कहानियाँ – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

[2/16, 19:43] Bindeshwar Prasad Sharma: प्रेयसीसाधु बाबा ताजी हवा खाने कुटी से बाहर निकले थे। अनायास गंगा किनारे रेत पर उन्हें एक सांप दिखाई दिया। उसे देखते ही साधु बाबा को अपना पैर थाम लेना पड़ा। पहले तो बाबा समझे थे कि वह मेरी तरह शाम को शैर में ताजी हवा खाने को निकला है। पर उसे तरह शांत देखकर बाबा उसके नजदीक गये। देखने पर वह मरा हुआ सा मालूम हुआ। देखते ही बाबा को उसपर दया आ गयी। सोचने लगे… सर्पों का जीवन भी कितना कष्टकारी है। विधाता के खेल भी अजब – गजब है। भगवान ने भी इसकी जिंदगी क्या खूब बनायी है।साधु बाबा को वह सांप मन ही मन कुछ कह गया और उन्हें उसपर दया आ गयी। बाबा ने तत क्षण एक मंत्र का मन ही मन में प्रयोग कर दिया। मंत्र के साथ गंगा किनारे रेत पर कई दिनों का मरा गेहुअन… (नाग) साप अब धीरे – धीरे अपनी करवटें बदल रहा था। यह साधु बाबा की कृपा ही थी कि वह जिंदा होकर सकने लगा। साधु बाबा सांप को अपनी तरफ आते देख थोड़ा घबराये। वे मन ही मन फूले न समा रहे थे कि सांप अब पूरी तरह से होश में आ गया है और वह चलने भी लगा है।इस तरह सांप की गति कुछ तेज हुई तो साधु बाबा को अपना पैर पीछे करना पड़ा। वे घबरा से गये और थोड़ा पीछे हट कर जमीन से उखड़ गये। वे सोचने लगे… आज कल भलाई करना मुर्खता से कम नहीं… लगता है हमसे आज कोई पाप या कोई अनर्थ हो गया है। पर वे नहीं जानते कि सांप शरणागत के लिए उनकी ही तरफ दौड़ा चला आ रहा है।साधु बाबा को अपने मंत्र से जांच करने का मौका भी तो नहीं मिला था। वह तो सिर्फ और सिर्फ सामने की राह अमल करते डर से हवा हो रहे थे। एक तरफ सांप उनकी शरणागत के लिए परेशान था, तो दूसरी तरफ साधु बाबा को अपनी जान की लालें पड़ी थी। इस तरह उल्टी गंगा का बह जाना उनके लिए घातक सिद्ध हो रही थी।इस तरह से भागते – भागते साधु बाबा को कुछ ख्याल आया और फिर से एक मंत्र का प्रयोग कर डाले। इसके साथ ही अपनी झोली में से कुछ भभूत (राख) निकाल कर अपने चारो तरफ बिखेर लिए ।सुरक्षित घेरे में होकर साधु बाबा चैन की सांस ले रहे थे। उधर सांप खुशी से पागल हो रहा था कि वह अब अपने प्रेयसी को ढूंढ कर ही दम लेगा, पर इससे पहले कि वह साधु बाबा का एहसान पात्र बन जाय, बाबा उसके लिए साक्षात भगवान के ही रूप में थे। सांप उनके पैर छूने के लिए व्यग्र था। वह तेजी से दौड़ता हुआ चांँद – सूरज एक कर रहा था। वह जब भभूत के पास घेरे में सटा… फिर से अपना दम तोड़ दिया। तत्पश्चात वहाँ एक सजी – धजी युवती प्रकट हो गयी । साधु बाबा को देख यूं ही वह उनका पैर छुई। साधु बाबा ने उसे आशीर्वाद के साथ उठने को कहा। युवती उठकर सीधी अपनी आँखें झुकाइ खड़ी हो गई। तुम कौन हो देवी…. इस तरह सुनसान से जंगल में कहाँ से आई …? साधु बाबा घबराकर फिर से पूछे कि फिर एक और आश्चर्य देखकर उनके माथे पर चिंता की कुछ लकीरें खिंचती सी चली गईं ।वह युवती सीधी खड़ी स्तब्ध थी। जब उसकी नजर सांप पर गयी तो अपलक देखती की देखती रह गई।अब साधु बाबा सुरक्षा धेरे से बाहर थे। भभूत का असर समाप्त हो गया था। साधु बाबा प्रशन्न होकर फिर बोले… क्या बात है देवी…? पर वह उत्तर में कुछ न कह पायी। इस तरह देखते – देखते वह सांप के पास बैठ कर आठ – आठ आँसू रोने लगी। बाबा इस माहौल को देख और घबरा गये। उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। क्या करें न करें के उधेड़बुन में कुछ भी समझना मुश्किल हो रहा था। कुछ क्षण सोचने के बाद भी वे उसके अतीत को न जान पाये। उधर रोते – रोते युवती की आँखें लाल सी हो गयी। आँसुओं से भीजकर आँचल गीली सी हो गयी। उसके सिसकने की आवाज साधु बाबा को हैरत में डाल दिया।क्या बात है देवी… बताओ….. बताओ न….? साधु बाबा विवस होकर फिर पूछे थे। इस बार युवती को उत्तर देना ही पड़ा । क्या बताऊँ… बाबा…. हमारी तो अब किस्मत ही खोटी है। एक युग की यह कहानी है…. ।युवती यह बताकर अभी भी सिसक रही थी।युवती…. एक युग की कहानी है…. ।कौन सी कहानी है देवी……? बाबा ने फिर उस युवती से नम्र मुद्रा में अपनी बात रखी। इस बार युवती को अपनी सारी बातें बतानी पड़ी।मैं वीरपुर की रहने वाली एक ऋषि राज द्रिवेन्दु की कन्या थी। मेरा नाम प्रेयसी था। मेरे पिता जी मुझे बहुत प्यार करते थे। उन दिनों मैं बहुत भोली – भाली थी। देखते – देखते मैंनें नन्दन के पुत्र भद्र से आँखें चार कर ली। प्यार का सिलसिला बढ़ता चला गया और मैं उससे चोरी – चोरी रोज मिलने लगी। प्यार ने मुझे पागल कर दिया और मैं इस तरह आपे से बाहर हो गयी। मेरे पिता श्री इस बात को जान गये, लेकिन वे इससे क्रूर न थे।एक बार मैं छुपकर भद्र से मिलने चली गयी थी। उस समय मैं झूठ बोलकर पूजा के बहाने घर से निकली थी। पिता श्री के पूछने पर कि तुम कहाँ गयी थी, तो मैंने झूठ के बहाने बनाए थे। झूठ कह दिया था कि मैं मंदिर पूजा को गयी थी। पिता श्री यह सुनते आग बबूला हो गये थे। इस झूठ के लिए उनका दिल जल – भुनकर कर रह गया था। उनकी आँखें लाल सी हो गयी थी। पिता श्री न जाने हमें भद्र से मिलते कैसे देख लिए थे। उनसे रहा नहीं गया और वे बात – बात में हमें श्राप दे दिये। यह कि तुम धरती के नीचे उस समय तक रहेगी, जब तक कि तेरे पास कोई मरा हुआ साप नही आ जाए। तब से मै यहीं इसी धरती के नीचे उस समय से रह रही हूँ। विधाता ने भी क्या खेल रचा कि भद्र मेरे लिए जीवन भर कष्ट सहता रहा , कुंवारा रहा और वह भगवान का प्यारा भी हो गया। दूसरे जन्म में सांप का ही रूप पाया यह भी घटना आश्चर्यचकित कर देने वाली थी।भद्र जानता था कि मेरी प्रेयसी धरती के नीचे रहती है, इसलिए वह धरती के नीचे जगह – जगह सुराग बनाकर थक सा गया था। अब तक वह अपने प्रेयसी के खोज में असफल ही रहा था। सारी जिंदगी भूखे – प्यासे रहकर भी उसने पर्वत – पहाड़ एक कर दिये। ऐसी एक जगह बाकी रह गयी, जहाँ पर मैं रहती थी। मुझे ढूंढते – ढूंढते उनकी मौत गंगा तट पर हो गयी। फिर आपने उन्हें अपने मंत्रों से जिंदा किया। वह आपका बड़ा अभारी था। पर आपने अपनी जान की परवाह की और दूसरे मंत्र से उसे मृत्यु दंड भी दे दिया। यहाँ तक कि आपने अपनी बचाव में लक्ष्मण रेखा जैसी भभूत डालकर सुरक्षा गोल चक्र भी बना डाला। मैं धरती के नीचे से सब कुछ देख रही थी। पर एक जगह से दूसरी जगह जाना मेरे लिए नामुमकिन था। इतना कह कर वह सांप पर बड़ा प्यार से हाथ फेरती हुई विलख – विलख कर रोने लगी। साधु बाबा उसके विरह – वियोग देख द्रवित हो गये और तब वे पूरब की ओर अपना मुँह फेरकर वहीं आसन जमा लिए। थोड़ी ही देर में वह सांप एक सुंदर सा राजकुमार जैसा बन गया। वह और कोई नहीं भद्र ही था।साधु बाबा ध्यान से अलग हुए…. भद्र उनके चरणों में गिरकर लिपट सा गया। यह देखकर प्रेयसी की आँखें खुशी से भर आईं। आँखों के बीच एक साथ खुशी – गम के आँसू झिलमिला कर रह गये। इस बीच सधु बाबा अपनी शक्ति से न जाने कहाँ गायब हो गये। पहले तो दोनों ने इधर-उधर फिर दूर – दूर तक शून्य में बाबा को निहारते रहे,किन्तु कहीं कुछ दिखाई न दिया।