कहानियाँ – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

[2/18, 19:17] Bindeshwar Prasad Sharma: विक्की की बहादुरीबच्चों की जिंदगी भी अजीब है । उनके अलग – अलग स्वभाव उन्हें अलग अलग क्षेत्रों में ले जाता है। जो पसंद आ गया बस उन्हें वही चाहिए। अपनी पसंद के पीछे लट्टू होना स्वाभाविक ही है। मेरा भी एक लड़का, बस इसी तरह का अडियल टट्टू है। इसकी कहानी भी कुछ इसी तरह की है। पालतू जानवरों से प्यार, जंतु जगत पंछी से प्यार इसकी अपनी रुचि है । मेंढक को देखा तो सोच लीजिए दिनभर उसके पीछे पागल हो गया । समय का उसे पता ही नहीं चलता कि कब शाम हो गयी और कब सुवह। खाया कि नहीं कुछ ख्याल – ध्यान नहीं । जब जोरों की भूख लगती तो वह खुद व खुद दौड़ा – दौड़ा अपने घर आ जाता। तब वह मम्मी से मांगकर खा लेता। पढ़ाई-लिखाई के नाम पर जैसे उसकी नानी ही मर जाती। खींच खांच कर अभी वह आठवीं कक्षा में पहुंचा था। उसके 13 साल के उम्र यूं ही निकल गये, जैसे उसके लिए उम्र की कोई अहमियत ही नहीं हो। 13 साल के उम्र में वह काफी लंबा हो चुका था जो औसतन ज्यादा था। लोग उसे लंबू जी अमिताभ – अमिताभ कहकर बुलाते थे। लंबी – लंबी टांगे और लंबी लंबी सी बाहें बिल्कुल हवा हवाई, दुबला – पतला शरीर सरजू भैया की तरह था। रंग गोरा मलाई चुरा कर खाने वाला उस्ताद ही समझिये। कहांँ तक इसकी तारीफ की जाए सब कम है। विक्की आखिर विक्की ही था। स्कूल के रास्ते यदि कुछ भेड़ – बकरियांँ मिल जाय तो वह घंटों उसके पीछे दीवाना बना रहता। उन बकरियों को देख – देखकर प्यार से अपनी आंखें सेकता रहता था। इसमें उसे बड़ा मजा आता था । बड़ी तसल्ली मिलती थी उसे। ना उसे घड़ी से मतलब थी और ना समय से। घर में तो कुछ कहना ही नहीं। मुर्गी, बत्तख, बटेर, कबूतर, बिल्ली, तीतर जैसे सब उसके जीवन साथी थे। कभी घर में बत्तख होता, तो कभी मुर्गियांँ, कभी कबूतर तो कभी तीतर। घर जैसे एक चिड़ियाखाना ही था । अपने पेट से उसे कोई मतलब नहीं , पर उन जानवरों को प्यार करना उसके खाने का ध्यान रखना उसके लिए सबसे बड़ी बात थी। उसे बिना खिलाए वह सांस भी नहीं लेता। मांँ कहते – कहते उस से उब चुकी थी कि बेटा कुछ करना है तो पढ़ो – लिखो, जिंदगी में अगर कुछ करना है तो पढ़ना भी जरूरी है। अगर तुम नहीं पढ़ोगे तो कुछ भी नहीं होगा। इस तरह विक्की का जवाब कुछ और ही होता। मैं भी उसकी बेवकूफी पन से खूब वाकिफ था। माता-पिता और कर भी क्या सकते थे ? मारने – पीटने से तो बच्चों की आदत और भी खराब होती। बच्चा आपे से भी बाहर भी हो जाता। ट्यूशन का एक से डेढ़ घंटे का समय वह मास्टर जी के साथ किस तरह बिताता वह मैं ही जानता था। इस तरह बाकी सब मिलाजुला कर ठीक ही चल रहा था। समय का कुछ कहना ही नहीं था। वह अपने हिसाब से चलता गया । एक दिन विक्की ने कमाल ही कर दिखाया उस समय जब वह अपने मामा के यहांँ टेल्को गया हुआ था। टाटा नगर में ही स्टील फैक्ट्री थी। जिसका नाम टेल्को था। उसके मामा उसी फैक्ट्री में एक छोटा सा क्लर्क के पोस्ट पर तैनात थे। टेल्को व्यवसायिक दृष्टिकोण से बहुत ही सुंदर स्थान है। आज भारत के बड़े-बड़े शहरों में इसकी गिनती की जाने लगी है जो झारखंड राज्य के अंतर्गत आता है। दोपहर का समय था। विक्की दरवाजे के पास एक स्टूल पर बैठा था। वह बैठे – बैठे बाहर की ओर ताक-झांक कर रहा था। मोहल्ले का एक खतरनाक कुत्ता जंजीर तोड़ कर बाहर निकल चुका था। वह खतरनाक विलायती कुत्ता आधे जंजीर को घसीटता हुआ पागलों की भाँति दौड़ लगा रहा था। कुत्ता अपने मुंँह बाए लोगों पर टूट रहा था। जिधर लोग दिखाई देते कुत्ता उसी तरफ भौंकते हुए उसके पीछे पड़ जाता।