यादें

नम ये आँखे हुईं, याद आने लगे, गीत यादों की खुद को सुनाने लगे।
तुम तो तुम ही रहे, मैं ना मैं रह सका,
वक्त से हारा तुम से ना कुछ कह सका।
तुम समझ ना सके, ना ही समझाया मैं,
खो के सबकुछ बस इतना सा ही पाया मैं-
दूर जाने लगे, खुद को पाने लगे,
गीत यादों…..
थी तमन्ना या बस ख्वाब था वो मेरा,
या फिर जिद या था बस बचपना वो मेरा।
था धुआं जो खतम हो गया आगे बढ़,
या फिर मासूमियत को लिया तुमने पढ़।
याद कर-कर के सबकुछ भुलाने लगे,
गीत यादों…..
मैं गलत था या तुम सोचता मैं रहा,
बस बुरे वक्त को कोसता मैं रहा।
मैंने हर ज़ुर्म को माफ़ हंस कर किया,
तुमने इक जुर्म पर मुझको ‘बस’ कह दिया।
हम मनाने लगे, तुम सुनाने लगे,
गीत यादों……
मैं बुरा हूं अगर, कौन अच्छा यहां,
है सही फिर भी कोई ना सच्चा यहां।
है ये मौका- परस्ती की बस ज़िन्दगी,
कोई हंस दे यू हीं, वो नहीं बंदगी।
क्यूं ये गैरों से एहसास आने लगे,
चेहरा फेरे जो तुम आज जाने लगे।
गीत यादों….
ये कैसी है दुनिया समझ में ना आई,
किन गुनाहों की मैंने सजा आज पाई।
खुशी को लुटाया दुःखी होने पर भी,
पर कोई खुशी ना दिया रोने पर भी।
दाग रिश्तों में क्यूं आज आने लगे,
साथ खड़े गैरों में तुमको पाने लगे।
गीत यादों…..
ना यहां राम – सीता, ना है भागवत गीता,
सुदामा ना कोई कहर जिसपे बीता।
ना कोई यहां उर्मिला बन सकी है,
ना माता कोई कृष्ण को जन सकी है।
आज रावण को रावण जलाने लगे,
राम कैसी ये दुनिया बनाने लगे।
– उमाशंकर मिश्रा

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  1. डी. के. निवातिया 25/02/2020

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