सूर्य स्ताचल की ओर प्रस्थान कर चुका था। भद्र और प्रेयसी को अपने पूर्व जन्म की सारी बातें याद आ गयी । तत् पश्चात वह एक दूसरे से लिपट गये। वर्षों का बिछड़ाव आज साकार हो गया। मन मंदिर में चैन की वंशी बज गयी। वे साधु बाबा के सहानुभूति और कृपा के लिए जीवन भर के लिए ऋणी के पात्र बन गये। वे उन्हीं को देवता मानकर जीवन भर पूजा करते रहे।[2/16, 20:21] Bindeshwar Prasad Sharma: उपाधिदेखो शिष्यों, मैं तुम्हें अब धनुष विद्या में निपुण कर दिया हूँ ।आज का अंतिम भाग का अध्ययन यहीं पर समाप्त भी किया जाता है। कल इसी वक्त इस विद्या की परीक्षा ली जाएगी, जिसमें तुम सभी भाग लोगे। आश्रम के सभी शिष्य यह सुनकर हल्की चहल कदमी के साथ मुस्कराये । उनके बीच खुशियों की लहर सी दौड़ आई। वे एक दूसरे के साथ बुदबुदाने से लगे । कुछ पलों के लिए शिष्यों के बीच एक नई सी चेतना जागृत हो कर रह गई। वे अपने बुद्धि की मन ही मन परीक्षण करने में लग गये । तभी घंटी बज गयी और वे पंछियों के समान फर्र – फर्र करते बाहर आ गये । सभी एक दूसरे को निहार रहे थे। उन सबों के बीच खुशियों का ठिकाना न रहा ।हां शिष्यों, तो आज तुम लोगों की परीक्षा की घड़ी है। देखें तुम सबों की बुद्धि कितनी तीव्र है। तुम सबों में कौन सबसे अधिक बुद्धिमान है। सभी शिष्य अपने – अपने धनुष – बाण लेकर परीक्षा की घड़ी पर इंतजार की नजर ठहरा दिए । सभी यह सोच रहे थे कि कब गुरुजी मेरे बुद्धि की परीक्षण करेंगे । तभी गुरुजी ऊंगली से इशारा करते बोले …… मेरे पास एक लंबी कतार बनाओ………… मेरे कहने पर, तुम सब अपना – अपना धनुष-बाण लेकर तैयार हो जाना। तुम सब मेरे एक जैसे शिष्य हो। सुनो…… सब एक साथ तरकश से वाण निकालकर अपने – अपने प्रत्यंचा पर चढ़ाना, और मेरे 1 2 3 कहने पर सब अपने-अपने भरपूर ताकत से उस बाण को अपने धनुष से छोड़ देना। जिसका बाण सबसे अधिक दूर जाएगा, वह धनुष विद्या में सबसे अधिक निपुण होगा । गुरु जी के 123 कहने पर सभी शिष्य अपने भरपूर ताकत के साथ, अपने – अपने बाण धनुष से छोड़ दिए। शिष्यों, तुम लोगों ने तो अपना – अपना बाण भरपूर ताकत से चला दी। अब दूसरी बात यह है कि मेरे फिर 1 2 3 कहने पर तुम सभी अपने – अपने बाण खोजने जाओगे और जो शिष्य सबसे पहले उस बाण को मुझे लाकर देगा वही वीर घोषित किया जाएगा। तुम लोगों में से जो भी चुने जाओगे एक वीर और दूसरा परमवीर से पुरस्कृत किये जाओगे । सभी शिष्य फिर 123 कहने पर छूट पड़े। जयंत जंगलों के बीच पहुंचकर थक सा गया था, फिर उसे अपने धनुष से निकले बाण की काफी चिंता थी। भूख प्यास से उसके जान सूख रहे थे , तभी उसे एक साधु बाबा आते दिखाई दिए। साधु बाबा के दर्शन मात्र से ही उनके भूख-प्यास सारे छू मंतर की तरह गायब हो गये। अब साधु बाबा ठीक उसके करीब आ गये थे। बड़ी – बड़ी लटें, बिलकुल सफेद। लम्बी – लम्बी सी दाढ़ी, मूँछों के साथ चमकता हुआ खूबसूरत चेहरा जैसे कोई चमत्कारी बाबा भलाई के लिए उसके सामने आ गये । तभी बाबा बोल पड़े…. बच्चा इधर जंगल में….. अकेला कहां भटक रहे हो….. जंगल के बाघ सिंह तुम्हें खा जाएंगे….? वापस हो जाओ…… वरना….. इस भयंकर जंगल में तुम्हारी जान यूं ही चली जाएगी… । नहीं बाबा…. मैं वापस होने नहीं आया हूं। बड़ी नर्म भाव से जयंत ने अपनी बात कही थी ।मैं अपने धनुष से निकला हुआ बाण तलाश करने आया हूँ बाबा…. ¡तुम बाण चलाना जानते हो….? हांँ.. हांँ… देखिए न….. मेरे हाथ में जो धनुष है… बालक इसारे में धनुष को दिखाते हुए उन्हें बताया था । लेकिन तुम्हारा बाण तो यहां है ही नहीं। बालक घबराया था। आश्चर्य से उसकी आँखें फैल सी गयी। बाबा उसे इस तरह धबराये देख कर फिर बोल उठे। तुम्हारा बाण बहुत दूर चला गया है बच्चा…. तुम उसे नहीं ढूंढ सकते……. । ऐसा भी क्या बात है बाबा… जो मैं अपने बाण को नहीं ढूंढ सकता…. कहीं ना कहीं तो होगा ही…। नहीं बच्चा…. तुम उसे कभी नहीं ढूंढ सकते, इसलिए कि तुम्हारा धनुष से निकला हुआ वह बाण सात समंदर पार चला गया है। वहां असुरों का राज्य है वहीं फूलमती अनार के फल में रहती है, और वह बाण उसी के पास है। वह इतनी खतरनाक है कि कोई भी मानव वहाँ नहीं पहुँच सकता और अगर पहुँच भी गया तो फिर जिंदा……. तुम वहां जाओगे तो जिंदा लौटकर कभी वापस नहीं आओगे…..? नहीं बाबा…. ऐसा न कहिए…. ।तुम समझते क्यों नहीं….. बहुत समझाने पर भी जब वह नहीं समझा तो साधु बाबा ने उसे कोयल के रूप में परिवर्तित कर दिया। अब तुम…. वहांँ जा सकते हो…. पर याद रहे जाते समय रास्ते के बीच कोई बोले तो ना बोलना, वरना तुम वहीं जलकर भस्म हो जाओगे। चंद्र क्षणों के बाद वह हवा में उड़ाने भरने लगा । कूं – कूं करती कोयल हवा में विचरने लगी। अभी वह दो ही समंदर पार किया था कि किसी ने उसे आवाज दी। वह रुक कर अभी हां… जी… भरा ही था कि जलकर राख हो गया। साधु बाबा को इसकी प्रतीक्षा करते 18 दिन बीत गए। अंत में उन्हें अपने मंत्रों से पता लगाना ही पड़ा कि वह मूर्ख जलकर कहीं भस्म तो नहीं हो गया। हुआ वैसा ही था। तब बाबा को अपने मंत्रों से उसे अमृत भेजना पड़ा था। जयंत एक क्षण के लिए अपने आप को किसी सुनसान से टापू पर पाया था। फिर तुरंत वह अपने आप को मच्छरों के रूप में पाया था। यह सब उन बाबा की कृपा और करिश्मा का ही फल था। जयंत को महसूस हो रहा था कि अब वह अपने बाण को किसी तरह से ढूंढ लेगा। अब वह तेजी से उड़कर उन समंदरों को पार करने में लग लगा। ये समंदर उसके लिए अज्ञात ही थे। उसने इतना बड़ा – बड़ा समंदर कभी देखा ही नहीं था। इस तरह से वह अपने असली मुकाम पर पहुंँच गया। इधर असुरों को खुशी का ठिकाना ना रहा। उसका दिल बाग-बाग होता चला गया। बरसों बाद आज ऐसी महक उसे मिली थी । वे सभी मानव – मानव चिल्लाने से लगे थे। इस बार जयंत खूब चालाकी से काम लिया था। उसने एक चालाकी और कई, वह एक क्षण के लिए किसी पत्ते में चिपक सा गया था। फूलमती उन दैत्यों को आवाज देकर कही। तुम लोग खामख्वाह क्यों हल्ला कर रहे हो….? कहांँ है……? मानव कहांँ है……? मानव… यहाँ तक बचकर कैसे आ सकता है….. जाओ….. सब जाकर सो जाओ….. मैं भी अब जाकर सोती हूँ। बाबा की कृपा से वह पहले जैसा रूप में हो गया।इधर उधर देखने पर उसे एक सुंदर हरा भरा सा अनार का पेड़ दिखाई दिया। जल्दी से वहां पहुंचकर वह उस पेड़ को गौर से देखा। उस पेड़ में सिर्फ एक ही सुंदर सा अनार का फल दिखाई दिया। साधु बाबा उसे जैसा बताए थे वह वैसा ही किया था । उसने अनार के उस फल को एक ही झटके में तोड़ लिया। जयंत अब साधु बाबा के पास आ गया था। साधु बाबा उसे देखकर बहुत खुश हुए थे। उसने असंभव काम को संभव कर दिखाया था। बाबा ने कुछ सोच – विचार कर उस फल को भस्म कर दिए और फिर उस भस्म को एक पुड़िया में बांधकर जयंत को वापिस कर दिए। देखो बच्चा…. यह पुरिया बीच में मत खोलना….. यह तेरे गुरुजी ही खुलेंगे…… तभी तुम्हारा वाण…. तुम्हें वापस मिल पायेगा। तभी जयंत आश्चर्य से अपनी आंखें भींच ली। जयंत एक बुद्धिमान लड़का था। वह हंँसता – खेलता और उछलता अपने गुरु जी के पास पहुंचा।जयंत – जयंत ….. जी गुरु जी…. मैं आ गया।मैं आ गया गुरु जी। उसने अपने गुरु जी के पैर छूकर दण्डवत किया । गुरुकुल में जैसे खुशी के दीप जल गए। गुरु जी सहृदय अपने उस शिष्य को गले से लगा लिये। बाबा जैसे कहे थे जयंत ने भी उसी तरह किया। अपने हाथ का वह पुड़िया उसने गुरु जी को दे दिया। गुरु जी तो सारी बातें जान ही रहे थे। जंगल में जो साधु बाबा उसे मिले थे वो और कोई नहीं, गुरु जी ही तो थे। उसने सात समंदर पार जंगल में रह रहे असुरों को नष्ट किया था। एक अनार क्या भस्म हुए, सारे दैत्य ही मारे गये।जब गुरु जी उस पुड़िया को खोले तो एक सोलह बर्ष की नव युवती सोलह श्रृंगार के साथ वहाँ आ धमकी। ये आश्चर्य देखकर जयंत दंग सा रह गया। फिर तो विधि – विधान के साथ उन दोनों की शादी हो गई। इस तरह गुरु जी के आशीर्वाद से यह सब संभव हो पाया । जयंत धनुष विद्या में निपुण निकला, पर यह सब केसे हुआ। उसे कुछ समझ में नहीं आया। आश्रम की ओर से जयंत को परमवीर पद की उपाधि दी गई। गुरु जी की ही कृपा थी की वह भादवासी का एक बहुत बड़ा सेनानायक बन गया और उसने अपने कर्तव्यों का ठीक ढ़ंग से पालन भी किया। अब तक करीब – करीब सभी शिष्य थक कर वापस आ गए थे, पर किसी ने अपना बाण वापस लेकर नहीं आया था। कई वर्ष बीत गए पर राजहंस वापस नहीं लौटा। यह देख – सुनकर गुरुजी उसे यूं ही खोजते-खोजते किसी राज्य में पहुंच गए। उस राज्य में कई वर्षों से भारी युद्ध हो रहा था। गुरु जी इस युद्ध में अपने शिष्य राजहंस को शामिल होते देख बहुत पसंद हुए। राजहंस गुरु जी को देखते ही दौड़ पड़ा और उन्हें दंडवत करते हुए इस युद्ध में विजय प्राप्त करने को आशीर्वाद चाहा। गुरु जी की कृपा से और आशीर्वाद से वह यह रंण जीत ही लिया। राजहंस के बाणों के कमाल से वहां की सारी प्रजा मुक्त हो गई। वहाँ की प्रजा इस जीत के लिए उसे ही राजा घोषित कर दिया। गुरु जी यह देखकर गद् – गद् हो गए और फिर राजहंस को उसने वीर की उपाधि दी।[2/17, 12:29] Bindeshwar Prasad Sharma: माँ सौ टकिया – बेटी नौ लखियाचौधरी खानदान कहिए या जाट परिवार, दोनों एक ही वंशज के दो उपनाम हैं। इन्हीं वंशजों के एक उपनाम में इस उपेक्षित बालिका की जन्म हुई, जिसकी मां फैशन यानी डिस्को की दुनिया में दीवागी थी। 18 अक्टूबर उन्नीस सौ 68 को हरियाणा में जन्मी अनीता सिर्फ अनिता ही नहीं थी। उस समय उसके पिता मेजर महेंद्र प्रताप सिंह चौधरी “नेफा” मोर्चे में सीमा पर लड़ाई करते – करते वीरगति को प्राप्त हो गए थे। इस वक्त अनीता अपनी मां के साथ दिल्ली में ही रह रही थी। दो-तीन महीने की अनीता अपने पिता को देख भी नहीं पाई थी कि उसके माथे पर से उसके बाप का साया उठ गया । मां शकुंतला देवी अपनी बेटी को जन्म देने के बाद भी अपने में ही अस्त – व्यस्त रहती थी। अनीता की माँ एक बेबी कट औरत थी। वह अपने रूप को निखारने – संवारने, सजाने और फैशन बदलने में ही ज्यादा तर समय को बर्बाद करती थी । उस समय अपने आपको शकुंतला देवी किसी हीरोइन से कम नहीं आंकती। रूप भले ही उसका सुंदर ना हो पर नए फैशन को आड़े हाथ ही लेती थी। पति के मर जाने का उसे थोड़ा भी क्षोभ ना था। इस समय शकुंतला अपने कैरियर के पीछे जैसे पागल होकर सब कुछ भूल गई थी। इतनी बड़ी घटना के बाद भी वह अपने आप में मस्त थी। कौन क्या है, मेरा क्या है, किसी से कोई मतलब नहीं। कैरियर के पीछे जैसे वह सब कुछ भूल ही गई थी। अपने जीवन काल के 20 बरस वह पार कर चुकी थी। शकुंतला अपना सब कुछ छोड़ कर फिर से पढ़ाई और फैशन में उतर आई थी। ऐसा लगता था कि शायद किसी ने उसे बहका दिया हो। एक समय के लिए ऐसा लग रहा था कि अनीता की जिंदगी के साथ खिलवाड़ हो रहा है। अनीता को संभालने वाला भी तो कई नही था। दाई जैसे – तैसे उसे संभाल रही थी। हालांकि अनीता को संभालते – संभालते उसमें मातृत्व जाग गयी थी। अपने कोख से जन्मी बच्ची को इस तरह तवज्जो नहीं देना एक माँ के लिए चुल्लू भर पानी में डूब कर मर जाने के बराबर था। इस तरह अनीता दूसरी – तीसरी की गोद में ही पलने लगी। एक माँ का ही प्यार अनीता को नहीं मिल पा रहा था, जो उसे चहिए था। माँ के लिए अपने बच्चे की जिम्मेवारी ही सब कुछ होती है, किंतु शकुंतला इस जिम्मेवारी से कभी प्रभावित नहीं हुई। वह अपने कर्तव्यों को कभी जान भी नहीं पाई और ना ही कभी जानने की कोशिश भी की। एक नए सिरे से जिंदगी जीने की धुन सवार हो गई थी शकुंतला को। वह ज्यादा पढ़ी-लिखी औरत तो थी नहीं पर उसका अध्ययन उसे काफी ऊंचा ओहदे तक लाकर खड़ा कर दिया। वह दिनों दिन तरक्की की सीढ़ियों पर चढ़ती गई। शकुंतला इस तरह अपनी कैरियर तो बना ही रही थी पर अपनी बेटी की जिंदगी भी वह एक तरफ खराब कर रही थी। बेटी का क्या होगा उसका उसे ध्यान कभी नहीं आया। वह कभी नहीं सोच पाई थी कि मैं भी एक माँ हूँ। इस बीच किसी ने अनीता का उपनाम यानी प्रमिला रख दिया था। कोई उसे कभी अनीता कह कर बुलाता तो कोई प्रमिला। जब अनीता यानी प्रमिला पढ़ने के लायक हुई तो समाज के लोक – लाज से बचाने के लिए उसकी मां ने उसे लारेंस स्कूल में दाखिला दिलाकर उसे उसी हॉस्टल में रखवा दिया। तब अनीता करीब 5 बरस की हो गई थी। जयपुर के लारेंस स्कूल ने अनीता को काफी तेज बना दिया। पढ़ने – लिखने के मामले में वह कक्षा की अब्बल दर्जे की विद्यार्थी बन गई। लॉरेंस स्कूल में वह 1973 से 1975 तक के अध्ययन में जुटी रही। इसके बाद उसकी मां शकुंतला ने उसे महारानी गायत्री देवी स्कूल में दाखिला दिलवा दिया। उस समय यह स्कूल अपने देश के गर्ल्स स्कूलों में सर्वश्रेष्ठ समझा जाने वाला स्कुल था। जयपुर का यह स्कूल अपने आप में एक मिसाल था। कहा जाता है कि यहां की पढ़ाई शांतिनिकेतन नेतरहाट से भी बढ़-चढ़कर है।अनीता के लिए स्कूल हॉस्टल का खर्च उसकी मां शकुंतला ही देती थी। गायत्री देवी गर्ल्स स्कूल में प्राय: उच्चवर्गीय लड़कियांँ ही पढ़ने आती थी।वह देखती और मन में हीनता का अनुभव करती। वह साधारण जरूर थी पर उसका शौक साधारण नहीं था। वह हमेशा नए-नए पोशाक, कीमती विदेशी फैशन वाले कपड़े, सामान से सज धज कर रोज स्कूल आना चाहती थी। पर दूसरे के पहनावे रंग-बिरंगे फैशन को देखकर अनीता मात खा जाती। उसे अपना मन मसोसकर रह जाना पड़ता। जब अनीता अपने बारे में सोचती तो वह सोचती ही रह जाती। वह इस वक्त सोचने के सिवा और कर भी क्या सकती थी? यह सब देख – देख कर अनीता तरस खाती। उसके लिए यह सब करना उसके बस की बात नहीं थी। अनीता की आंतरिक इच्छा उन लड़कियों से थोड़ी भी कम न थी। पर वह इतने पैसा लाती कहांँ से। मांँ जितना पैसा भेजती है वह तो पढ़ाई – लिखाई में ही समाप्त हो कर रह जाती। वैसे अनीता को उस स्कूल की तरफ से छात्रवृत्ति भी दी जाती , लेकिन इससे उसकी जरूरतें पूरी नहीं हो पाती थी। वह रोज उन लड़कियों को देख – देखकर अपने आप में शर्मिंदगी महसूस करती । मन मसोसकर रह जाना पड़ता अनीता को। रात – दिन यही सोचना अनीता के लिए घातक सिद्ध हुआ। इन्हीं ख्यालों में वह हाई स्कूल की परीक्षा करीब 84 प्रतिशत अंकों के साथ उत्तीर्ण हुई। यह मार्क्स एक सम्मान जनक मार्क्स थे जो सबके नसीब नहीं होती। अनीता इंटर की परीक्षा भी काफी अच्छे अंको के साथ पास की। खेलकूद से लेकर गाने-बजाने और डांस प्रोग्राम में भी काफी सक्रिय रही। अनीता एथेलेटिक्स और टेनिस में भी अधिक रुचि रखती थी। उसे खेलकूद में बड़ा मजा आता । घुड़सवारी करना तो उसे खूब अच्छा लगता था। वैसे वह सांस्कृतिक कार्यक्रम में भी किसी से पीछे ना थी। इसके स्टेज पर आते ही तालियों की गड़गड़ाहट गूंज जाती। इसके रुप में जो जादुई थी वह अच्छे – अच्छों को मात दे जाती। किसी को भी आकर्षित करने में किसी दृष्टि कोण से वह कम न थी। लोग इसे विश्व सुंदरी यह स्वर्ग की परी कहकर ही पुकारते, लेकिन यह सब एक भ्रम ही था। भ्रम हमेशा भ्रम ही होता है। अब अनीता दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज में बीए की छात्रा थी। यहांँ पर उसका मन और दिल दोनो ही हिलकर रह गया था। दिन पर दिन फैशन के बढ़ते कदमों के आगे उसने भी पैर आगे बढ़ा दिए। उस फैशन को पूरा करने के लिए पैसे कमाने का भूत उस पर सवार हो गया। इस तरह वह किसी भी तरह से पैसे कमाने के लिए सोचने लगी।