कहानियाँ – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

मूर्तिकारपंद्रह वर्ष का बालक हेमंत अब एक नामी – गरामी कलाकार बन गया था। मूर्ति कला में माहिर होने के साथ-साथ वह चित्र कला और संगीत कला में भी उस्तादों का उस्ताद समझा जाने लगा था। माँ सरस्वती ने उसके कंठ में जो राग रसायन भरी थी, वह ज्ञान पराग की तुमड़ी से निकली हुई एक ऐसी बूटी थी जो स्वर्ग में देवताओं को भी मुग्ध कर देने वाला था। इसके चित्रकला और मूर्तिकला में जो जादू था शायद ही किसी में रहा होगा। उस समय के राजा, चक्रवर्ती, सम्राट आदि – आदि उसके अधीन होते नजर आ रहे थे। वे सारे के सारे उसके कलाकारी पर कायल से हो गये थे और हेमंत उन सबों का स्वागत यूँ ही हँसकर कर दिया करता था। काश वह आज जिंदा होता, एक घटना ने उसकी जिंदगी के खेल को ही खत्म कर दिया था । हुआ यह कि एक रात ऐसी मूर्ति बनकर तैयार हुई जो बोलती, हँसती, चलती सब कुछ समझती भी थी। एक समय के लिए हेमंत चौक कर उसे देखता ही रह गया था। आंँखों में आंँखें डालकर वह मूर्ति रुपी अद्भुत युवती उसे प्यार भरी निगाहों से प्यार जताना चाह रही थी। फिर तो वह बोल ही पड़ी…. करीब आओ……. आओ ना…… मैं कितनी दूर से चलकर तुम्हारे पास आयी हूँ. .. कब से तेरा इंतजार कर रही थी….. अब तो….. तुम मेरे पास आओ….. आओ न हेमंत। हाथ में ब्रश लिए हेमंत न जाने किन ख्यालों में डूबा था। इस तरह का आश्चर्य उसने अपने जीवनकाल में कभी नहीं देखा था। आखिर यह सब कैसे हो गया उसे कुछ भी समझ नहीं आया। तब हेमंत अपने पैर को पीछे की ओर बढ़ाया। वह युवती उसके और समीप आ गयी । इस तरह हेमंत तो डर ही गया था। आश्चर्य से उसकी आंखें फैलती सी चली गई थी । तब हेमंत को पीछे हटना लाजमी था। काश यह दीवार उसके पीछे नहीं आई होती तो वह भाग भी खड़ा होता। घबराया सा हेमंत दीवार के सहारे जैसे टिक कर रह गया। तभी युवती फिर से बोल उठी….. मैं तुम्हारी प्रेमिका हूं…… सुनैना नाम है मेरा…….. अगले जन्म में हम तुम्हारे साथ थे। आश्चर्य यह था कि वह मेरा नाम कैसे जान रही थी। मैंने तो सिर्फ कल्पना मात्र से यह मूर्ति बनाई थी और भगवान ने यह क्या कर दिखाया । युवती फिर से बोल उठी…. क्यों चुप हो हेमंत……. बोलो ना… क्या तुम मुझे…. अभी तक नहीं पहचाने…. मैं…. मैं तो तुम्हारी सुनैना हूं…. सिर्फ तुम्हारी सुनैना। दो बार उसके मुंह से उसका नाम सुनकर वह कुछ सोच में पड़ गया था। कुछ देर के लिए हेमंत को यह नाम चौका सा दिया। तभी सुनैना पहली मुलाकात की एक गीत दुहराने लगी…. बागों में फूल खिले थे….. दोनों हम दोनों साथ मिले थे…. ।हेमंत को यह पुरानी गीत कुछ – कुछ समझ में आने सी लगी थी, तभी वह बिना कुछ बोले अपना एक पैर आगे की ओर बढ़ाया था । हेमंत भी उसे निहारता हुआ आँखों में आंँखें डाल भाव विभोर होता चला गया। उसके हृदय के तार स्पंदन करने लगे। प्यार होता चला गया और फिर तो हेमंत उसके साथ ही रहने लगा। एक बार विदेश के राजा हेंगरी ने हेमंत की कलाकृति को देखकर उसे अपने यहां ले गए। हेंगरी ने उसे एक ऐसी मूर्ति गढ़ने को कहा जो अद्भुत और बेमिसाल हो। हेमंत ने भी अपनी जादुई कला से एक अद्भुत सी मूर्ति बनाकर तैयार कर दिया। ऐसा लग रहा था मानो अभी – अभी वह तुरत बोल उठेगी। हेमंत ने उस मूर्ति में जैसे चार चांद ही लगा दिया था । हेंगरी यह देख कर बहुत खुश हुआ। इतना खुश कि वह मुंह मांगा इनाम देने को भी तैयार हो गया। फिर क्षण भर में ही उसकी मति न जाने कैसे बदल गयी। उसने कुछ और ही सोच लिया। अगर यह कहीं फिर से ऐसी दूसरी मूर्ति किसी देश में बना दिया तो उसकी तौहीन होगी। फिर तो उसने अपना रंग गिरगिट की तरह ही बदल लिया । इनाम तो उसने हेमंत को दिया ही पर उसकी जान चली गई। पहले सिपाहियों से उसके दोनों हाथ कटवा डाले , फिर इस तरह भी जब उसका मन नहीं भरा तो उसने हेमंत को समुद्र के बीचो-बीच धकेल कर छोड़ दिया। वह तो मर गया पर सुनैना अपने प्रेमिका हेमंत को महीनों ताकती रही। जब उसके आने में देर होने लगी तो वह खुद ही विदेश के राजा हेंगरी के पास पहुंच गई। हेंगरी उसे देखकर कुछ घबराये फिर उल्टा-सीधा समझा कर अपने सिपाहियों से उसे उसका देश पहुंचाने को