इस तरह दो चार लोग बुरी तरह से जख्मी भी हो गए थे। विक्की उस कुत्ते को देखकर कुछ घबराया और फिर स्टूल से उठकर सीधे उधर ही दौड़ गया जिधर वह कुत्ता था। पीछे – पीछे वह और कुत्ता उसके आगे – आगे दौड़ा भागा जा रहा था। उस कुत्ते का नाम शेरू था। शेरू का शरीर भी कोई शेर से कम न था। झबरैला बाल उसके कंधे और शरीर को सुशोभित कर रहा था। लेकिन अभी वह कोई भूखे भेड़िये से कम नहीं लग रहा था। वह जिस पर टूटता उसे बुरी तरह धायल करके ही दम लेता। जोर – जोर से भौंकने की आवाज सुनकर मोहल्ले के लोग घर से निकलकर बाहर अपने दरवाजे तक आ गये । विक्की के मामा यह सब देखकर हैरान थे। उन्हें डर था कि कहीं विक्की को कुछ हो गया तो अपनी बहन को वह क्या जवाब देगा। इस उधेड़ बुन में वे परेशान थे। ऐसा न जाने उन्हें क्यों लग रहा था कि विकी आज बचकर जिंदा वापस आयेगा या नहीं। उस कुत्ते की तरफ बिक्की को जाना उन्हें नागवार गुजरा था। यह उसकी बेवकूफी ही थी कि वह उस कुत्ते के पीछे बेखौफ दौड़ गया था। वह कुत्ता बहुत खतरनाक था जब मालिक ही डर से कांप रहा था तो भला दूसरा अपनी जान हथेली पर क्यों लाता। कायापलट सी हो गई सभी के छाती जैसे उलट पलट कर रह गये। आश्चर्य हो गया। लोग देखते रह गये। विक्की कुछ करता तब तक वह कुत्ता एक बुढ़िया को धर दबोचा था, लेकिन विक्की की बहादुरी से लोग मात खा गए। बुढ़िया बाल – बाल बची। अभी शेरू कितने लोगों को अपनी चपेट में ले लेता कह पाना मुश्किल था। कुत्ते के गले में बंधे मजबूत चमड़े की चौड़ी चमोटी विक्की को पकड़ने में देर न लगी । शेरू शांत हो चला था। वह अपना दुम हिलाता हुआ जैसे उससे प्यार मांग रहा था। लोग आश्चर्य मुद्रा में खड़े इस तरह तमाशा देख रहे थे, मानो कोई तमाशा वाला भालू का नाच दिखा रहा हो। सब लोग बोल रहे थे भला इतना छोटा सा लड़का, कलेजा का कितना पक्का है। इसका कलेजा भगवान ने कितना बड़ा बनाया है। यह तो लोहा है लोहा। विक्की कुत्ता से खेलता – खेलता अपने मामा के घर आया। अब शेरू बिल्कुल ही शांत था। वह किसी पर झपट्टा नहीं मार रहा था। विक्की ने शेरू को देखा और उससे प्यार हो गया। ऐसा उसने कई बार पहले भी कर चुका था। बेधड़क जानवरों को पकड़ लेना उसकी आदत सी बन गई थी। विक्की ने शेरू को ऐसा प्यार सिखलाया कि शेरू सब लोगों से प्यार करना ही सीख लिया। अपनी पूंछ हिलाता वह सब के लिए आज्ञाकारी बन गया। काफी लोग विक्की की तारीफ कर रहे थे। मामा जी के दरवाजे पर काफी भीड़ लग गयी थी।विक्की सबके लिए बधाई का पात्र बन गया था। इस करिश्मा से सभी लोग हैरत में डूबे थे। मामा के दिल दुगने और सीने चौगुने हो गए थे । वो खुशी से गदगद हो चुके थे। कुत्ते वाले साहब भी आए। इनके द्वारा दिए गए इनाम को विक्की ने ठुकरा दिया….. मुझे पैसे नहीं चाहिए…….. मैं पैसा क्या करूंगा…. साहब के सिर पर जैसे घड़ों पानी बरस कर रह गया था । वह शर्मिंदा होकर बिना कहे सुने उल्टे पांव वापस चला गया । सभी लोग विक्की की तारीफ में खातिरदारी कर रहे थे। बाद में यह पता चला कि विक्की जानवर, जीव-जंतु, और पक्षियों से बड़ा प्यार करता है। मांँ, पिताजी ऐसी बातें सुनकर बासों उछल गए। इस तरह वे सपनों में भी नहीं सोच सके थे कि विकी खतरे से खेलकर खतरे से बच निकलेगा । वाकई में विक्की को जानवरों से बड़ा प्यार था। बाद में विक्की की बहादुरी पर उसे पारितोषिक दिया गया। वह बहुत खुश था।[2/18, 20:02] Bindeshwar Prasad Sharma: कागज के टुकड़ेअचानक एक कबूतर आँगन में उतर आया। मैं उसे देखकर दंग रह गई। उसके गले में एक खूबसूरत सा, मूंगे – मोतियों के जैसा बेसकीमती हीरों का हार था। उस सुन्दर से हार को देखकर किसी की भी नीयत खराब हो सकती थी। ललिता को भी एक क्षण के लिए ऐसा ही महसूस हुआ था। इस तरह के दृश्य से वह जितना घबरा रही थी उससे कहीं ज्यादा वह खुश भी हो रही थी। उसके अंतस मन में बिरवल के खिचड़ी पकने जैसे शुरू हो गये थे। कबूतर देखने में बड़ा प्यारा लग रहा था। वह बेहिचक आंगन से होता हुआ बरामदे तक पहुंच आया। ललिता को इस तरह उफनाए से देखकर वह और आगे नहीं बढ़ सका। उसके छोटे से चोंच में एक कागज का मुड़ा हुआ कोई रंगीन सा टुकड़ा था। यह सब देख कर ललिता की आँखें आश्चर्य से फैलती चली गई। ललिता उठ कर खड़ी होती कि वह कबूतर उड़ कर सामने वाला पेड़ पर जा बैठा। ललिता कुछ क्षण के लिए उसे एक टक देखती रही। कागज का वह मुड़ा हुआ टुकड़ा, कबूतर वहीं छोड़कर उड़ गया था। ललिता उस कागज के टुकड़े को हाथ में लेकर बासों उछल गयी। मानो जैसे उसे कोई बड़ी सी चीज या कोई अच्छा सा माल हाथ लग गया हो। कागज को खोलने पर उसे खुशी का ठिकाना ना रहा। उसे लगा कि उसके हाथ में कोई