और वैमनस्य की पट्टी बांधकर उन खतरनाक कैंसर जैसी बीमारी से जूझ रहे हैं। साथ साथ हम इसके ईलाज हेतु चिकित्सालय में अनेकानेक चुनौतियों का नामुमकिन कोशिशें भी कर रहे हैं। मेरा मतलब देश के कुछ एक अध सरकारी अधिकारीयों से है, जिसने पूरा देश बर्बाद ही कर रखा है। चाहे वह जो भी सरकारी संस्था हो। उन संस्थाओं पर भ्रष्टाचार के पोस्टर सबसे पहले नजर आती हैं। किसी कार्य के लिए जब कोई भी उन अधिकारियों के पास जाता है तो वे उनके साथ एक ग्राहक के रूप में ही उन्हें स्वीकृति मिलती हैं।बिना मुट्ठी गरम किए उनका काम ही नहीं होता। ऐसा लगता है यह उनका निजी ब्यापार है। चाहे वह अंचल क्षेत्र हो, कचहरी, शिक्षा, चिकित्सा, रेल संस्था आदि – आदि क्यों न हो, इसकी समीक्षा में कुछ न कुछ सलामी जरूर भेंट करने पड़ते हैं। काम करने के एवज में उन्हें कुछ न कुछ तो बनता है, चाहे गरीब अपनी जमीन बेचकर दे, जेवर गिरवी रखे या फिर ब्याज में पैसे लेकर उसे चुकता करे।गरीब अपने छोटे बड़े सरकारी कार्य हेतु उन अधिकारियों के पीछे लट्टू बने रहते, तलवे सहलाते और यहां तक की उनके घर में भी जाकर घंटों काम करते पर अधिकारियों का जो फीस (रिश्वत) होता वह लेकर ही दम लेते। हम उनसे जूझ कर भी क्या कर सकते हैंउत्साही आदमी इन क्षेत्रों के खिलाफ जब कोई आवाज उठाता तो वह अधिकारी पुलिस की धमकी देकर उसे कुव्यवस्थाओं के तहत कुचलवा देते। इन क्षेत्रों में पुलिस अधिकारी और उनके सदस्य भी कम नहीं, शुल्क भले ही कम ज्यादा हो पर फ्री की कोई गुंजाइश नहीं। आज हमारी अपनी संस्कृति की पहुंच हद से ज्यादा ही गिर कर बिखर रही है। एकता की दिशा में आज सबका ध्यान बदलता जा रहा है। हम अपने नैतिकता से फिसलकर काफी पीछे चले गये हैं। पश्चात हमारे बीच लड़ने-झगड़ने की नौबत उत्पन्न होकर हमें ललकार रही है। आज का धर्म संघर्ष का प्रारूप लेता जा रहा है। संकट खुले आकाश में गिद्ध कि तरह मंडरा रहा है। कोई जेट विमान की तरह यह गिद्ध कब संघर्ष में उतरेगा कोई नहीं जानता, आधुनिक कंप्यूटर का जमाना भी इसे नहीं जानता। प्रेम नाम का दर्शन, आज समझौता बनकर बुद्धिशील लोगों को उकसा रहा है। सांप्रदायिक दंगे फसाद, बढ़ते आतंकवाद,राजनीति संघर्ष का रूप धारण करते जा रहे हैं। जिस तरह एक जीवन से हारा हुआ इंसान दर बदर की ठोकरें खाता है, ठीक उसी प्रकार से हमारा विशाल राष्ट्र और हम समाज के गणमान्य लोग भी उनके लहरों के थपेड़े खाकर अपने आप को कोसता है। निरपराध लोग बेमौत मारे जा रहे हैं। आज भारत का हर क्षेत्र राजनीति का मैदान बनकर विभिन्न धर्मों के बीच एक डंका बजा रहा है। यह डंका और कोई नहीं बस युद्ध की तैयारी की डंका है। भारत का अनेकता में एकता का देश होना स्वाभाविक ही है पर आज यह सक्षम नहीं। राष्ट्र का प्रतीक तिरंगा झंडा जिसके नीचे हम हर जाति धर्म के लोग राष्ट्रीय पर्व पर एक साथ मर मिटने के लिए तैयार होते हैं। थोड़े समय के लिए एकता की बागडोर भले ही मजबूत होकर रह जाती है पर जब वे अपने कामों में फिर से लगता है तो झूठ असत्य में संलग्न होकर अपने निजी पेसे आ आते हैं। गांधीजी का कथ्य जनसाधारण लोग समझ कर और क्या कर सकते जबकि उन्हें ऊपर उठने का कोई साधन या शिक्षण मुहैया नहीं होता। इस तरह उस की अभिलाषा केवल अशोभनीय रह जाता अथवा एक सपना। हमलोग अपने कल्पना मात्र से बहुत दूर की बातें सोच लेते हैं लेकिन यह कल्पना सिर्फ कल्पना ही रह जाती। अच्छे स्वभाव समाज में भी उनकी गिनती नहीं हो पाती और वे पागलों की भांति मन-ही-मन चांद सूरज की परिक्रमा कर अपने आप में सीमित हो जाते हैं।आज देखा जाय तो हम सरकारी लोग भारतीय हैं ही नहीं, अधिकारी एवं उनके सदस्य आज अंग्रेज के रूप में हैं। हम इनकी हुकूमत पर चलते हैं फिर हमें स्वतंत्रता कहां नसीब। जिसके डर में हम बरसों पहले गुलाम थे उसका डर आज भी हैं। अंतर यह है कि आज इन से टक्कर लेने वाला कोई नहीं। प्रतिद्वंदी नहीं… ।आज स्वतंत्रता महज देखने व सुनने के लिए रह गयी है। इसमें हमें लाभ नाम का कोई चीज नहीं देखने को मिल रहा है। किसी का खून पी जाना क्या यही स्वतंत्रता है। एक तरफ लोग सूखी रोटी के लिए अथक प्रयास करते हैं। आप भी करते होंगे। आप जानते हैं कई लोगों को रोटी तक नसीब नहीं होती और दूसरी तरफ मलाई मार कर खाने बाले भी आपने देखे होंगे।क्या यही हमारी स्वतंत्रता है जहां की जनता भूखी रहती हो, धरती ही अपना बिछावन समझकर चिथड़े में लिपटे लोग उस पर सो कर अपनी दिनचर्या बिताते हों। धन्य है हमारा भारत … हमारी सरकार।

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  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 25/02/2020

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