बोल दिया। समुद्र पार करते समय हेंगरी ने उसके शरीर के साथ खेलना चाहा। कुछ उल्टी-सीधी हरकतें देखकर सुनैना सीधे समुद्र में छलांग लगा दी। उसके सिपाहियों ने उसे बहुत ढूंढा पर उसका कहीं अता-पता ठीक से नहीं चला। महर्षि विद्याचार्य ने जब अपने शिष्यों को समुद्र के किनारे किसी विद्या को सीखने के लिए भेजा था तो वहाँ यह देख कर सारे शिष्य हैरत में पड़ गए। उन्हें ये सब अपनी आँखों से देखकर दंग रह जाना पड़ा। समुद्र किनारे आधे पानी और आधे रेत पर एक अज्ञात महिला अचेतावस्था में पड़ी थी। शिष्यों ने बड़ी उत्सुकता के साथ उसे उठाकर रेत पर सुला दिये। तब तक महर्षि विद्याचार्य भी वहाँ आ पहुँचे। सुनैना मर चुकी थी, उसके नब्ज ठंडे पड़ गए थे। महर्षि ने पूरे सात घंटे मंत्र पढ़े, सभी शिष्य उन्हीं के ध्यान में खोए थे और तब कहीं सुनैना के प्राण वापस लौटे थे । कुछ ही क्षणों के बाद वह सुगबुगाती सी नजर आयी। धीरे-धीरे उसकी आंँखें भी खुल गई। सुनैना अचंभे में थी कि यह सब क्या हो गया। वह ऐसा कुछ भी न सोच पाई थी कि उसके कुछ ऐसा होगा। अब सुनैना अपने पूरे होशो हवास में थी। सुनैना उठकर महर्षि विद्याचार्ज के चरण छू लेना चाहती थी पर उसमें इतनी हिम्मत ना थी कि वह ऐसा कर सके। महर्षि समझ गए और सहृदय उसे अपना आशीर्वाद भी दिए। शिष्यों ने उस अज्ञात महिला को सहारा देकर आश्रम के कूटी तक ले आये। वनों के औषध से वह कुछ ही दिनों में चंगी – भोली हो गई। महर्षि विद्याचार्ज उसके ललाट से उसके भविष्य को पढ़ लिए। महर्षि को उसके भविष्य के लिए चिंता होने लगी । महर्षि ने उस पुत्री का नाम समुद्री रख दिया। समुद्री आश्रम के कुटी शाला में रहकर महर्षि विद्याचार्ज की सेवा करने लगी। दो-तीन महीने बाद उसके गर्भ से दो पुत्र जन्म लिए। नवजात शिशु देखने लायक थे। महर्षि कह रहे थे इसके ललाट में साक्षत् दिव्य शक्ति विराजमान है। महर्षि विद्याचार्ज के कहने पर सुनैना अपने आप बीती सारी कहानी महर्षि को सुनाई। महर्षि को उसकी सारी बातें समझने में देर नहीं लगी। सूरज के समान चमकता भविष्य उसके जीवन के अंधकार को चीरकर ही रख दिया था। महर्षि विद्याचार्ज ने उन बच्चों को अपना शिष्य बनाकर अपने आप को धन्य कर लिए थे। महर्षि उन बच्चों को शिक्षा देना अपनी गौरव की बात समझ रहे थे । मां भी अपने बच्चों से बहुत खुश थी। चंद्रकांत और सूर्यकांत महर्षि को बहुत प्यारे थे। श्री राम की तरह अल्प समय में ही दोनों भाई विद्या और बुद्धि में निपुण हो गए। जब भी वह अपने पिता के बारे में माँ से चर्चा करता, माँ अपने उन बच्चों को कठपुतली का खेल दिखा कर उसे उसमें उलझा देती। बालक जिद करते- करते आखिर एक दिन जान ही लिया लेकिन पिता के बारे में अधूरी बात से उसे ज्यादा कुछ समझ में नहीं आया। चंद्रकांत और सूर्यकांत हमेशा अपने पिताजी के बारे में कुछ ना कुछ सोचता ही रहता था। भला पिताजी कैसे हैं, कहाँ हैं आदि-आदि। एक दिन दोनों भाई टहलते – टहलते समुद्र किनारे पहुंचे। अचानक सूर्यकांत ने बोला…. भैया… कहीं घूमने के लिए दूर चला जाए…. हां सूर्यकांत…. मैं भी तो यही सोच रहा था, लेकिन माँ हमें दूर जाने की इजाजत नहीं देगी…?.. हां सूर्यकांत फिर गुरुदेव का भी दिल छोटा हो जाएगा….. तुम ठीक कहते हो…. हम सब इन्हें छोड़कर नहीं जा सकते…… अच्छा छोड़ो इन बातों को… ।वे दोनों समुद्र किनारे रेत वाली गीली मिट्टी से दिल बहलाने के लिए कुछ न कुछ बनाकर अपना दिल बहलाने लगे। प्रत्येक दिन चंद्रकांत और सूर्यकांत समुद्र के किनारे पहुंचकर वही प्रतिक्रिया दोहराते थे। जब उससे कुछ अच्छा बन जाता तो दोनों ठहाके मारकर हंस पड़ते। सूर्यकांत कहता हम भी बापू की तरह मूर्तिकार बनेंगे ।मूर्तिकला की यह विद्या चुपके – चुपके में ही उसने सीख लिया था। माँ और गुरुजी उसके हाथ के बनाए भगवान गणेश की मूर्ति देख कर अति प्रसन्न हुए थे। एक दिन समुद्र किनारे कोई बड़ा सा पत्थर पानी में झांकता हुआ दिखाई दिया। यह दृश्य दोनों भाइयों के मन को मोह लिया ।