अद्भूत सी चीज या कोई अच्छा सा संदेशा मिल गया है। लेकिन ललिता के लिए काला अक्षर भैंस बराबर ही था। वह जल्दी ही भागी – भागी अपनी प्यारी सी बेटी आभा के पास आई थी। आभा नींद में खर्राटें ले रही थी। ललिता बौखलाई से पन्ने को उलट – पलट कर देखने में मस्त थी। नींद में मस्त आभा की आंखें कुछ रंगीन से सपने देखने में मस्त थे। ललिता को इस तरह बार-बार झकझोरने से उसकी नींद उचट गई। अरे देखो तो क्या लाई हूंँ। क्या है ? मम्मी……. अरे पहले देखो तो…. फिर बताना…… मम्मी क्या है….. मुझे नींद आ रही है…छोड़ो ना… .. कल रात देर तक जागी थी….. थोड़ी देर और सोने दो। अरी सूनो तो सही। देखो ना आभा…… एक पत्र आया है……. पत्र…. हां आभा….. मामा जी का है क्या….. अरे नहीं रे….. तो बड़े भैया का होगा….. । पढ़ देती हूं न….. पढ़ती हूं…… आभा उठ कर बैठी। उसकी मम्मी बड़ी उत्सुकता से कागज का वह टुकड़ा आभा को देकर वहीं पास में बैठ गयी। आभा अपनी मां को परेशान देखकर कुछ घबराई, फिर वह पुर्जे को लेकर बाथरूम में चली गई। इस तरह से मम्मी को उसके पीछे पड़ना पड़ा। आभा बाथरूम से आने के बाद मन ही मन पढ़कर मुस्करा रही थी। अरे मम्मी… अब तो हम लोग राजा ही बन जाएंगे। राजा….. कैसी बातें करती हो आभा….. सच मम्मी….. देखो न। ललिता उस कबूतर के बारे में सारी बातें बताने लगी। आभा भी ये सब सूनकर हैरत अंगेज हो गयी। ललिता की जिज्ञासा और बढ़ गई। क्या लिखा है आभा… पढ़ो न। वही तो सुनाने जा रही हूं… देखो मम्मी…… सुनो….मेरे प्राण रक्षक ललन जीचरण कमलों में सादर प्रणाम।जब मैं छोटा सा था तो एक व्याधा (बहेलिया) हमें जाल में फंसाकर अपने घर ले आया था । वह मुझे काट कर खाने ही वाला था कि आपने हमें बाल बाल बचा लिया था। अगर आप हमें उस वक्त नहीं खरीदे होते तो मेरी जान अबतक न बची होती। बहेलिये को भी उस वक्त पैसे की जरूरत थी सो उसने मुझे आपको बेच दिया। मुझे भी आपके हाथ बचना था सो बच गया। यह उपकार मैं अभी भी नहीं भूला हूं। अब मैं कबूतरों का राजा हूं और मेरे पास धन – दौलत की कोई कमी नहीं। विशेष अगले पत्र में।कबूतरों का राजाकपोतराज।ललिता को लगा कि अब उसकी जिंदगी बन जायेगी। साथ – साथ किस्मत भी चमक उठेगी। एक नया रंग एक नयी सी उमंग जागृत होकर रह गयी उसके मन में। अब हमारी गरीबी हम से कोसों दूर भाग जायेगी। माथे का सारा बोझ हल्का हो जायेगा। सांझ होने को थी। सूर्य देव अपने गंतव्य स्थान की ओर प्रस्थान कर रहे थे। घर – आँगन में दीये – बाती जलाने का भी समय हो चला था। आभा इसकी तैयारी में जुट गई थी। पूजा की थाली, दो – चार फूल, अक्षत – चंदन – रोली और सुगंधित धूप लेकर आँगन में तुलसी जी के पास आयी। ललिता भी माथे पर पल्लू डालकर घी का दीया जलायी। पूजा के बाद आरती और फिर वे अपने कामों में लग गयी। आभा के पिता जी दफ्तर से आ चुके थे, फिर क्या था हाथ – पाँव धोकर रोज की तरह बरामदे में रखी कुर्सी पर बैठ गये। आभा अपने पिता जी के लिए चाय बनाकर लाई। इधर – उधर की कुछ बातें की। इस तरह बातें करते – करते भोजन का भी वक्त हो चला था। ललन जी खाने को तैयार गए। आभा भोजन परोस कर पिता जी के लिए ले आई। पिता जी जमीन पर बिछे आसन पर विराजमान थे । ललिता लोटे और गिलास में पानी लाकर रखी, फिर वह वहीं पास ही बैठ गयी। पास बैठे ललिता को खुश देखकर ललन जी यूं ही बोले….. आज मांँ – बेटी बहुत खुश नजर आ रही हो…. क्या बात है……? तभी आभा दाल की परसन लगाती बोल पड़ी। पिता जी गजब हो गया। आज हमलोग बहुत खुश हैं। हंँसते हुए आभा बोलकर चुप रही। गजब….. क्या गजब……. आश्चर्य मुद्रा में उसके पिता कुछ सोच में डूब गये। पिता जी…. आपने.. कभी किसी की जान बचाई थी….. जान….. ललन चंद क्षणों के लिए चिंता में डूब गये , फिर…. नहीं तो…… ख्याल कीजिए पिताजी… पिता जी और अधिक घबरा के रह गए। पास में बैठी ललिता अभी भी मुस्कुरा रही थी। ललन बौखलाए से इधर-उधर ऊपर – नीचे – देख रहे थे। उन्हें कुछ समझ में नहीं आया और न कुछ ख्याल ही कर पाये। फिर क्या, ललिता को सारी बातें बतानी पड़ी। आपने कभी किसी कबूतर की जान बचाई थी …. बचाया होगा…. क्या बात है। ललन की जिज्ञासा और बढ़ती चली गयी। कुछ याद आया और हाँ- हाँ में ललिता को उत्तर मिल गया। फिर तो ललिता वह पत्र उन्हें दिखा ही दी। ललन जी पत्र को पढ़कर आश्चर्य में आ गए। उनके तन – मन में खुशियों की लड़ियांँ सी टंग गई। लगता था अब उनके बुझे – बुझाये से जिंदगी में फिर से कोई चराग जल गया। दुसरे दिन पौ फटते वह अनूठा कबूतर फिर से आंँगन में आ गया। वह कोई साधारण कबूतर नहीं था। उसके गले में वही हार अब भी चमचमा रहा था। वह तो कबूतरों का राजा…. कपोत राज था। अब भी कबूतर के गले में अनमोल मनमोहक हार देखकर ललिता कुछ यूं सोचने लगी थी। अगर यह हार मुझे मिल जाती तो मजा आ जाता। हार में लगे लाकेट उसके मन को और अधिक मोह रहा था। उधर ललन जी यह देख कर दंग थे कि उसने आज तक ऐसी हार अपने जिंदगी में कभी नहीं देखी । ऐसा हार वाला कबूतर आश्चर्य में कोई कमी न थी। उसके छोटे से चोच में वैसा ही कागज का टुकड़ा मौजूद था। कबूतरों का राजा कपोत राज उस कागज के टुकड़े को पहले की तरह यूँ ही छोड़ कर उड़ चला था। सभी उसे दूर – दूर तक निहारते रहे थे । वह आँखों से ओझल होता चला गया। फिर क्या था उस कागज के टुकड़े पर आभा उसकी मां ललिता और उसके पिता, ललन भी दौड़ पड़े। ऐसा लगता था कि वे सब एक ही नजर में सब कुछ पढ़ कर समझ लेंगे। उसके परिवार को यह एहसास हो गया था कि वह कबूतर हम सब का कुछ उपकार ही करने वाला है। कागज के उस टुकड़े में भी एक नया संदेशा था। पत्र में लिखा था…. घर में लगे पुराने दरवाजे के ठीक चार कदम आगे दो हाथ का एक गड्ढा खोदो। गड्ढे में एक कलश मिलेगी। वह कलश सोने के जैसा चमकता दिखेगा। उसमें ढ़ेर सारी मुहरें, छोटी-बड़ी अशर्फियाँ भरी पड़ी होंगी। जब जरूरत पड़े, गड्ढा खोदकर काम भर मोहरों की गोली निकाल कर जस का तस भर देना। पत्र में एक निर्देश था, कलश को बाहर निकालने से संकट। ध्यान रहे यह बात कोई और चौथा ना जानें, नहीं तो धोर संकट का सामना करना पड़ेगा। सभी के सभी यह पढ़कर खुशी से पागल हो गए। ललन को लगा कि अब उसकी सयानी बेटी आभा घर में कुंवारी बैठी नहीं रहेगी। इसी साल धूम – धाम से बाजा बजेगा। डोली में बैठकर मेरी बेटी ससुराल जाएगी। अच्छा घर – वर मिलेगा। ललिता तो और खुश थी कि अब मेरी बेटी आभा आबाद हो जाएगी। कोई अच्छा सा घर खोजा जायेगा। धूमधाम से आभा की मुहूर्त निकाली जायेगी। सारा कुछ ऐसा ही हुआ। सभी आश्चर्य में थे। इतना गरीब आदमी इतने अच्छे खानदान में बड़े लोगों से…. यह कैसा करिश्मा है। लोग हैरत में थे कि लाखों रुपए के संपत्ति इनके पास कहां से आ गये। शादी में गांँव के हजारों लोग खाए – पीए। जमकर नाच गाने हुए। यहां तक कि शहर में पढ़ने वाले शहरी भैया किशन को भी कुछ पता न चला । इतना सारा प्रोग्राम कैसे हुआ किशन भी न जान सका। ललिता और ललन कबूतर के लिए बधाई पात्र थे। उसने काफी बुद्धिमानी से काम चलाई। उन सब के जिंदगी बदल बदल गये। उसके घर में जैसे खुशियों का दीप ही जल गया। ये सब कपोत राज के ही कमाल थे। जान के बदले उसने उन सबों को एक सुहानी जिन्दगी दे दी थी।[2/19, 15:42] Bindeshwar Prasad Sharma: बहु रानीचाहे मनोहर जितना भी शैतान रहा होगा । दीपिका के लिए उसका अपना पति देवता के समान ही था। शादी हुए दो साल भी ठीक से न बीत पाये था कि वह विधवा हो गई। सुख नाम का ठीक से दर्शन भी ना हो पाया बेचारी को । जब से ससुराल आई तब से एक बार भी मायके नहीं गई ।इने – गिने से दिनों में जैसे वह तीस – चालिस बरस की अधेड़ औरत सी बन गई। जब से उसके पतिदेव गंगा लाभ हुए, वह पागल सी हो गई। दीपिका माँ बनने वाली थी। उसके पेट में बच्चा पल रहा था। सास को उससे उम्मीद ना थी कि वह भली – भांति अपने बच्चे को जन्म भी दे पाएगी। पति की याद और ख्याल उसके शरीर को आधा सा कर गया था। खाना भी वह ठीक ढंग से नहीं खा पी रही थी।