अब तक के सोच में उसे कोई तरकीब दिखाई नहीं दी। अंत में वह मन ही मन में यह फैसला कर ली कि पैसा कैसे कमाया जाय। पैसा कमाने का मतलब है मॉडलिंग। मॉडलिंग से ही पैसा कमाया जा सकता है। इसके लिए वह सबसे पहले अमीर लड़कों से दिखावटी दोस्ती करनी शुरू कर दी। अब अनीता उम्र के 17 वें वर्ष को पार कर चुकी थी।अब अनीता उन अमीर लड़कों के साथ दिल्ली के कुछ बड़े – बड़े होटलों में रातें भी बिताने लगी। इस तरह से अब उसके हाथ पैसों से भर आया। अनीता ऐशो-आराम – शान ऐ शौकत से रहने लगी। अब वह अपनी जरूरत की चीजें खुद ही बाजार से लाकर उसे व्यवहार में लाने लगी। जो भी उसे पसंद आ जाता वह खरीद ही लाती। दो-चार दिन पर तो वह मॉल या पैंठ (बाजार) जरूर ही चली जाती। नए – नए फैशन के जो भी कपड़े बाजार में देखती वह उसे खरीद ही लाती। कभी वह ढीली – ढाली कपड़े पहनती तो कभी चुस्त – दुरुस्त। जो कपड़े उसे पसंद आ जाते वह वही पहन लेती। ब्यूटी पार्लर जाकर कभी भौं बनवाती कभी फेशियर तो कभी बाल ही कटवा कर आती। ज्यादातर अनीता को ढीले-ढाले कपड़े वाली पहनावा ही अच्छी लगती। अच्छे-अच्छे कपड़े और महंगे विदेशी सामान भी उसे पूरे होने लगे थे। जब कभी उसकी मां उससे मिलने आती तो वह डांट फटकार लगाकर वापस चली जाती। उसकी मां अपने आप में मस्त थी। बेटी का कुछ भी ध्यान नहीं था। अनीता अपनी मांँ के लिए केवल नाम की ही बेटी थी। उसे उसका प्यार कभी न मिला। अनीता को भी उसकी मांँ का इस तरह डांट-फटकार लगाना अच्छा नहीं लगता था। कभी – कभी तो वह उल्टे मुंँह जवाब भी दे दिया करती थी। बात बढ़ती गई। यहांँ तक कि बातेंअब तू – तू, मैं-मैं तक भी आ गयी थी। इस तरह की नौबत देखकर कुछ समय के लिए उसकी माँ शकुंतला सोच में पड़ जाती थी। पर इससे उसके उपर कोई खास अंतर नहीं आया। अनीता भी अपनी मांँ को मांँ नहीं समझती। बचपन कैसे बीता, वह सब उसे पता था। जब – जब उसकी मांँ उस पर पाबंदी लगाने की कोशिश करती, अनीता उसकी आंँखों से दूर बहुत दूर होती जाती। अब तो अनीता अपनी मांँ से दूर – दूर रहने लगी थी। मांँ – बेटी का रिश्ता पहले भी केवल दिखावे के लिए था और आज भीम वह उसी तरह की रह गई। उसके चाल-चलन में कोई परिवर्तन नहीं आया। माँ और बेटी के बीच अब बोलचाल भी बंद हो गई थी। इतना सब कुछ होने के बाद भी शकुंतला की मति नहीं फिरी। एक दो बर्ष बाद उसे अपने आप अपने कर्तव्य याद आने लगे। शकुंतला अपनी आधी उम्र पार कर चुकी थी, लेकिन फैशन में वह अब जस की तस थी। तनिक भी किसी से वह कम न थी। शकुंतला को अपनी बेटी पर अब लगाम लगाना कठिन सा प्रतीत हो रहा था। पहले तो उसने थोड़ा भी ध्यान नहीं दिया और अब, अब तो वह हाथ से निकल गई थी। उधर अनीता अपने आप में मस्त थी। जो मन कहता वही करती। आसपास के सभी लोग चर्चा करते कि मांँ जैसी थी बेटी भी उसी तरह निकल गई। मेजर महेंद्र प्रताप सिंह चौधरी की बात ही कुछ और थी। तब सब लोग उन्हें अच्छे – अच्छे लोग जानते थे। बड़ी शान-शौकत से उसने अपने जीवन काल को बिताया था, लेकिन भगवान ऐसे व्यक्ति को रहने ही कहाँ देते। आज अगर वे होते तो इस तरह की नौबत ना आती। आज जितनी तौहीनी हो रही है इसकी जिम्मेदार खुद शकुंतला देवी है। एक मांँ के लिए अपनी बेटी के बारे में उल्टी-सीधी तरह – तरह की बातें सुनकर चुप रह जाना अपने आप में चुल्लू भर पानी में डूब मर जाना था। यह किसी ग्लानी से क्या कम हो सकता है। बेटी की हरकतें दिनों दिन बिगड़ती ही चली गई। उसके व्यवहार बदलते चले गए। सभी लोग उसे हेय दृष्टि से देखने लगे। अनीता एक अच्छी लड़की नहीं है यह सब लोग जानते थे। क्लब जाना अब तो उसके रोज के जिंदगी का फैशन ही बन गया था। अनीता का इस तरह से बदलना किसी को अच्छा ना लगा था। कितनी तेज लड़की थी। पढ़ने – लिखने से लेकर बाहरी दुनिया में भी वह अपना नाम रोशन कर सकती थी। पर इसने तो अपने रास्ते ही बदल लिए। अगर उसके रास्ते नहीं बदलते तो वह देश के लिए एक मिसाल भी बन सकती थी। खैर जब उसके रास्ते ही बदल गए तो बातें करनी बेकार ही थी। वह अपने नाम के साथ-साथ दौलत और शोहरत भी चाहती थी। अनीता के लिए कीमती सिगरेट और साथ में अंग्रेजी शराब उसके पसंद बन गए थे। एक तरफ सिगरेट पीना उसके अहमियतता का परिचय देती तो दूसरी तरफ शराब पीना उसके जिंदगी का हिस्सा बन गया था। सिगरेट पीने में हुआ उस्तादों की उस्ताद थी। बात-बात पर सिगरेट पीना, घिनौनी हरकतें करना उसकी नियति सी बन गई थी। शोहरत और पैसे के लिए वह हद से अधिक गिर चुकी थी। भले ही समाज के लिए वह उनकी नजरों से गिर चुकी थी। समाज के सामने वह प्रताड़ित भी होती चली गई थी। शोषित और उपेक्षित होने के बाद भी उसके स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं आया था। अब भी वह बेतकल्लुफ व गैर मर्दों के साथ ही रहा करती थी। सबसे अधिक आश्चर्यजनक बात तो यह थी कि वह इतनी जल्दी लोकप्रिय हो गई, बड़ा आश्चर्य था। देखते – देखते वह आकाश में बादलों के जैसा छा गई। आइए हम इन्हीं की नजरों में आप के नजरों को केंद्रित करते हैं। इसके लोकप्रियता के अनेक सनसनीखेज के कुछ उदाहरण इस तरह हैं। मॉडलिंग ने इसके कैरियर को जो मेडल दिया वह भी कम चौंकाने वाली नहीं थी। फैशन की दुनिया के पत्र पत्रिकाओं में वह छा गई। यह भी कम चौंकाने वाली बात नहीं थी कि अब वह खुलकर दूरदर्शन पर विज्ञापन में भी छाने लगी। इस तरह से उसे बड़ों की संगति और फिर उसके सहारे से वह काफी आगे बढ़ गयी , लेकिन इस के बढ़ते कदम में कुछ ऐसे रोड़े सामने आए जो उसके लिए बदनामी के सिवाय और कुछ न कर पाए। तब वह दिल्ली छोड़कर मुंबई आ गई थी। मुंबई में भी उसने एक ऐसी किताब जीती कि वह मिस इंडिया ही बन गई। मिस इंडिया का खिताब जीतना उसके लिए गौरव की बात थी। सब लोग यह देख कर मात ही खा गए थे। “फेमिना” पत्रिका द्वारा आयोजित शौर्य प्रतियोगिता में वह खरी उतर थी। अब तो अनीता जैसे चांँद पर ही पहुंँच गई। जान-पहचान इतनी बढ़ गई कि उसे मोबाइल पर से फुर्सत ही नहीं मिलती। अब वह मिस यूनिवर्स बनने की तैयारी में जुट गई। उसके सपने और उसके लक्ष्य के लिए वह पूरी तरह से प्रयत्नशील रही। मर्दों की संगति अभी भी कम न हुई थी। कभी किसी के साथ पेरिस जाती तो कभी इंग्लैंड ही चली जाती। मतलब निकलने के बाद बड़ी मासूमियत से वह दूसरा रास्ता तलाश लेती। पैसा और प्रसिद्धि के लिए अनीता अपने शरीर को शरीर ना समझती। पर मिस यूनिवर्स की खिताब जीतने से वह वंचित रह गई। अपने शोहरत को विश्व पटल पर फैलाने से भी ना चुकी। वह जहांँ भी गई पैसे और शोहरत उसके चरण चूमते गए। मर्दों से बात करने में वह खूब माहिर थी। इस तरह वक्त ने उसे कॉल गर्ल बनाने में भी कुछ भी देरी ना की। अब अनीता को लोग नौलखिया के नाम से भी पुकारने लगे थे। जो शायद उसके आचरण के लिए सार्थक था।