सूर्यकांत ने तो कह ही दिया था कि भैया चल कर उस पत्थर पर बैठते हैं, बड़ा मजा आएगा। फिर क्या था दोनों भाई पानी में उतरकर उस पत्थर पर जा बैठे। पत्थर पर बैठते ही वह पत्थर एक बार के लिए हिल सा गया। दोनों भाई कुछ देर के लिए डर से गए। अरे यह क्या ? यह तो पानी में चलना भी शुरू कर दिया। उन दोनों को अब डर भी होने लगी कि भला अब क्या होगा? देखते-देखते पत्थर का चलना काफी तेज हो गया। अब वे दोनों उस अथाह पानी से निकल कर कहीं बाहर जा भी नहीं सकते थे। तभी सूर्यकांत ने कहा….. भैया कहीं दूर देश घूमा जाए.तो मजा आ जाएगा। चलो यह पत्थर कहीं ना कहीं किनारा तो लगेगा ही। हाँ भैया चंद्रकांत…. लेकिन माँ तो हम लोगों के लिए विह्वल हो रही होगी। हम उन्हें मंत्र से संदेश भेज देंगे भैया…. हमने यह विद्या आप की अनुपस्थिति में गुरु जी से सीखी थी। पत्थर का तेज चलना अब तक जारी था। अब वह पत्थर किनारा पहुंचने ही वाला था, और उधर कुछ जंगल, पहाड़ भी दिखाई से देने लगे थे। पवन के समान तेज चलने वाला यह माया रूपी पत्थर मन में कई सवाल उत्पन्न कर रहे थे। जब वह पत्थर किनारे पहुंचकर रुका तो आकाशवाणी हुई। मैं तुम्हारा पिता हूंँ… अब मैं पत्थर हो गया हूंँ… इस देश के राजा हेंगरी ने मेरे दोनों हाथ काट डाले थे। इतना ही नहीं वह मुझे समुद्र के बीचो-बीच फेकवा भी दिया था । तुम दोनों इस प्रतिशोध का बदला जरूर लेना। मैंने तुम्हें मुकाम तक छोड़ दिया है। उसने हमारा परिवार छिन्न-भिन्न किया …. उसे तुम छोड़ना मत। समुद्र किनारे तुम रोज – रोज खेलने आते थे तो मैं तुम्हें देख – देख कर बहुत खुश होता था। मैंने कितनी बार तुमसे बातें करनी चाही पर मैं बोल नहीं सका। भगवान ने तुम्हें खुद मेरे गोद में भेज दिए। जानते हो…? जब तुम्हारी माँ मुझे पता लगाने आई थी तो वह दुष्टराजा ने तुम्हारी माँ की इज्जत के साथ खेलना भी चाहा था। राजा की नीयत खराब हुई थी। यह सब देखकर तुम्हारी माँ समुद्र में कूद गई थी। मैंने उसे बचाया इसलिए कि उसके गर्भ में तुम जैसे मेरे लाल पल रहे थे। मैंने समुद्र पार कर उसे किनारे तक पहुंचा दिया था । वहाँ कोई गुरु अपने शिष्यों को शिक्षा देते थे। बातें सुन – सुनकर दोनों भाइयों को बड़ी हैरत हो रही थी। तभी फिर से आवाज आई…. जा बेटे जा… बुद्धिमानी से काम लेना…. मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है…. उस दुष्ट को जाकर खत्म कर दो…. ।पत्थर पर से दोनों उतरकर जंगल के रास्ते होते नगर की ओर बढ़ चले। सबसे पहले उसे एक बुढ़िया की छोटी सी झोपड़ी मिली। बुढ़िया इन कुमारों को देखकर बहुत खुश हुई। उस पर दया आ गई बुढ़िया को। बुढ़िया को आज तक इतनी प्यारी – प्यारी बातें बोलने वाला कोई ना मिला था। उसकी मीठी-मीठी बातें उसके कलेजे में उतर सी रही थी। बुढ़िया के परिवार में और कोई ना था। उन कुवारों को देखकर बुढ़िया को अपने बेटे की याद आ गई। बचपन में वह इन्हीं कुमारों की तरह दिखता था, लेकिन एक बीमारी ने उनके बच्चे को उसकी गोद से छीन लिया था। चंद्रकांत और सूर्यकांत उस बुढ़िया के स्वभाव को देखकर बहुत ही खुश हुए। ऐसा लग रहा था जैसे उसका ठिकाना मिल गया हो। उन दोनों ने यहीं पर रहने की तरकीब सोची। हुआ यही कि दोनों भाई उस बुढ़िया का मेहमान बनकर रहने लगे। दोनों ने मिलकर बुढ़िया की बहुत सेवा की। कुछ दिनों बाद दोनों ने छोटे-छोटे मूर्ति बनाने के काम शुरू कर दिए। उन मूर्तियों को वह पास के बाजार में जाकर बेच आया। बुढ़िया से कोई पूछता तो वह दूर के रिश्तेदार बता कर टरका देती। फिर उसने अपने हुनर से 30 अजीबोगरीब मूर्तियाँ तैयार कर लिए। रात में सोते समय सूर्यकांत ने बुढ़िया से कहा…. मामा (दादी) जी एक किस्सा सुनाओ…. मेरी मां हमें रात को रोज सोते समय किस्सा सुनाती थी। फिर उस बुढ़िया को एक किस्सा सुनाना ही पड़ा था। वही किस्सा जो उसने समुद्र के किनारे पत्थर से सुनी थी। किस्सा का एक – एक पहलू उसके लिए बदले की आग बन रही थी। तब चंद्रकांत ने हेंगरी के बारे में काफी पूछताछ की थी । बुढ़िया – ऐसे तो हेंगरी स्वभाव से अच्छा आदमी है पर वह किसी भी चीज के बारे में कठोर कदम उठाता है। बड़ा जिद्दी किस्म का आदमी है, इसलिए तुम्हें मैं मूर्ति बनाने से मना कर रही थी। उस बेचारे ने क्या किया था जिसकी वजह से उसने उसके हाथ काट डाले थे। और फिर उसे बीच समुद्र में फेकवा भी दिया