सास को अलग और भी दूसरी चिंता सताये जा रही थी कि अगर कहीं बहू मर गयी तो वह किसी को जिंदा अपना मुंह भी देखाने लायक नहीं रहेगी। बरसात के दिन थे। काली अंधियारी स्याही रजनी रात। छिटपुट आकाश में झिलमिलाते तारे और कहीं – कहीं रुई की ढेर सा मटमैला फटा – कटा सा बादल। लग रहा था अभी – अभी तुरंत बिजली चमकेगी और बादल गरज उठेगा। सनन – सनन सी पुरवाई, लगता था अब बरसात लाकर ही दम लेगा। ठीक उसी समय दीपिका अपने प्रसव वेदना से कराहने लगी। दूसरी तरफ उसके ससुर नशे में धुत्त डकार मारते हुए गुहार करते नजर आए । दीपिका की सास उसे बार-बार संभाले जा रही थी और वह चारपाई पर इधर से उधर उलट-पलट करती कुछ हल्की सी करवटे बदलने में परेशान थी। दीपिका जोर – जोर से चीखें लगाती और मन ही मन राम की याद करती। बहू को इस हालात में देख उसकी सास अब तब में हो गई। दुबली पतली सी दीपिका बिल्कुल कमजोर थी, लेकिन भगवान ने दीपिका की पूजा-पाठ स्वीकार कर ली थी जो उसने सुंदर सा पुत्र को जन्म दिया। घर में आए नये मेहमान (पोते) का नाम सुनते ही ससुर जी नशे में नाच उठे। टीना ठोक – ठोक कर बजाया – खूब झूमर गाये और ताल में ताल मिलाए। यह सब देख सुनकर आस पास के पड़ोस वाले भी आकर अपनी खुशियाँ जाहिर की । पीने में नंबर वन, फ्री की मिली तो ढक्कन बंद और माल गायब। जमातों के साथ बैठकी चली तो दिन भर का गप्पा। कब शाम हुई और कब सुबह कुछ पता ही नहीं। ऐसी ही हालत थी बाबू सुखदेव लाल अटल बिहारी की। बोतल आई कि पलक झपकते खाली और जब पैसे की बारी आई तो सारा बोझ बाबू रतन बिहारी सिंह पर। वाह रे पीने वाला बाबू सुखदेव लाल अटल बिहारी । चालाकी की तो इसने हजामत ही काट डाली थी । एक से दो हुए कि बोतल की बात शुरू। चिखना मंगवाकर तैयार। बस देर क्या अटा पटाकर बोतल भी हाजिर। उस समय जवान बेटे का मरा कोई दो सप्ताह भी ना हुआ होगा कि नशेबाजी फिर से चालू । घर में सास बहू की हालत तो देखती ही नहीं बनती। सुबह का चूल्हा जलाया जाता तो शाम का नहीं। घर में जैसे दो सेर अनाज के लिए मोहताज और सुख देवा के लिए चाहिए भाजी और घी लगे पराठे के साथ मसालेदार मुर्गे की टांग। ना घर का ना घाट का दुश्मन अनाज का। शैतानगी में तनिक कमी नहीं। घर आता तो गला फाड़-फाड़कर चिल्लाता। खाने को मांगता और देर हुई तो थालियाँ पटक कर गालियांँ देता। महीने में दो – चार दिन ही शहर से वह गाँव आता, पर इन्हीं चार दिनों में सबकी हालत खराब कर जाता ।एक पैसे की मदद भी न करता। उल्टे चोर कोतवाल को डाटे वाली कहावत चरितार्थ कर जाता। बुढ़िया कुछ बोलती कि सुखदेवा डंडे लेकर तैयार हो जाता। सुखदेवा बुढ़िया का दूसरा बेटा था, जिसकी शादी अभी तक नहीं हुई थी। बेचारी बुढ़िया अपने छोटे बेटे के आगे भीगी बिल्ली बनी रहती। वैसे उसके बेटे का घर से कोई मतलब भी नहीं था। घर में जो कुछ भी बनता वह आकर हजम कर जाता। कोई खाया या नहीं, उसे कुछ परवाह नहीं रहती। बहू की हालत अब भी खराब थी कभी बुखार होता तो कभी पेट में दर्द। दीपिका इतनी अभागी थी जो अपने बच्चे का ठीक ढंग से पेट भी नहीं भर पा रही थी। उसे कोई पौष्टिक आहार भी तो नहीं मिल रहा था। छाती में ठीक से दूध भी समय पर नहीं उतर रहा था। पड़ोसन की मदद से उसे कुछ दूध मिल जाया करती जो मुन्ना के लिए काफी होता, बहू को ठीक से चलने तक की ताकत नहीं थी। बेचारी बुढ़िया सास गाय की गोबर से बनी गोयठे (उपला) बेच – बेच कर दो – चार रुपये करती और चुपके से बहू के लिए शहर से कुछ ले आती।कभी वह शहर जाकर फल दवाइयां लाती तो कभी देवी जी की मंदिर जाकर माथा टेक कर आती और अपनी बहु की सलामती के लिए दुआएं लेकर आती। वाह रे सासू माँ। भगवान करे हर एक बहू को ऐसी सास मिले। भगवान की दया ही थी कि दीपिका अब स्वास्थ हो गयी थी । सासू माँ का ख्याल दीपिका पर कम न था । पहले से वह बहुत ठीक हो गयी थी । फिर से सिलाई मशीन चलाने लगी। दो – चार ब्लाउज, चोलियाँ और कुछ साये फिर से सिलने को आने लगे। दिन फिरने लगे । अब वह पहले से ज्यादा खुश थी। शांति और अमन से मेहनत के दो – चार रूपये आने लगे। इन पैसों में कुछ ससुर को भी हाथ लग जाया करती। सास जितने भी समझाती… बहू….. बाबू को पैसे मत दिया करो, पर वह क्या करती। बाबू जी की बातों पर वह मोहित हो जाती। दीपिका के लिए तो सब कुछ वही थे। ना मन में खोट था ना बदन में तड़क-झड़क और ना ही तामझाम एकदम सीधी सादी बिल्कुल भोली – भाली गाय थी बेचारी। बुढ़िया बहू की मदद और बच्चे की देखभाल में अपना सारा समय गुजार देती । सुबह से शाम साथ में हंसकर बिताती। सास, बहू