[2/17, 20:15] Bindeshwar Prasad Sharma: दूल्हा बाबूलगता है सजी सजाई बारात आज दहेज के बिना वापस लौट जाएगी। हाहाकार सा मच गया था रामधन के यहांँ। वे सपने में भी ऐसा होगा न सोचे थे, पर भगवान ने उन्हें औंधे मुंह गिरा दिया। रात जो दुर्घटना हुई वह किसी से कहते नहीं बनता ।खेतों में से सारे मेहनत के कमाई आज रात डकैतों ने क्षण भर में लूट लिया था। इस तरह उनकी सारी उम्मीदों पर पानी फिर कर रह गई थी। दहेज के सारे रूपये गहने डकैतों ने लूट लिये। दहेज के लिए फिर से इतनी भारी रकम पूरा करना टेढ़ी खीर के बराबर था। उनके बस में अब कुछ भी न था। अकस्मात इस तरह की दुर्घटना से सब लोग परेशान थे। दूसरे दिन घर पर बारात पहुंच आई। बारात वालों को क्या पता कि लड़की वाले के यहाँ क्या हुआ है। यहाँ की घटना से वे अनभिज्ञ थे। वे बेहिचक बारात लेकर चले आए थे। वैसे लड़की वाले काफी उदास थे फिर भी बारात में आने वाले महानुभावों को सेवा – सत्कार और उनका स्वागत करने में उन्होंने कोई कसर न छोड़ी । उन सबों को स्वागत के साथ ठहरने के लिए जगह भी दे दिए गए। रामधन के लिए शर्म की बात तो यह थी कि कहीं उनकी इज्जत ना चली जाय। उन्हें ऐसा लग रहा था कि कहीं सारा किया कराया मिट्टी में तो नहीं मिल जायेगी। राम की मुट्ठी में कैद थी रामधन की बेटी शोभा। इंतजाम के मुताबिक बारातियों की अच्छी खातिरदारी की गयी। समधी मिलन के दौरान लड़के वाले खुशी से बासी उछल रहे थे। फुलझड़ियांँ पटाखे खूब जलाए जा रहे थे। बैंड पार्टी ने तो महफिल में धमाल ही मचा दिया था। बारात के करीब – करीब सभी लोग खा पीकर मस्त थे। बारातियों के ठहरने के प्रबंध भी उसी गाँव के स्कूल में कराया गया था। कुछ लोग वहीँ आराम फरमा रहे थे तो कुछ लोग आँगन में बने माड़ो के इर्द – गिर्द घूमते नजर आ रहे थे। जब शोभा की मांग भरने की बारी आई तो बारात बालों का रंग गिरगिट की तरह बदल गया। रामधन के माथे पर जैसे बिजली कौंध कर गिर गई। पंडित जी का वेद मंत्र पढ़ना एका एक बंद हो गया। काफी शोरगुल होने लगे। शोभा के पिता गए रात की सारी घटना को लड़के वाले को कह सुनाया, पर उन्हें इस बात का यकीन ही नहीं हुआ कि कुछ ऐसा भी हुआ होगा। माड़ो के बीच बैठी सोभा अपने भाग्य पर आंसू बहा रही थी। उसके ऊपर जैसे दहकते अंगारों के शोले बरस रहे थे। वह अपनी प्यारी सी सुंदर और सुकुमार चेहरे को घूँघट में ढककर सखियों के बीच शांत बैठी थी। वह अपनी चेहरे को छुपाती हुई अपने भाग्य को कोस रही थी।उधर शोभा की मां की हालत भी कुछ कहने लायक नहीं थी। घर में आए आमंत्रित सज्जन उन्हें धैर्यता के बाद और दे भी क्या सकते थे। रामधन की पगड़ी गिर चुकी थी। उनके पैरों तले से धरती खिसक कर रह गई थी। मन पागलों सा हवा-हवाई बनकर उड़ने सा लगा था। कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाय। रामधन लड़के वाले के बीच बहुत गिड़गिड़ाए। कितनी मिन्नतें की, पर वह एक न मानें। बस मुंँह में एक ही जवाब था कि दहेज मिलेगी तभी शादी होगी। उसी शर्त पर सिंदूर भी चढ़ाई जाएगी और उसी शर्त पर ही सात फेरे भी लगाये जायेंगे। वरना मैं बारात लेकर वापस चला जाऊंगा। इस तरह लड़के वालों को उल्टी गंगा सा बह जाना सबके लिए भारी पड़ रहा था। इस तरह का जवाब सुनना रामधन को अच्छा न लगा था। उनके लिए फिर से इतनी मोटी रकम लाना हथेली पर दूभ जमाने के बराबर था। वह इस तरह से अपने घर पर आए बारात को वापस चला जाना नहीं देख सकते थे।माड़ो के बीच सन्नाटा सा छा गया था। लड़के और लड़की वालों के बीच तनाव बढ़ती ही चली जा रही थी। पिता के कहने पर दूल्हा भी माड़ो में से उठ कर खड़ा हो गया, पर इसमें उसका क्या कसूर। उसने तो अपने पिता की मान, मर्यादा, आदर, प्रतिष्ठा और सम्मान के लिए ऐसा किया था। इसमें उसकी कोई गलती नहीं थी। वैसे दूल्हा बाबू स्वभाव के बड़े धनी व्यक्ति थे। बड़े नेक दिल वाले इंसान और बुद्धिमता के बादशाह थे। इस तरह इस गांव से बारात वापस चला जाना गांव की प्रतिष्ठा यानी इज्जत चला जाना था। रामधन अपनी मर्यादा बनाए रखने के लिए कुछ उपाय खोज रहे थे, पर अब तक उन्हें कोई उपाय सूझा नहीं था। लड़के वाले चाहते थे कि लड़की वाले से ज्यादा से ज्यादा रकम कैसे वसूल करें , लेकिन रामधन तो ऐसे मजबूर थे जिस तरह से एक भूखा भिखारी एक दूसरे भूखे भिखारी को रोटी के लिए तरसते देखता है। एक टुकड़ा देने के लिए सोचता है। वाह रे मजबूरी हद हो गई। समधी जी को इस तरह अड़ियल टट्टू बनाना शोभा नहीं दे रहा था। गांव वालों को यह बिल्कुल ही अच्छा न लग रहा था। पास पड़ोस वाले यह अच्छी तरह जानते थे कि रामधन के संजोए सारे रुपये डकैतों ने लूट लिये हैं। उन लोगों ने भी उन सबों को समझाने की भरपूर कोशिश की पर उनकी एक न चली। बूढ़े बड़े बुजुर्ग उन सबों को परिस्थितियों के बारे में अवगत कराते रहे फिर भी सारी कोशिशें विफल रहीं। इसके बारे में ढेर सारी बातें बरात वालों के बीच चलती रही। इस तरह हुज्जत होते – होते काफी देर हो गयी। शोभा को माड़ो में से उठा कर घर ले आया गया। सब लोग आश्चर्य और हैरत से देखते रह गए। बूढ़ी -बड़ी जवान औरतें तथा छोटी बड़ी लड़कियां स्तब्ध खड़ी उस सन्नाटेदार दृश्य को देखकर दंग सी रह गयी। हेमा अपनी सहेली शोभा को देखकर हैरान थी। वह उसे देखती की देखती ही रह गई। सबों का चेहरा सुर्ख होता चला गया। घर से क्रंदन की करुण स्वर फूटकर बाहर आने लगी। बजता हुआ लाउडस्पीकर बंद होने से वातावरण में शांति का माहौल मातम के रूप में बदल गया। माड़ो के बीच अभी भी खलबली मचा रही थी। पूरी रात के बाद अब भोर होने को थी। कोयल की मीठी आवाज पर भी उस समय किसी का ध्यान न गया। चिड़ियों की चहचहाने उसके बात बतंगड़ कौवे की काँव – काँव की आवाजें किसी को सुनाई नहीं दी। गांव के ढेर सारे लोग रामधन के आंगन में इकट्ठे हो चले थे। शोभा अपनी मां और उन सहेलियों के बीच अभी भी सिसकियां भर रही थी। कितनी आशा थी शोभा को इस बंधन में बंध जाने का, पर जब वह घड़ी आई तो भगवान ने भी अपना मुंँह फेर लिया। कितनी लगन से वह भगवान की पूजा सालों से कर रही थी, पर लगता था भगवान भी उससे आज नाराज हैं। लगता है मेरी अब तक की सारी पूजा-पाठ बेकार ही गई। इतनी शरीफ लड़की का सारे गांँव में गुहार मच गया। लोग अब यही कहेंगे कि रामधन की बेटी की बारात लौट गई। शोभा का मन भले ही भटक रहा था, पर उसे भगवान पर भरोसा भी कम नहीं था। वह अब भी भगवान से विनती कर रही थी… हे भगवान… यह कैसा समाज है….. कैसे लोग हैं…. इस समाज के…… जो गरीबी और मजबूरी को नहीं समझते….. यह दुनिया कैसी है….. जो दहेज के बिना…… सोचती – सोचती शोभा रुकी थी। शोभा की मां पागल सी होने लगी। उनका हाल बुरा सा होने लगा। बंधे केस बिखरने से लगे। तन बदन पर के कपड़े विशुद्ध होकर बिखरने से लगे। कोई सूध – बूध न रही बेचारी को, लेकिन लड़के वाले का दिल नहीं पसीजा। उन्हें अभी भी विश्वास न था कि यह घटना सच भी है अथवा कोई मनगढ़ंत झूठ। वे चिल्ला – चिल्ला कर बार बार कह रहे थे कि लड़की वाले इसी तरह से बोला करते हैं। यह उनका ढोंग है। हमलोग अच्छी तरह से जानते हैं। दहेज से बचने के लिए लोग इसी तरह का खेल तमाशा करते हैं। बाद जब शादी रुक जाती है तो एक – एक पैसे चूकता करते हैं। मैंने कई शादियां कराई है। इस तरह के ढेर सारे खेल मैंने देखे हैं। लड़की वाले का कुछ जवाब नहीं बन रहा था कि इसका मजा कैसे चखाया जाय। वह तो खुद परेशान होकर अब तब में फंसे थे।