था। बस एक बात के लिए कि उसने हेंगरी की बात नहीं मानी थी। हेंगरी उससे इकरार करवाना चाहता था कि ऐसी मूर्ति वह फिर से कहीं ना बनाए। इससे वह इंकार भी कर गया था। बदले में उसकी जान भी चली गई। अच्छा छोड़ो इन बातों को…. मैं तुम्हें मूर्ति बनाने नहीं दूंगी…. कहते-कहते बुढ़िया का गला रुंध गया, और वह खाट पर लुढ़क गई। दोनों भाइयों ने उसे सहारा देकर उठाया। जब सिर थोड़ा हल्का हुआ तो फिर बुढ़िया वही बात दुहराई…. मैं तुम्हें अब मूर्ति बनाने नहीं दूंगी। जब इन मूर्तियों को बाजार ले जाया गया तो वह सोने की भाव बिकी। यह देख दोनों भाई बहुत खुश हुए। बुढ़िया को वह सारा पैसा उसके झोली में डाल दिए। बुढ़िया गरीब थी इतने धन देखकर खुश हो गई ।यह बात राजा हंगरी के पास पहुँचते देर न लगी। फिर तो हंगरी ने अपने आदमियों को उस बुढ़िया के पास भेज ही दिया। जब उसका आदमी दोनों भाइयों को राजा के पास चलने को कहा तो दोनों भाई जाने से इंकार कर गए। उनके आदमियों ने सख्ती से काम लेना चाहा पर बुढ़िया ने उसे वापस भेज दिया। यह कहकर कि राजा हेंगरी खुद इन्हें ले जाएँ। ये बालक उनके साथ खुद चले जाएँगे । तभी एक बाज संदेशा का एक पुर्जा उसके पास गिराकर उड़ता चला गया। अरे यह तो मां की लिखी चिट्ठी है। प्रिय चंद्रकांत और सूर्यकांत बहुत-बहुत प्यार। मैं पहले घबरा सी गई थी। तुम्हारा संदेश मेरे मन से ही मुझे प्राप्त हो गये थे। मैंने तुम दोनों के लिए महर्षि विद्याचार्य से आशीर्वाद दिलवाए हैं। मैं भी तुम्हें आशीर्वाद देती हूं। तुम भली-भांति लौटकर आओ। गुरुजी अपने मंत्रों से हमें सब कुछ बता दिए थे। बुढ़िया यह संदेशा सुनकर बहुत खुश हुई थी। दूसरे दिन राजा हेंगरी बुढ़िया के पास खुद ही पहुंच आये थे। राजा के कहने पर दोनों भाई जाने को तैयार हो गए। अब दोनों भाई राजा हेंगरी के साथ उसके दरबार में पहुंच गए थे। देखो… ठीक इसी तरह की मूर्ति तुम्हें बनानी है…… इस मूर्ति को मैं अपनी बहन इलीसा को भेंट में दूंगा….. मैंने तुम्हारे बनाए मूर्तियों को देख लिया है…… तुम इसे बना सकते हो…… ।ठीक है राजा….. लेकिन इसके लिए हमें एक लाख अशर्फियाँ आपको देनी होंगी। ठीक है….. अगर तुम ऐसा बना दोगे…. तो तुम्हारी शर्त हमें मंजूर है….. लेकिन…. हमें पचास हजार अशर्फियाँ अभी चाहिए। ठीक है…. कल तुम्हें यह दे दिया जायेगा। दोनों भाई जमकर मूर्ति बनाने लगे। उसने उस पचास हजार अशरफियों में से पच्चीस हजार अशर्फियाँ उनके ही सिपाहियों में चोरी-छिपे बांट दिए। अब कुछ इने-गिने सिपाही ही बचे जो उसके तलवे चाटने वाले थे। उन सबों में भी वह पच्चीस हजार अशर्फियाँ उनको भेंट कर दिए। जब ठीक उसी की तरह दूसरी मूर्ति बनकर तैयार हुई तो राजा बहुत खुश हुए। उसने बाकी के पचास हजार अशर्फियाँ भी उसे दे दिए। राजा को इस बालक से ऐसी उम्मीद ना थी। राजा शाबाशी देते हुए उन बालकों को बोले, वाकई में तुम दोनों बहुत अच्छे कलाकार हो। इसका जोड़ और कोई नहीं हो सकता। देखो दोनों मूर्ति में कोई अंतर ही नहीं। जिसने पहले यह मूर्ति बनाई थी। उसके हाथ मैंने कटवा दिए थे। वह भी उसकी भूल थी। मैंने ऐसा कोई कदम उठाना नहीं चाहा था पर उसने मेरी बात सुनी ही नहीं। मैंने उससे कहीं भी ऐसी मूर्ति ना बनाने का वचन मांगा था, लेकिन उसने इससे इंकार कर गया था । बदले में मैंने उसे कठोर दंड दिया। खैर इन बातों को छोड़ो… और देखो…. तुम्हें भी कुछ इस तरह के वचन देने होंगे। इस तरह की मूर्ति तुम अब कहीं नहीं बनाओगे वरना फिर मुझे भी वही कदम उठाने में मजबूर होना पड़ेगा । दोनों भाइयों का गुस्सा सातवें आकाश को छूता हुआ सा प्रतीत हो रहा था। उन दोनों के दिलो-दिमाग में अंगार जैसे कोई लावा बरक रहे थे। भीतर बदले की आग सुलग रही थी। राजा ने फिर वही कदम उठाया लेकिन यह क्या… कोई भी सिपाही आगे नहीं आया। क्या बात है कमांडर….. तुम लोग को क्या हो गया है….. क्यों नहीं आगे बढ़ते…. डांट लगाते हुए राजा हेंगरी ने चिल्लाया था। दोनों भाई ठहाके मारकर जोर-जोर से हंस पड़े थे। फिर उसने भी कठोर कदम उठाये। उन दोनों भाइयों की आँखें अंगार सी लाल बना ली । ऐसा लग रहा था मानो आँखों से खून अब टपक पड़ेगा। आज उसकी बारी