जितनी भोली थी, बाप-बेटा बैल का बैल ही था। जब भी बुढ़िया राम मनोहर के पिता को खेत जाने या कोई काम करने को कहती तो उसके उपर घड़ों पानी पड़ जाता। उल्टे बड़ी-बड़ी सी आंखें निकाल कर डराता धमकाता । थोड़ी भी चिलम भरने में देर हुई तो बरस पड़ते बाबू सुखदेव लाल अटल बिहारी। घर बैठे कि तंबाकू ही तंबाकू धुआं ही धुआं। एक तरफ अटल बिहारी जी खासते तो दूसरी तरफ खूब जोर की कसें भी लगाते। शाम को मुखिया जी के चबूतरे से गांजे के दम लिए बिना राम कसम वापस नहीं आते। ढोंग बनाने में इतना साफ नकल कि झूठ का बाप बनकर सच का हजामत कर डाले। वाह रे सुखदेव लाल अटल बिहारी गजब की बहादुरी है। एक नंबर का ढोंगी। मदन बाबू….. मदन बाबू…… वो मदन बाबू……। मदन बाबू सुनते ही घर से बाहर निकले। क्या बात है रे……? इतनी तेज धूप दोपहरी में……. काहे गला फाड़ – फाड़ कर चीख रहा है ? बहुत…. खूब जोर की…… बीमार है मालिक….. डॉक्टर को ना दिखाया… तो बचने की कोई उम्मीद नहीं। मालिक…. गजब हो जायेगा। मालिक…. मालिक… कुछ मदद कीजिए… ।मदन बाबू बोले – मदद…… पीने के लिए और दारू के लिए मदद….. नहीं, मालिक मैं ईमान धर्म से कहता हूं। सच कह रहा हूं मालिक। यकीन तो कीजिए मालिक…। मैं बहू के लिए झूठ नहीं बोलता। आज उसकी जिंदगी आपके हाथ में है, ऐसा ना कहिए मालिक…. । मदन बाबू ने कहा मैं जानता हूं कि तुम क्या कह रहे हो और मेरे पास क्यों आए हो…? ।नहीं मालिक आप हमें गलत समझ रहे हैं, कसम से जो दारू हाथ लगाया। मैं कहीं नहीं जाऊंगा मालिक…. म.. म… मैं तो डॉक्टर के पास बहू को ले जाने के लिए मदद मांगने आया हूंँ। मालिक वह रह रह कर कराह रही है। मेरी बहू रो-रो कर चिल्ला रही है। अस- बस में उसकी जान पड़ी है। पता नहीं क्या होगा। मालिक आपसे क्या बताऊं…. मालिक आप मदद करते आए हैं… थोड़ी मदद और कीजिए। इस बार विश्वास तो कीजिए मैं आपका पैर छूता हूं मालिक। कम से कम दस रूपये… ह… हाँ दस रूपये दे दीजिए। बस दस रूपये। मदन बाबू सुनते-सुनते पिघल गए और सुखदेव को गरमा गरम दस रूपये बन गये। सुखदेव चलता – फिरता और घूमता अपने अड्डे पर पहुँचा । चटाई पर दो बोतल महुआ। वाह रे महुआ। गर्म – गर्म आलू की टिक्की (चप) और साथ में चने की घुघनी। मजा आ गया…. ।अरे किशोरिया कहां जाता है बे….. इधर तो आ….. देख तेरे लिए….. हां मालिक….. वह बोलता हुआ जीभ छटपटाता पहुँच आया। आ… बैठ…. कल तूने… पार्टी चलाया था…न.. . आज मेरी ओर से है…. ले खूब जी भर के पी ले। देख तो ससुरा कैसा माल दिया है। हाँ मालिक…. माल तो खूब तगड़ा है… खेदनवां दिया है का । बड़ा तगड़ा है कल के जैसा लग रहा है। आज खूब मजा आएगा। पार्टी जमी, खूब खाए पीए, दस रूपया गोल। घर आए फिर गाली गलौज शुरू। वाह रे बाबू सुखदेव लाल अटल बिहारी की चापलूसी। वाह रे मंतर… गजब की टैक्टिस झूठ बोलकर पैसे एठने की। झूठ बोलकर पैतरे मारना कोई इन से सीखे। गजब का जाल बिछाता है। पैसे नहीं मिले तो तू – तू, मैं – मैं गीन कर एक हजार गालियाँ। गजब धंधा वाला आदमी है। कभी मालिक को फांसता तो कभी मालकिन को। मालगुजारी पर खेत दिया तो एक भी अनाज घर नहीं। अपने से मेहनत करने वाला राम कसम इस घर में भगवान ने किसी को भेजा ही नहीं। बेटा था मूर्ख बाप महामुर्ख। ना पढ़ाई किया मनोहर ना ठीक से खेती। दारू की खाली बोतल भी दिख गई तो आधा नशा। न जाने बहू किस चिराग तले से ढूंढ कर ले आया था। जब तक वो ठीक थी तब घर में सुख चैन था। अनाज आता कोठियां भरी रहती है और अब वह असहाय सी हो गई तो दर्शन दुर्लभ हो गये। अपनी किस्मत से ऊब कर बुढ़िया सारा घर, द्वार, खेत बहू के नाम ही करवा दी थी। मुन्ना चार – पांच बरस का हो गया था। बेचारी बहू घर पर कपड़े सिलाई करती और वह बाहर खेत संभालती। इस बार राम की कृपा से खूब फसल आई। खेत में से खाने भर खूब अनाज मिल गया । बुढ़िया यह देखकर बहुत खुश थी। जितना बनता बुढ़िया भी बहू के साथ काम संभालती रही, लेकिन एक सुखदेव वाह रे बाबू सुखदेव लाल अटल बिहारी।