महेंद्र को इस तरह अपने पिताजी से ऐसी कोई उम्मीद न थी कि वे इन सबों से इस तरह की इतनी गिरी बातें करेंगे। लड़का पढ़ा लिखा कुछ सोचने वाला इंसान था। पिता के इस की मूर्खता पर वह खुद शर्मिंदा था। वह इन बातों को लेकर काफी परेशान था। आखिरकार महेंद्र बोल ही दिया….. मैं इसी लड़की से शादी करूंगा…… मुझे दहेज की कोई जरूरत नहीं…… इस बात से महेंद्र के पिता को दिल में गहरी घात पहुंची। वह सन्न रह गये। भरी सभा में बेटे को इस तरह से कुछ बोल देना पिता के लिए शर्म की बात थी। उसके पिता और कुछ भी न बोल सके। अपने बेटे पर उसे इस तरह की कोई उम्मीद ना थी। भगवान ने यह क्या किया, वे शर्म से अपनी दोनों आंखें भींच ली। उन्हें अपने आप पर ग्लानि आ गई। महेंद्र ने पंडित जी को बुलवाया। बारात वाले सन पड़ गए। दूसरी तरफ एक नया रंग उमंग जागा। शोभा को यह खबर मिलते ही वह बाग – बाग हो गयी। घबराई हुई शोभा की आँखों में खुशी के आँसू टपक रहे थे। उसके मन के सारे संजोए सपने फिर से रोशनी रंगत होकर जगमगाने लगी।आंँखों से निकले आंँसू की बूंँदे खुशी में बदलते नजर आए। रामधन को खुशी का ठिकाना ना रहा। उन्होंने महेंद्र को गोद में भर कर अपने आप को धन्य किए। रामधन को महेंद्र से ऐसी कोई उम्मीद ना थी, लेकिन महेंद्र ने तो कमाल ही कर दिखाया। शोभा को फिर से माड़ो में लाया गया। पंडित जी फिर से वेद मंत्रों का उच्चारण करने लगे। शहनाईयों की मधुर आवाज फिर से वातावरण में गूंज उठी। फिर से मंगल गीत के साथ युवतियां नाचने लगी। शोभा अपने मन की बर्तन में मीठी पुलाव पकाती हुई चैन की सांसें ली। एक ही क्षण में उसके चेहरे पर का निखार बाहर आ गया। गांँव वालों की मान-प्रतिष्ठा बच गई। धूमधाम के साथ शादी के सभी कार्यक्रम सफल हुए। बेचारी शोभा दुल्हन बन गई। आज वह डोली में बैठकर अपने पी के घर चली गयी। रामधन के माथे का बोझ हल्का हुआ। अब वे चैन की सांस लेते नजर आए। रामधन की पत्नी शोभा की मांँ खुशी से फूले न समायी। वाह रे महेन्द्र… दुल्हा हो तो महेन्द्र बाबू जैसा। लोग उसकी तारीफ करते नहीं भूल रहे थे। रामधन की इज्जत बच गयी। जो बड़ी बात थी।[2/18, 15:06] Bindeshwar Prasad Sharma: चूहों की मौत वाली जहरखजूर की बनी फूलदार चटाई पर बैठे – बैठे मामाजी हमें विज्ञान की शिक्षा दे रहे थे ।मैं बड़े ध्यान के साथ उनकी बातों का अवलोकन कर रहा था। मामी जी किचन में मग्न रसोई तैयार कर रही थी। तभी एक जोर का धमाका हुआ और उस धमाके के साथ मेरे मामा जी शांत हो गए। मामी जी किचन से भागी-भागी मामा जी के पास आ गई । मैं भी मामा जी की गोद में सिमट कर रह गया। क्या हुआ मामा जी….. क्या हुआ……? यह कैसी आवाज है…. । मामा जी बिना बोले , मुंँह पर इशारे की ऊंगली रखकर हमें चुप रहने का संकेत दिए । मैं आश्चर्य से उनका चेहरा देखता रहा। उस संकेत के साथ हमलोग बिलकुल ही शांत हो गये। तभी चार से पाँच आतंकवादी अपने हाथ में बंदूक लिए बेधड़क घर में घुस आए। यह देखकर मामी और मामा जी अवाक् से रह गये। मैं भी डर के मारे भींगी बिल्ली बनकर रह गया। हमलोगों के उपर खतरे की लाल सिग्नल टंग गई थी। मैं तो उनकी बंदूकें देखकरयूं ही हैरत में पड़ गया। मामा – मामी के पैर तले से जैसे धरती ही खिसक कर रह गई। उस समय शाम के छः साढ़े छः बजने के संकेत हो रहे थे। सूरज को अस्ताचल की ओर पहुंचने में थकावट जैसा महसूस हो रहा था। इस थकावट के साथ उसका सफेद सा चेहरा गुस्से में लाल – पीला होता चला गया था। शाम धुंधली हो चुकी थी। आतंकवादी ड्राइंग रूम में प्रवेश ले चुके थे। एक ने झट से प्रवेश द्वार को बंद कर दिया था। मेरे मामा – मामी जी के पास वह पाँचो आतंकवादी पहुंच आए थे। पाँचो बम – बारूद और कारतूस से लैस थे। इस तरह हम सब अपनी मौत अपने पास देखकर काफी हैरत में पड़ गए। जाडे के दिन में भी उनके तन – बदन से पसीने छुटने लगे थे । एक आतंकवादी तभी अपना मुँह खोला और धमकाने के लहजे में बोला…… हम लोग तुम्हारे घर में सिर्फ दो घंटे के मेहमान हैं। इस बीच हमलोग यहीं तुम्हारे पास रहेंगे, और तुम भी यहाँ से कहीं नहीं जाओगे। मामा और मामी जी के होठ जैसे सिल गये हों। वे जवाब में कुछ नहीं बोल पाये थे। एक आतंकी अपने मोबाइल में कुछ टंकण करते हुए नजर आए थे। दूसरा वहीं पास में उसे कुछ इशारा करते हुए बता रहा था। इन लोगों को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। इतना तो जरूर पता हो गया था कि आज कहीं न कहीं कुछ होने वाला है। तभी मुन्ना किचन में चला गया था। मुन्ना को आतंकी घूर जरूर रहे थे पर उनलोगों ने उसे कुछ न बोला। सोचा कहीं वह पानी – वानी पीने जा रहा होगा। मामी जी किचन में खीर बनाकर आई थी। मैंने कुछ सोचा और इस तरह हमें एक ख्याल आया। अरे हां, मामा जी तो हमें बताए थे कि विष खाने से आदमी मर जाता है। इससे हमें कोसों दूर ही रहना चाहिए। अगर किसी तरह से उसे छू भी लिया गया तो हाथ अच्छी तरह से धोकर धो कर तौलिया या गमछे में अपनी हाथ पोछ लेनी चाहिए। फिर मेरे मन में विचार आया क्यों न खीर में विष मिला दिया जाय। बात – बात में उसने ऐसा ही करने को सोचा। अगर यह खीर उन आतंकवादियों को किसी तरह खिला दिया जाए तो वह कुछ जान भी ना पाएंगे और फिर उनकी मौत भी हो जाएंगी। मैं अपने मामी जी के पास यह खीर वाली डेगची लेकर जाऊँगा। आतंकी इसे देखकर हमसे छीन लेंगे। पर विष आएगा कहां से।अरे हाँ याद आया, कल ही तो मामाजी चूहे मारने वाली दवा बाजार से खरीद लाए थे। चूहे की शैतानगी से मामी जी ऊब गयी थी और उसने चूहे मारने वाली दवा मंगवाने को मामा जी से कही थी। मैं जल्दी ही उस चूहे मारने वाली दवा को ढूंढ निकालने में सफल हो गया था। समूचा पुड़िया मैंने उस खीर में उढेलकर उसे अच्छी तरह मिला दिया। बिना डरे मैं मामा जी के पास पहुंँचा। मामा – मामी जी उन आतंकवादियों के डर से थर थर कांप रहे थे। उनके जाने में अभी कोई बीस मिनट का समय शेष था। मामा – मामी जी कुछ सोच भी नहीं पाये थे कि यह सब क्या हो रहा है। तभी एक आतंकवादी मुन्ना की ओर लपका। यह देख मामा और मामी काफी सकेते में आ गये। आतंकवादी मुन्ना को देखकर कुछ खुश हुए और फिर उसने खीर वाली डेगची उससे ले लिए। अरे यार खीर… खीर…. हां उस्ताद। उसके मुँह में यह देखकर जैसे पानी आ गया था। वाह… क्या चीज़ है यार…. तसमई है तसमई। आज का जतरा बहुत अच्छा है। भूख भी लगी है। तभी दूसरा आतंकवादी…. फिर… अरे हाँ – हांँ… पहले खाओ…. फिर देखा जायेगा। स्वाद बिल्कुल रसमलाई के जैसा है…. रसमलाई ।देखते ही देखते खीर चट हो गयी। तभी मुन्ना किचन में से ग्लास और पानी का दो बोतल लेकर आ धमका । आतंकी मुन्ना पर बहुत खुश थे। वे कुछ बोलकर जोर से हंस पड़े। बड़ा सा कलेजा होगा इसका। देखते हो कितना हिम्मत है इसमें। नशे की धूत में और नशा चढ़ गया। मामा – मामी जी हैरत से मुन्ना को देख रहे थे। मुन्ना को इतना साहस कैसे हो गया। हम लोगों के समझ से यह बाहर था। हम लोगों को तो जान की लाले पड़ी थी। खीर ने उसके मामा मामी की जान बख्श दिए, वर्ना उनकी जान यूं ही चली जाती। आतंकवादी लड़खड़ाते कदमों से बाहर निकले। टेक्सी स्टार्ट हुई और इसके साथ गेयर चेंज किया गया। स्टेरिंग मूभ करने के साथ गाड़ी आगे बढ़ गयी। देखते – देखते उसकी गाड़ी हाईवे पर जा चढ़ी। अरे यार मेरा तो मन घूम रहा है। मुझे भी ऐसा लग रहा है यार। गाड़ी तेज चलाओ। सभी के सभी ऐसा ही कहने लगे। अब मुझसे गाड़ी नहीं चलेगी। यह… संभालो स्टेरिंग… मैं नहीं संभाल पाऊँगा। मुझे साहस नहीं हो रहा। मेरा तो अब गला भी घुटने लगा है। मेरा भी गला घुट रहा है शलीम । ऐसा लग रहा है जैसे मेरी फांसी चढ़ रही है। यार मेरी भी यही हाल है। सब के सब खलास होते नजर आ रहे थे। इस तरह सब के सब आतंकवादी टैक्सी में बैठे – बैठे बेमौत मारे गए। इधर मैंने अपने मामा – मामी जी को सारी बातें बता दी। वह तो कमाल ही कर दिया था। आज ही मैंने इसी पर चर्चा चलाई थी और फिर प्रयोग आज ही कर दिखाया। लगी हरे न फिटकरी रंग चोखा वाली कहावत सार्थक होते दिखी। आज तूने वो कर दिखाया जो हर कोई के वश में नहीं होता । मामी जी बोली… ऐसा करते तुम्हें डर नहीं लग रहा था….? डर तो था… मामी जी। मैं जान रहा था कि ये लोग बहुत खतरनाक हैं। आज कुछ न कुछ घटना जरूर घटेगी। तभी मेरे मन में ये सब ख्याल आने थे और मैं किचन में चला गया था। मामी को खुशी का ठिकाना ना रहा।उन्हें बाद में पता चला कि सारे आतंकवादी अपने आप मर गए। खुशी तो तब हुई जब सारी हकीकत पुलिस अधिकारी के सामने आई। आज एक बड़ा हादसा शहर में होते – होते टल गया था। यह सब मुन्ना का ही कमाल था। आज पुलिस के बड़े – बड़े अधिकारी साथ में स्थानीय नेता जी भी उसके घर पहुंचे आये थे ।ये कम बड़ी बात नहीं थी। यह सब देखकर मामा – मामी का कलेजा फुल कर दो गूणा हो गया था। आज मुन्ना नहीं रहता तो न जाने क्या अनर्थ होता।एक भीषण रक्त पात होते – होते बचा था। दरवाजे पर काफी भीड़ सी लग गयी। उन अधिकारियों ने गौरवान्वित होकर मुन्ना को वीर रत्न से पुरस्कृत किया।वाह रे मुन्ना, मौत से लड़कर उसने विजय पाई। हम सब तुम्हें अच्छी जिंदगी की बधाई देता हैं। साथ ही सभी ने मुन्ना को प्रोत्साहित भी किये। नेता जी ने तो उसे गोद में ही भर लिया। सब लोग इसकी बातें सुनकर दंग रह गए। वाह रे मुन्ना… वाह – वाह की आवाजें गूँज कर रह गयी। बड़ा कमाल कर दिखाया था मुन्ना ने।[2/18, 16:04] Bindeshwar Prasad Sharma: सोने की मछलीराजा बिरजू अपने जमाने का बादशाह था। उसे गणपत से पक्की दोस्ती थी ।गणपत बहुत ही गरीब था,अमीरी – गरीबी का फासला उन दोनों के बीच बिल्कुल ही नहीं था। गणपत की शादी के बाद राजा बिरजू ने गणपत के लिए एक सुंदर सा महल तैयार करवा दिया था। गणपत और उसकी पत्नी दृष्टि बहुत ही सुकून से उस हवेली में रहते थे। उन्हें किसी बात की कोई दिक्कत न थी। राजा – रानी के जैसे उनका समय व्यतीत हो रहा था । गणपत बड़ा ही ईमानदार और बुद्धिमान व्यक्ति था। दोनों दोस्त एक दूसरे से खूब प्यार करते थे। दाँत कटी मित्रता थी उनमें । एक बार गणपत को एक सोने की मछली मिली। वह मछली बहुत ही सुंदर और मनमोहक थी। वह मछली वाकई में सोने की थी। उसकी पत्नी इस मछली को देखकर बहुत ही खुश हुई थी। यह एक आश्चर्य था। वह आज तक ऐसी मछली को कभी नहीं देखी थी। देख कर मन को भा गया। वह बासों उछल गई। फिर तो उसे उसने बहुत ही जतन से अपने संदूक में छुपा दी। उस रात गणपत को इसकी सुंदरता का वर्णन करते नहीं बना था । लगभग आधी रात तक दोनों जागते से रह गये। फिर दृष्टि और गणपत को नींद आ गयी। पौ फटते ही जब दोनों के नींद खुली, आँखों के सामने फिर वही सोने की मछली झिलमिला कर रह गयी।गणपत और बिरजू की दोस्ती दूर – दूर तक जाल की तरह फैली हुई थी। दांँत काटी रोटी जैसी मित्रता देख सभी लोग हैरत में रह जाते। सुबह – सुबह गणपत वह मछली लेकर अपने दोस्त राजा बिरजू के पास आया था। राज दरवार में जब उनकी मर्जी होती, बेधड़क चले आता । उन्हें कोई दरवारी अंदर आने से नहीं रोकता ना हीं कोई कुछ उनसे पूछता । बिरजू देखते ही गणपत से बोला था। अरे भई…. सबेरे – सबेरे…. क्या बात है गणपत……. आज बहुत खुश नजर आ रहे हो……. “हाँ भाई…. बात ही कुछ ऐसी है…. ।गजब है दोस्त…… अरे बताओ तो सही… क्या बात है… गजब है….. हाँ -हाँ गजब… क्या बात है…..? बिरजू की उत्सुकता बढ़ती चली गयी। बिरजू … जब हम नदी में स्नान करने गए थे तो एक सोने की सुंदर सी मछली…… सोने की मछली….. हां सोने की…. वह तैरती हुई मेरे पास आई फिर….. फिर और क्या हुआ….. मैंने उसे झट से पकड़ लिया। हाँ दोस्त…. मैंने उसे पकड़ लिया. वह बहुत सुंदर सोने की मछली थी। देखो ना गणपत…. यह सोने की मछली…. मैंने इसे कपड़े में छुपा रखा है। कल से हम और दृष्टि ठीक से सो भी नहीं पाये हैं। गणपत वह सोने की मछली कपड़े से निकालकर बिरजू को दिखा दिया। हाँ गणपत… मछली तो बहुत सुंदर है और सोने का भी है। यह तो एक चमत्कार है गणपत। हाँ दोस्त, इसलिए तो लाया हूं कि वह आपके पास रहे और आपका नाम दूर-दूर तक फैले। मेरी पत्नी दृष्टि यह मछली आपको भेंट करने को बोली है। इस अद्भुत सोने की मछली से आपका नाम भी देश-विदेश में फैल जाएगा और हां हमारे पास तो इसकी रक्षा भी ना हो पायेगी। किसी को इसके बारे में कुछ अता – पता पता चला तो बस हमारी जान की लाले पड़ जाएगी। अरे दोस्त गणपत… मेरे रहते ऐसा तुम क्यों सोचते हो। मछली तेरे पास रहे या हमारे पास, बात तो बराबर है। इसमें डरने की क्या बात है। बोलो तो दो-चार पहरेदार तुम्हारे महल भेजवा दें। नहीं दोस्त, इतना एहसान ना करो हम पर। तुम बहुत अच्छे नेक और कर्तव्यनिष्ठ राजा हो। मैं तुम्हें अच्छी तरह से जानता हूँ। तुम मेरे भगवान जैसे दोस्त हो। दोस्त, हां – हां, ऐसा ना कहो गणपत हम लोग बचपन के साथी हैं और फिर हम जिंदगी भर साथ रहने के लिए भी कर्तव्य बद्ध हैं। हमारी दोस्ती सोने में सुहागा जैसी है। महाराज ऐसा न कहिए… हम दोनों तो एक बराबर ही हैं। हमारी प्रजा भी हमारे जैसे हैं। हममें कोई भेद नहीं है। फिर, फिर तो यह मछली तुम ही रखो। तभी राजा बिरजू की प्यारी बेटी राजकुमारी नैना वहां आ गई। कौन सी मछली की बात चल रही है पिताजी। क्या है गणपत चाचा? सोने की मछली… बेटी… सोने की मछली… बहुत सुंदर है….. देखो ना राजकुमारी नैना…. । और नैना उस सुंदर