थी। वह गला फाड़ – फाड़ कर चिल्लाने लगा। जानते हो…. जिसे तुम ने सजा दी थी….. वह मेरे पिताजी थे। यह भारी – भरकम आवाज दोनों भाइयों के थे। हेंगरी के कान उस भारी आवाज़ से सन्न पड़ गया था। उसके दिलो-दिमाग में करंट सी चकाचौंध कर देने वाली एक खौफ समा कर रह गयी । सिपाहियों को इस तरह से बदल जाना उसके लिए धिक्कार की बात थी। दोनों भाइयों ने जो कदम उठाए थे वह अनुकरणीय था। दोनों भाई एक साथ हेंगरी पर टूट गए और किस्सा तमाम कर दिया उसका । फिर तो वह वहां के राजा ही बन गए। सब सिपाही उसके अधीन में आ गए। पूरे राज्य पर राज-पाट चलने लगा। बुढ़िया भी उस राजघराने में रहने लगी। माँ को भी चंद्रकांत ने अपने पास बुला लिया। गुरुदेव महर्षि विद्यचार्य का भी आने का आमंत्रण दिया, पर वे नहीं आ पाए। सब सुख और शांति से रहने लगे। एक प्रतिशोध का बदला पूरा हुआ। एक भटकते आत्मा को शांति मिल गयी।वरदानकहानीकार – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दुबाढ़ – पटनारविशंकर कोई हनुमान नहीं था, जो धवलागिरी जैसे पर्वत को उठाकर लंकापुरी से होते हुए ले आता ।वह तो साधारण सा (मनुष्य) इंसान था। जिसमें कमाल की शक्ति निहित थी। हनुमान जैसा तो नहीं जो देखते-देखते सूरज को निगल गया और हंसते-हंसते सागर को लाँघ गया। कहा जाता है कि रविशंकर पर हनुमान जी हमेशा सहाय रहते थे। रहते भी क्यों नहीं होंगे, इसलिए कि वह अपने दोनों हाथों के बल व्यस्क हाथियों को बे हिचक एक – एक कर हवा में उठाकर दौड़ते फिरते । लोगों को यह देखकर बड़ा आश्चर्य होना पड़ता था। सभी लोग दंग रह जाते थे। सब कहते थे यह कोई जादू टोना या नजर बंद है, पर अवधपुर वाले लोग इसे बिल्कुल ही सत्य मानते थे।आज से लगभग सात हजार वर्ष पूर्व इनका अखाड़ा उत्तर भारत में हिमालय के इर्द-गिर्द ही बताया गया है। पंडित सोमनाथ निराला के अनुसार इनकी भाग्य रेखा किसी जलते दीपक जैसा ही प्रज्वलित था। यह उनके अगले जन्म में कठोर तपस्या का ही फल बताया गया है ।एक रात धरती काँप जाती है।जोरों का भुचाल आ आता है और एक झटके में ही सारा खेल बिगाड़ कर तहस – नहस हो जाता है। एक ऐसा भूकंप जिसमें हजारों की जानें चली जाती है। जीव जन्तुओं को बचने का भी कोई ठिकाना नहीं रहता है । जैसे – तैसे तवाह होकर वो भी सारे मारे गये। कोई उनका ठिकाना शेष न रहा । चारो तरफ कोहराम सा मच गया । जान – माल की भारी क्षति हुई। पुरखों का बना बनाया रविशंकर का अखाड़ा हिमालय के टूटकर ढहने से ढ़क गया । हिमालय चौड़ा हो गया । शिखर के कुछ भाग उसके टूटे और धरती में समा गये। मानो जैसे सैकड़ो बादल एक साथ फट गये हों।बर्फ का अम्बार सा दृश्य बन कर रह गया। पहले हिमालय की ऊंचाई आज की ऊंचाई से डेढ़ गूनी अधिक बताई जाती है। तब रविशंकर बर्फ के दलदल में खुद भी फंस कर रह गया था। चार दिन पूरी कोशिश के बाद भी वह इस वर्क रूपी दलदल से बाहर नहीं निकल पाया । उनकी हिम्मत उसे जवाब देती नजर आने लगी , पर उसकी कोशिश जारी रही। वह अपने आप से हार नहीं माना। आखिरकार उसे सफलता मिल ही गई।वह बहुत खुश था। उसने मौत को मात देकर अपने आप को बचाया था। तब हिमालय की गोद से निकलने वाली गंगा मैया उसे साक्षात दर्शन भी दे दी थी। गंगा मैया खुश होकर रविशंकर को वर मांगने को कहा था । उस समय रवि शंकर इस आश्चर्य को देख कर दंग सा रह गया था। प्रज्वलित मुख मंडल वाली इस देवी का दर्शन पाकर वह धन्य हो गया। उनके चरण में वह दंडवत कर देवी के सामने नत मस्तक हो गया। वर में उसने आजीवन जिंदा रहने की इच्छा जाहिर कर दी। इस तरह रविशंकर को आजीवन जिंदा रहने का गंगा मैया से वरदान भी प्राप्त हो गया , पर गंगा मैया उसकी मौत एक सांप काटने से बता दिया। इस तरह का वरदान पाकर वह बहुत खुश था । एक क्षण के लिए रविशंकर घबराया फिर उसने सांप से कोसों दूर रहने को भी सोच ली। वरदान पाकर रविशंकर बाग – बाग तो हुआ ही उसकी आंखें सिर पर हो गई।अब उसे न तो आग से डर था ना पानी से, ना भूचाल से और ना ही उसे तूफ़ानों से ही डर लगता था। बस उसे डर थी तो एक मामूली सांप से, जो उसे डंसकर मौत की सय्या पर लाकर सदा के लिए गहरी नींद में सुला सकता था।