अपनी आदत नहीं छोड़ते। नाक में दम कर रखा था। जब खेत में से कुछ अनाज आने लगा तो बूढ़ा खेत में ही अपना अड्डा जमाना शुरू किया। अब वह वहीं दम चढ़ाता। बूढ़ा हो गया पर स्वभाव में तनिक फर्क नहीं आया। हल्की सी पैनी छड़ी हाथ में हिलाता अपने खेत की रखवाली करता। एक बार सुखदेव ऐसा बीमार गिरा कि उसे सबक ही मिल गयी। चलने की शक्ति भी क्षीण पड़ गई। बहू की कृपा और तन मन की सेवा से वह फिर टना – टन हो गया। मुन्ना दिनभर तोते की तरह बाबा – बाबा की रट लगाए रहता। वह बाबा के साथ में रहता और साथ ही खेलता, पर बुढ़िया ऐसी संगति से उसे दूर ही उसे रखती। बहू से कहती मुन्ना को बाबा के साथ ना छोड़ना, नहीं तो उसका छाप उस पर आ जाएगा। बहू हंस कर उस बात को टाल जाती। इस तरह बहू ने तो सारा घर ही संभाल लिया था । कमाल ही कर दिखायी दीपिका ने। बूढ़े ससुर को भी समझ आ गया। मगर दो एक महीने में रुकते रुकाते ऐसी – वैसी हरकतें हो ही जाती। खैर बूढ़ा संभाल में आ गया। मुन्ना अपने दादी – दादा जी के साथ दिनभर मचान पर बैठकर पढ़ता। बूढ़े को अब मिट्टी की सेवा करने की ताकत तो थी नहीं, पर खेत की रखवाली खूब मजे से करता। पढ़ने में मुन्ना भी खूब तेज निकला। सारे गांव में अब्बल। बहू के कारण मुन्ना का भी नाम रोशन होने लगा। लगन और मेहनत के बल वह काफी आगे निकला । सभी तरफ उनके बुद्धिमता की चर्चा होने लगी । सभी इसके सामने मात खा गए। बिगड़ता हुआ संसार बहू ने कैसे संभाल लिया लोग आश्चर्य में थे। सबके जुवान में शाबाशी सबके जुबान से रानी…. बहु रानी…….. बहु रानी की आवाजें। यह सुन, दीपिका चैन की सांसे ले, मुस्कुराती अपने घर, परिवार के कामों में मग्न हो जाती।[2/20, 19:58] Bindeshwar Prasad Sharma: गली का रहस्यगली से होकर जब कोई भी अंजान मुसाफिर उस जगह पहुंँचता था तो वह वहीं लड़खड़ा कर रह जाता। न जाने वह कौन सी जगह थी, कैसा रहस्य था, जिसका पता आज तक किसी ने नहीं लगाया। एक दिन मैंने भी उस गली के रहस्य को जानने की कोशिश की। जब मैंने उस गली में प्रवेश लिया तो मुझे भी कुछ समय के लिए आश्चर्यचकित होना पड़ा। इसके साथ हमारी भी वही स्थिति हुई जो लोगों के साथ हुए थे। मैं भी वहाँ लड़खड़ा कर रह गया । इस तरह लड़खड़ाते देख किसी ने हमें संभालने की भी कोशिश की थी। मुझे लगा मेरी सहायता के लिए कोई आया होगा। संभलने से पहले मेरी नन्ही नन्ही सी दो आंँखें मुझे कुछ अजीब सी हैरत में डाल दिया । देखते – देखते मेरा चेहरा भयानक सा होता चला गया। उस समय एक भारी भरकम सी आवाज के साथ मैं चीख भी पड़ा था । मेरे चीखने की आवाज के साथ कोई अनजान सी जवान लड़की अर्धनग्न अवस्था में मेरे सामने आकर खड़ी थी। डरावना सा चेहरा काल – विकराल भयानक सा रूप मेरे दिलो-दिमाग को एक ही झटके में हिला कर रख दिया था। वह इस तरह मुझे जख्मी बनाकर नोचने खरोंचने लगी जैसे कोई भूखा शेर अपने शिकार को पंजे में लेकर नोचता खरोचता हो। यह मेरे मन में उथल – पुथल करने वाले ज्वार भाठा जैसी एक झलक थी, या और कोई भ्रम।मैं नहीं जानता। मेरी एक झलक देखने के बाद ही वह लड़की मेरे नजदीक आ गई थी। काश मैं भागता इससे पहले ही वह हमें दबोचने की पूरी नाकामयाब कोशिश की। मैं एक छोटा सा तांत्रिक होने के नाते मन में यूं ही अपना एक मंत्र बुदबुदाया । वह अनजान सी डरावनी लड़की इस मंत्र के साथ जमीन पर गिरकर स्थिर हो गई । मेरे सामने जैसे पहाड़ सा टूट कर रह गया । मैं हवा – हवाई उसे ऐसे ही देखता रहा जैसे कोई गीद्ध मेरे सामने अभी – अभी आकर अपना प्राण त्याग दिया हो। एक ही क्षन के अंदर मेरा दिलो-दिमाग लट्टू की तरह नाच कर रह गया। मेरी काया पलट सी हो गई । अनायास एक और भयानक सी आवाज मेरे कानों में गूंँजा । अकस्मात मेरे सामने दो शैतान आकर खड़े हो गए , और तब मैं काफी घबरा सा गया। वह लड़की अभी भी अचेतावस्था में गिरी पड़ी थी। न जाने इस जगह के कौन से भेद थे जिससे मैं अभी तक अनभिज्ञ था। इस भेद और रहस्य को जानने के लिए मैं प्रयत्न ही कर रहा था कि वो शैतान मेरे काफी करीब आकर खड़ा हो गया। वह लड़की जो डरावनी सी आंँखों वाली अब भी औंधे मुँह जमीन सूंघ रही थी। मैं अपना मंत्र फिर यूं ही दुहराया। इस मंत्र के साथ दो बगुले गली के सामने वाली दीवार पर आकर बैठ गया। मैं उसे एक क्षण के लिए देखता भर रह गया था। शैतान के एक इशारे पर बगुले उसके पास आ गये। उनमें से एक ने मेरे दिमाग पर एक हल्की सी चोंच मारी। मेरा स्थिर सा बदन कुछ देर के लिए लड़खड़ाकर विचलित भी हो गया। तभी लड़की होश में आने लगी और फिर वह धीरे-धीरे संभल कर खड़ी भी हो गई। उस लड़की का चेहरा पहले जैसा भयानक नहीं था। मैंने उन शैतानों को वश में करने के लिए अपने दूसरे मंत्र को प्रयोग में लाया। दूसरा बगुला जैसे – जैसे ऊपर की ओर उड़ता, आग की एक लंबी सी लकीर बनता चला गया। मुझे लगा बिन बादल बिजली अभी – अभी अपने आप ही कौंध कर रह गयी है । इसी के साथ दोनों काल रूपी शैतान भी गुम हो गए । इतना सब होने के बाद भी मैं डटा रहा। अब वह लड़की पहले जैसी भयानक नहीं थी। वह मेरे ठीक सामने न जाने कैसे खड़ी थी। मैं उसे एक पलक देखता रहा। मासूम सा चेहरा चमकती सी प्यारी आँखें उन आँखों में प्यार की झलक मुझे भाता गया। वह लड़की भी अपनी सुरमई आँखों से कई तपीस लिए प्रोत्साहना से मुझे निहारती रही । वह मुझे बार-बार देख रही थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे हम एक – दूसरे को वर्षों से जानते हों। इस उधेड़बुन में मैं भी उसे अपलक निहारता ही चला गया। ऐसा लग रहा था, मानो वह मेरी अपनी निजी संबंधी या करीब का रिश्ता हो। हम दोनों के याद्दाश्त ताजा तरिण होने लगे।साथ के वो सारे बीते पल याद आने लगे। फिर तो वह शर्म से अपने आप में ही सिमट गई। तब मैं अपना गमछा गर्दन से उतार कर उसकी तरफ बढ़ा दिया। उस गमछे को लेकर वह अपने अधखुले से बदन को ढक लिया। जब उस गली का रहस्य हमें उससे मालूम हुआ तो मैं भी आवाक सा रह गया। मेरी आंखें खुली की खुली रह गई। मैं हक्का-बक्का सा हो गया। समझ नहीं आया कि यह सब कैसे हो गया। वह लड़की और कोई नहीं बल्कि मेरी अपनी धर्मपत्नी नीलिमा ही थी, जो बरसों पहले हमें छोड़ कर यूं ही उस शैतान के चंगुल में फंस गई थी। शादी के ठीक पंदरहवें दिन उसे बुखार आया था। फिर पचीसवें दिन बीमार से खुदा की प्यारी हो गई। मेरी अभिलाषा ज्यों कि त्यों हवा में आहे भरती रही। मैं हवा की भांति इधर – उधर भटकता फिरा, तरसता रहा अपना प्यार पाने को। बसंत आया पर कोयल न आई। बहारें बिना झूमे लौट कर वापस चली गई। मैं इन आँखो से सब कुछ देखता रहा। मैं उसे कई बार बैध हकीमों के पास भी ले गया था। सेहत के सुधार में कोई तब्दीली नहीं आई। यकीन भी किए पर किसी ने मेरी नीलमा को नहीं बचा पाया। मेरे सारे उम्मीदों पर पानी फिर गया था। वीरपुर वाले छोटे नवाब हमें ठीक ही बताए थे कि उसे कोई प्रेत आत्मा अपने साजिश में फंसा लिया है। मेरे बस की यह बात नहीं है। तुम इसे हकीमपुर ले जाओ वहाँ तुम्हें अब्दुल भाई मिलेंगे, सब ठीक हो जायेगा। पर मैं किस्मत का मारा वहाँ तक पहुँच भी नहीं पाया था कि रास्ते मे नीलिमा की मौत हो गयी। मैंने प्रण किये कि जब तक मैं नीलिमा को वापस नहीं लाऊँगा, चैन से नहीं बैठूगाँ। तब से मैं तंत्र मंत्र की विद्या सीखने लगा गया था। इस दौरान में कमरू – कामाख्या भी चला गया। लगातार इसके अध्ययन में खोए रहने से मैं इस विद्या में निपुण भी हो गया। गुरु जी से मुझे आशीर्वाद भी मिल गया । गुरूजी बोले, तुम अपने मंत्रों का सदुपयोग ठीक से करना तुम जरूर कामयाब होगे। मैं इस उत्साह से फूला न समाया और इसके साथ में अपने मंत्रों का उपयोग भी करना शुरू कर दिया। मैंने अपने मंत्रों का उपयोग उन सब जगहों पर जाकर किया जहाँ अपनी इस मेहनत से हमें विजय प्राप्त हुए थे। जब मैंने अपने गांव में कदम रखा था तो मुझे एक रोशनी सी दिखाई दी थी। एक आशा की किरणें मेरे कोमल से ह्दय में जागृत होकर रह गया थी। गांँव के लोग मुझे इस विद्या में लोहा मानने लगे । बरसों से परेशान लोग आज मुक्त हो गए। क्यों नहीं होते। अब कोई भी आदमी जब उस गली से होकर गुजरता तो वह अब नहीं लड़खड़ाता। न कोई डरता और ना ही कोई अपना होश खोता। अब सब लोग उस गली से बेहिचक गुजरने लगे। गतानुगतिक चल रही प्रथा मिट्टी की धूल बन कर तितली की तरह उड़ गई। गप्पड़चौथ से सब लोग बच गए। अब नीलिमा और मैं बड़ी मजे में चाव के साथ रहने लगे थे। मेरा उजड़ा हुआ संसार फिर से वापस आ गया था।

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