से बने माया रूपी सोने की मछली को देखकर बहुत खुश हुई। नैना को यह मछली बहुत ही पसंद आया । वह उस मछली को गणपत चाचा से अपने लिए मांग ली। गणपत ने खुशी के साथ नैना बिटिया को उसके हाथ में उसे रख दिया । नैना खुशी से नाच उठी। राजकुमारी नैना उस मछली को मखमल की सुंदर बनी थैली में लपेटकर बड़ी जतन से रखी। जब राजकुमारी नैना सोने लगती एक दो बार उसे जरूर देख लेती। उसकी ऐसी आदत रोज की बन गई थी । बिना देखे वह एक दिन भी नहीं सो पाती । रोज उसे देख कर सोना उसकी आदत सी बन गई थी। उस सोने की मछली को राजकुमारी बड़ा प्यार से दृष्टिगोचर करती थी। उस सोने की अद्भुत मछली को नैना बड़ी जतन से श्रृंगार वाली डिब्बी में बड़ी प्यार से रखती थी। एक रात मछली को देखते-देखते उसकी आंखें लग गईं और मछली वहीं पलंग पर छुट गयी। मछली ठीक मध्य रात्रि ठीक बारह बजे एक राजकुमार का रूप ले लेकर वहीं बैठ गया। वह एक राजकुमार था जिसने अपनी आंँखें उस पलंग पर खोला था। वह अपने आप को एक सुंदर सा राज घराने के माहौल में पाया। वह आश्चर्य मुद्रा में होकर परी के समान उस राजकुमारी को देखता रहा। राजकुमारी नैना बेखबर सोई पड़ी थी। राजकुमार भीतर-ही-भीतर राजकुमारी नैना के साथ मन में प्यार बसा लिया। घंटे बाद वह सुंदर राजकुमार पुनः मछली का रूप धारण कर लिया। दूसरे दिन भी यही घटना घटी, पर उस रात नैना की आंखें खुल गई। मछली की जगह एक सुंदर सा राजकुमार देखकर नैना सन्न सी पड़ गयी। उसे कुछ भी पता न चला कि आखिर ये सब कैसे हो गया। यह सब देखकर राजकुमारी पहले तो घबराई, फिर दम में दम भरकर सकुचाई भी। वह अपनी बड़ी – बड़ी सी भूरी आंखों से कुछ पलों के लिए उसे एकटक देखती भी रही। राजकुमारी नैना कहीं सपने में तो नहीं थी। वह अपनी आंखें मीच – मीच कर तरेरती हुई उसे देख रही थी। उधर राजकुमार भी बिना बोले टुकर टुकर उसकी ओर देख रहा था। यह संयोग ही था कि उसकी मुलाकात इस तरह से हो गयी । उन दोनों की आंँखों में एक – दूसरे के लिए प्यार झलक रहा था। कुछ ही मिनटों के बाद राज कुमार की जगह फिर वही मछली थी। नैना को यह समझते देर न लगी कि यह मछली मध्य रात्रि में अपना रूप बदलता है। यह कोई राजकुमार है। नैना को भी उससे आंखें चार हो गई। प्यार बढ़ता चला गया। इसके बारे में किसी को कुछ भी पता ना था।वह जानती थी कि यह सोने की मछली नहीं कोई सुंदर सा राजकुमार है। राजकुमार से पूछने पर वह अपनी जान एक कमल के फूल में बताया। वह कमल का फूल उस सरोवर में था जो कोसों दूर था। किसी सुनसान पहाड़ी के नजदीक। कमल फूल को मछली में सटाते ही वह मछली हमेशा के लिए कोई राजकुमार बन जाएगा। जब नैना को इसका रहस्य मालूम हुआ तो वह चैन की बंसी बजाई। उसने यह निश्चय किया कि वह जब भी शादी करेगी तो इसी राजकुमार से, राजकुमारी नैना को यह जीवन साथी बहुत ही पसंद आया था। मंत्री के द्वारा इस सोने की मछली की चर्चा हर जगह होने लगी थी। राज्य भर के सभी लोग इसके बारे में जान गए थे। उत्तर भारत के डकैतों ने भी इस कहानी को सुना। इस तरह डकैतों ने एक सभा बुलाई और उस सोने की मछली को टार्गेट में रखा गया। वे सभी डाका डालने को तैयार भी हो गए। एक रात उन सबों ने धावा बोल ही दिया। कितने पहरेदारों की जानें भी चली गईं। आखिरकार डकैतों ने उस मछली को लूटने में सफलता हासिल कर ही ली।ऐसे में एक तरफ राजकुमारी नैना बहुत उदास हो गई तो दूसरी तरफ गणपत चाचा, चाची दृष्टि, पिता जी और माँ के साथ सारी प्रजा। गमगीन का माहौल हो गया था । नैना तो राजकुमार की याद में पागल सी होने लगी थी। दूसरे को क्या पता कि वह सिर्फ मछली ही नहीं एक सुंदर सा राजकुमार भी है। वह उससे बहुत प्यार करती है। बाद गणपत और राजा बिरजू यह सब जानकर आश्चर्य में पड़ गए थे। डकैतों के हाथ से मछली मिलना हथेली पर दूभ जमाने के बराबर था। सारे राज्य के लोग इस घटना से चकित हो गए थे। तभी गणपत की पत्नी दृष्टि एक बात उन लोगों को सुझाई। राजा बिरजू और गणपत को यह बात बहुत अच्छी लगी और वे डंका बजवा दिए कि जो कोई वह सोने की मछली राजा के पास लाकर देगा उसके साथ राजकुमारी नैना की शादी और राज्य का आधा भाग भी दे दिया जाएगा। राजा को अपने मित्र के पत्नी की यह सुझाव अंधे की लकड़ी जैसी लगी थी। इन लोगों का विश्वास था कि डकैत इस जाल में जरूर फस जायेंगे। आम का आम और गुठली का दाम भी निकल जाएगा। पूरे राज्य भर में यह सनसनी फैल गई। खुद डकैतों के सरदार इस लोभ में फंस गए। वह वेश बदलकर सोने की मछली चुपचाप राजा के पास ले आया। गुप्तचरों को उस डकैतों के सरदार को पहचानने में देर न लगी। वह तुरंत सिपहियों की चपेट में आ गया। वह डकैतों का सरदार सबको आश्चर्य भरी नजरों से देख रहा था। उसके पैरों तले से जैसे धरती ही खिसक रही थी। वह सपने में भी ऐसा होने को नहीं सोचा था। डकैतों का वह सरदार लोभ में फंसकर बाजी मार लेना चाहता था। पर यहां तो उल्टी गंगा ही बह गई थी। उसकी चालाकी हवा के वायुमंडल में यूँ ही लोट – पोट होकर विलीन हो गयी थी। राजा बिरजू अपनी सेवा से अधिक राज्य की सेवा करते थे। प्रजा की देख रेख में बड़ी सूझबूझ से काम लेते थे। उनका राज्य बहुत ही विस्तार था। कोई भी प्रजा ऐसी न थी, जिसके पास जगह जायदाद और आभूषण न थे। राजा जानते थे कि डकैत खुद व खुद इस लोभ में अपने आप फंस जाएंगे। मछली का मछली आ जाएगा और डकैतों के सरदार सहित उसके खानदान भी पकड़े जाएंगे। सब कुछ ऐसा ही हुआ। मछली मिली और राजकुमारी नैना उसे देखकर बहुत खुश हुई। मछली उस मध्य रात्रि में आज भी अपना रुप बदली। उसे देखते ही राजकुमारी नैना की आंँखे भर आई। वह जल्दी ही अपने पिताजी को बुलाकर यह सब दिखला दिया। पिता जी यह दृश्य देखकर दंग रह गए। आज तलक इन्होंने ऐसा करिश्मा नहीं देखा था। दूसरे दिन खुद जाकर सरोवर से कमल का वह फूल ले आए। राजकुमारी नैना उस फूल को मछली में सटाई और फिर जादू की तरह मछली राजकुमार बन गया। गणपत और उसकी पत्नी दृष्टि यह देखकर दांँतों तले ऊंगली दवाई। राजा बिरजू और गणपत को खुशी का ठिकाना ना रहा। धूम – धाम से पूरे राज भवन को भी सजाया गया। वे अपनी प्यारी सी बेटी राजकुमारी की शादी में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते थे। सबका मुंँह मांँगी बधाईयाँ दी गयी। खूब नाच – गाने हुए। खूब मौज – मस्ती किया गया। नैना के हाथ उस सुंदर से राजकुमार के साथ पीले कर दिए गए। बाद वह राजगद्दी के सिंहासन पर विराजमान हो गया। राजकुमार आगे चल को बहुत अच्छे ढंग से विस्तार किया। इसके राज्य में भी प्रजा सुख शांति के जीवन बिताए। राज्य के बीच जाति-पाति का कोई भेद – भाव न रहा। लोग अपना काम स्वयं करते थे। राजकुमार खुद ही प्रजा के साथ रहकर उनके दुख – सुख में शरीक होते थे। उनके राज्य में उनके कर्मचारीगण भी बहुत – बहुत खुश थे। वे सत्य नेक और न्याय के राजा न्याय मूर्ति थे।

Оформить и получить экспресс займ на карту без отказа на любые нужды в день обращения. Взять потребительский кредит онлайн на выгодных условиях в в банке. Получить кредит наличными по паспорту, без справок и поручителей

Leave a Reply