पहले तो रविशंकर इंसानियत के तौर-तरीके पर ही चलता रहा, पर जबसे उसे वरदान प्राप्त हुआ ,वह किसी को कुछ भी समझने से इन्कार करने लगा। वह काल रूपी विकराल दानव जैसा खूंखार बन गया। उसके आचरण और व्यवहार एकाएक बदलते चले गये। रावण के जैसा अत्याचारी बनकर आतंक भी फैलाने लगा। यहां तक कि बड़े-बड़े राक्षस उससे पनाह मांगने लगे।वह जिघर भी जाता उस इलाके में दहशत ही फैल जाती। लोग उससे थर-थर कांपने लगते। यह भी कहा जाता है कि एक बार वह घूमते – घूमते भुतहिया जंगल भी पहुँच गया था। यह जंगल आज झारखंड के हजारीबाग जिले के इर्द – गिर्द बताया जाता है । उस समय उस घनघोर जंगल में दो भयंकर शक्तिशाली राक्षस निवास करते थे ।पहले तो वे राक्षसराज रवि शंकर पर टूट से पड़े , पर जब रविशंकर का हाथ उन दो राक्षसों पर पड़ा तो उनकी नानी याद आ गई। आज तलक किसी से न डरने वाला राक्षसराज कुछ समय के लिए भयभीत होकर सोच में डूब गये। राक्षस उसकी शक्ति देख भाग खड़े हुए। रविशंकर उसे खदेड़कर पारसनाथ के पहाड़ तक ले गया। उस दौरान दोनों राक्षस दौड़ते-दौड़ते बुरी तरह से थक कर चूर हो गये थे , तभी रविशंकर ने उसे दबोच डाला। इस तरह रविशंकर को उन राक्षसों का संहार करने में बड़ा मजा आया , लेकिन दक्षिण भारत में एक मायावी राक्षस ने उसके छक्के छुड़ा दिए। हुआ यूँ कि वह राक्षस रविशंकर से पराजित होने का नाम ही नहीं ले रहा था। महीनों तक दोनों की जंग इसी तरह से चलती रही। घनघोर जंगल में वह राक्षस कभी भैंसा का रूप तो कभी गीद्ध का रूप धारण कर लेता। इस दौरान राक्षस अपना वेष बदलकर अलग अलग तरीके से रविशंकर पर आक्रमण करता रहा । कभी वह सामने आ जाता तो कभी दूर बहुत दूर। इस तरह रविशंकर काफी परेशान सा हो गया था। कभी वह माथे पर हवा-हवाई बनकर मंडराने लगता, तो कभी अपनी नुकीली लम्बी चोंच से उसे घायल करके दूर भाग जाता। फिर भी रविशंकर को उस से थोड़ा भी डर न था। अंत में राक्षस ने रविशंकर से परेशान होकर शरण ले ही लिया। अब जब रविशंकर को अपना शिकार खोजते नहीं मिलता था तो वह भूखे शेर की तरह लोगों पर दहाड़ने लगा और इस तरह उसकी आतंक फैलता चला गया। लोग उससे काफी परेशान से हो गए थे । अब तो वह राह चलते जिसको – तिसको पकड़ कर दबोचने भी लगा था। उन दिनों लोग भगवान शंकर की पूजा उपासना करते थे। उन सबकी पूजा भक्ति से शंकर भगवान की नींद खुल गई। वे देखे कि मृत्युलोक में तो बड़ा अनर्थ हो रहा है। अगर रविशंकर को संहार न किया गया तो अनर्थ हो जाएगा। इस तरह से तो एक दिन सारी सृष्टि ही नाश हो जाएगी। नारदजी को सारी बातें पूर्व से ही सर्व विदित थी। तभी नारदजी भागवान शंकर के पास आए और नारायण – नारायण की आवाज के साथ बातचीत शुरू करने लगे । देवताओं की सभा बुलाई गई पर किसी को पता ना चला कि वह कैसे मारा जाएगा। तभी उस सभा के बीच गंगा मैया आ गई और ब्रह्मा विष्णु महेश क हाथ जोड़कर सादर प्रणाम की। गंगा मैया बताने लगी…. रविशंकर ने अगले जन्म में मेरी कठोर तपस्या की थी, पर उस अगले जन्म में मैं उसे दर्शन न दे सकी थी । इस बार मैंने उसे दर्शन दिया तब वह कठोर संकट से मुक्त हो गया था। मैंने उसे वर मांगने को कहा….. मैंने बरदान मे उसे आजीवन जिंदा रहने को कह दिया पर वह तो अब आतंक फैला कर रख दिया है। मैंने इसकी मौत एक साधारण सांप काटने से बताया है।वह सांप से डरता है। उसकी मौत उसी से होगी। मैंने उससे वरदान में यह भी कहा था । आश्चर्य से सभी की आँखे फैल कर रह गई। ब्रम्हा – विष्णु – महेश सारे देवता गण हैरान से रह गये। उनलोगों को लगा जैसे कोई हल मिल गया हो। तभी विष्णु जी ने शंकर जी को अपना काला नाग छोडने का आग्रह कर दिया। यह प्रस्ताव सारे देवताओं को अच्छा भी लगा था। भगवान शंकर के गले में निवास करने वाला वह काला नाग उनके गले का शौर्य बढ़ाने वाला एक आभूषण था। सब के अनुनय – विनय पर भगवान शंकर को काला नाग कुछ समय के लिए अपने गले से छोड़ना पड़ा।उस दिन रविशंकर दूध का मटका अपने मुँह में लगाये घटर-घटर दूध पीने में मग्न था। एकाएक जब उसने सांप को अपनी तरफ आते देखा, तो उसकी जान ही सूख गयी। इस तरह सांप को अपनी तरफ आते देख, उसके पाँव जमीन से उखड़ गये। आँखों तले अंधेरा छाने लगा, तारों के समूह झिलमिलाते से नजर आने लगे। तब वह भागता गयाऔर काला नाग उसे खदेड़ता गया । वह बचने की पूरी कोशिश करता रहा । पीछे मुड़ मुड़कर देखता और अपनी मौत नजदीक देखकर घबरा भी जाता। बे मौत मारा जाऊगाँ। गंगा मैया हमें ठीक ही बता कर गयी है। अगर यह काला नाग मेरे पास आया तो वह सचमुच मुझे डंस लेगा और मेरी मौत हो जायेगी। एक साथ कई प्रश्न उसके माथे में धूमकर रह गया। उसके दिलोदिमाग में कई प्रश्न एक साथ घर कर रहा था। एकाएक उसका मस्तिष्क एक ही झटके में किसी रिंग की भाँति घूम गया । वह चक्कर खाकर गिरता उससे पहले काला नाग उसे डंस कर वापस जाने लगा ।रविशंकर पल भर में ही कराहते हुए जमीन पर धड़ाम से गिर गया, और सदा के लिए मौत की नींद सो गया। काला नाग वापस जा भगवान शंकर के गले में विराजमान हो गया। सारे देवताओं ने मिलकर खुशियाँ मनाई। लोग यह देख – सूनकर खुशियों से झूम उठे और आपस में मिलकर जश्न मनाए। मन में बैठा हुआ खौफ कोसों दूर भाग गया। सब लोग खुशी – खुशी रहने लगे।सब कुछ पहले जैसा हो गया। कभी कभार बीच – बीच में उसकी चर्चा किसी की मुँह से निकल ही आती, पर डर बिलकुल ही न था। इस तरह रविशंकर का अंहकार ही उसे मात देकर चला गया था ।बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु[2/12, 22:31] Bindeshwar Prasad Sharma: अजीत बाबू दूर-दूर में आसपास के सभी गांवों में कृपापुर का नाम कौन नहीं जानता। इस गाँव की गिनती हिटलिस्ट के नामों में सबसे पहले याद किया जाता रहा है। यहां के ठाकुर अभय सिंह को कौन नहीं पहचानता ।यदिइनके नामों से कृपापुर के सभी लोग डरे – डरे से रहते हैं । इनके पूरे खानदान के आगे लोग अपना सिर झुकाने में तनिक भी कोताही नहीं बरतते। इन्हें देखते ही लोग भीगी बिल्ली की तरह एक कोने में दुबक जाते। इनके एक इशारे पर पुलिस की पूरी चौकी उठकर आ जाती। चौड़ा सीना , गोल मटोल सुंदर चेहरा, गोरा लंबा बदन, चेहरे पर लंबी ऊपर उठी हुई कानपुरी मूछें किसी को डराने के लिए काफी था । लंबा कुर्ता और ब्रेसलेट की धोती उनके ऊपर खूब सजती थी। माथे पर रेशम की बड़ी सी खूबसूरत रंगीन पगड़ी, पैर में नागराज जूते, क्या बात थी उनकी। ठाकुर अभय सिंह जी का एक छोटा परिवार था। परिवार में ठाकुर अभय सिंह के साथ उनकी पत्नी शारदा और प्यारे – प्यारे दो सुंदर लाडले अजीत और पुष्पा बड़ी शानो शौकत से हवेली में रहते थे । वैसे अजीत भी अपने बाप की तरह टेढ़ी उंगली दिखा कर ही अपना उल्लू सीधा करने में कहीं कसर नहीं छोड़ता। इसमें अजीत बाबू अपनी इज्जत और बहादुरी ही समझते । इस बहादुरी और इज्जत के चलते आस-पास के गांवों में उनकी तूती बोलती। इनके आगे सब लोग दूध की मक्खी या फिर चरणों के धूल के बराबर थे। लोगों में किसी को साहस नहीं होता कि उनके आंँखों में आंँखें डाल कर बातें कर सकें। अजीत बाबू खुद अपने बाप की तरह अंग्रेजी हुकूमत चलाने वाला एक शासक जैसा था। बादशाहो की ठाठ-बाठ में रहने वाला अजीत अब 18 वर्ष का हो चुका था। हल्की-फुल्की मूछों के रेख भी बाहर दिखने से लगे थे। हजारों एकड़ जमीन रखने वाला ठाकुर अभय सिंह अपने आप में मस्त मौला ज़मींदार था। ना तो उसे किसी से डर थी और ना ही किसी से कोई परेशानी।खिचड़ी के साथ घी अचार खाना उनका पसंदीदा भोजन था। लिट्टी – चोखा भी उन्हें खूब पसंद थी। गांव में इनकी हवेली गुदड़ी में लाल जैसी ही थी । इनकी गगनचुंबी शानदार संगमरमर की सुंदर हवेली दिल्ली के लाल किले से थोड़ी भी कम ना थी। सफेद कपड़ो में सुसज्जित होकर अजीत बाबू हवेली से निकलकर शहर जाने के लिए तैयार हवेली से बाहर निकलकर आवाज़ लगाते हैं। बबलू….. कहां गइले रे…… अरे बबलू.. आ। बबलू उन्हीं के बगल में पीछे खड़ा था। अरे तनी.. बोलाव तो कुशेशरा के….. ससुरा कहाँ है। अबहीं तुरंत मालिक…. । बबलू दौड़ा – दौड़ा गया और उसे बुलाकर ले आया। का रे..यदि कुशेशरा… कहां रहता है तू….. लउकता नहीं है… का.. कहाँ रहता है । कुशेशर धीमी आवाज में बताता है… यहीं हैं… मालिक…. आप के हुकुम.. का आदेश…. आपके आदेश बिना हम… कहाँ जाएंगे मालिक। अच्छा सुन… हमरे शेरा सुरजीत के ईहां ले आवऽ। अभी आईनी मालिक और चंद ही मिनटों में वह उसे अपने मालिक के पास ले आता है। हाँ… चल रे.. सुरजीत… अरे भई… जरा जल्दी चल…. ले चलऽ मेला में। अजीत बाबू के लगाम खींचते ही घोड़ा दौड़ने लगा। कच्ची सड़क पार करते उसे थोड़ी भी देर न लगी थी।मेला पास में ही लगा था। सुरजीत को वहां पहुंचने में देर न लगी। वह हर वर्ष की भांति शिवरात्रि का मेला देखने शिवजी के प्रांगण में पहुँच जाता था। मेले में काफी भीड़ व खूब चहल पहल दिख रही थी। बाबा भोले का विशाल मंदिर उन दिनों देखते ही बनता था। जलाभिषेक करने वालों की लंबी कतार देखकर अजीत बाबू बहुत – बहुत खुश हुए थे। आसपास के करीब सभी गांव वाले इस मेले में दर्शन को आते थे । यह मंदिर ठाकुर अभय सिंह के दादाजी जी के द्वारा बनवाया गया था, जिसकी देख – रेख कि पूरी जिम्मेदारी अब बड़े ठाकुर अभय सिंह के पास था। छोटे बाबू यानी अजीत मेले में प्रवेश ले चुके थे। मेले के लोग इन्हें देख कर आश्चर्य से इधर उधर छिटक रहे थे। आसपास उसने कई चक्कर लगाए पर एक जगह उनकी नज़र ठहर गई। वह घोड़े से उतर कर उस ओर देखते रहे। एक सुंदर बाला (युवती) बाबा भोले को उस वक्त श्रद्धा पूर्वक अक्षत चढ़ा रही थी। देखने पर ऐसा लग रहा था जैसे वह भक्ति में पूरी तरह से लीन होकर रह गई है । फिर युवती ने अपने दोनों हाथ पीछे की ओर करके सिर बाबा भोले के सामने टिका टिका दी थी। छोटे बाबू यह देख कर मुस्कुराए और फिर उसे देखते ही रह गए। आसपास के लोग इन्हें देख कर इधर – उधर होने लगे। उसे देख छोटे बाबू के मन में कुछ प्यार का आभास सा होने लगा था। वह युवती उन्हें खूब पसंद आ गयी थी। उनका मन कह रहा था अभी तुरंत उसका हाथ पकड़ लें और कहें कि मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं, लेकिन यह विचार उन्हें पसंद नहीं आया। जब वह युवती पूजा-पाठ से फुर्सत पा होकर मुड़ी तो सामने अपने ही गांव के छोटे ठाकुर को देखकर चौक सी गई। जैसे लगा कोई करंट उसके शरीर को छूकर एक झटका सा दे गया हो। सहमकर फिर वह अपनी आंखें झुका ली। छोटे बाबू अपना घोड़ा हंँसते हुए दूसरी तरफ कर लिए। छोटे ठाकुर गये तो थे मेला घूमने और खा गए प्यार में चक्कर। पड़ गए उसके पीछे। अपनी सहेलियों के संग मेला घूमकर जब वह घर लौट रही थी तो रास्ते में ही अजीत बाबू उसे टेक लिए। साथ की सभी सहेलियां डर कर ठिठक सी गई। सर से लेकर पांव तक जैसे कोई बिजली सी कौंध कर रह गई। छोटे बाबू कातिल नजरों से उसे देखते रहे। कुछ बुदबुदाये….. अरे दिल जानिया…. हेने आवऽ । वह डरी – डरी सी अपनी नज़र ऊपर की ओर उठाई और फिर तुरंत नीचे कर ली । तब छोटे बाबू फिर से बोल उठे थे … डर गईलू का हो…. तत्पश्चात वह घोड़े की लगाम छोड़कर उन सबों के बीच पहुँच गये। घोड़ा वहीं ठिठककर खड़ा हो गया था। …. कहां जइबू हो….. बहुत धीरे से वह युवती छोटे बाबू अजीत से बोल पाई थी…. कृपा पुर….? अरे ऊ तो….. हमारे गांँव है….. ऊहे गाँव में हम रहेनी बाबू….. अरे.. त.. तुम लोगन कुछ काहे नाहीं बोलत बाड़ू… का बात बा… डर के पानी – पानी काहे हो गईलू। इतना बोलते ही अजीत बाबू उस युवती की हाथ पकड़ लिए। का नाम बा… तनी मुंह तऽ खोलऽ…. क.. क.. कमला। कमला अजीत बाबू को अपना नाम बता कर रुक गई थी। अजीत बाबू का दिल भर आया था। कमाल के नाम बतवलू… तोहरे नाम के जबाब हमारे पास नइखे.. बहुत प्यारा नाम बा..। अच्छा हम जात बानी कमला… फिर जल्दी मिलब। अजीत बाबू घोड़े पर सवार हुए और तुरंत हवेली में। अरे बबलुआ… तनी पकड़ऽ हमार शेरा सुरजीत के… और हाँ… तनी बढ़िया से हमार सुरजीत के… सेवा – पानी करऽ। अजीत बाबू तेज कदमों से हवेली में प्रवेश कर गये। अरे बेटा आ गईलऽ…. तू…. ।हाँ माई, आ गईनी…. । कईसन मेला रहे….? मजा आईल कि नाहीं…। हाँं माई….. बहुत मन लागल….. बड़ा अच्छा रहे आज के दिन …. खूब बढ़िया…. रहे। तऽ हमार पुष्पा के काहे ना ले गईलऽ…? उहो मेला घूमे के कहत रही…. ।इतने में वहाँ पुष्पा भी आ जाती है । हाँ माई…. देखऽ नऽ…. केतना बढ़िया मेला रहे…. लेकिन भैया हमके ना ले गईलें…. अब हम भैया से ना बोलब… । छोटे बाबू…. अरे पगली… अचानक से अदना बात के खातिर…. हमरा से ना बोलबू… ठीक बा…. बहुत गोसा गईलू का….. देखले नऽ माई…. भैया के गोस्सा…. सातवें आकाश पर बा…. तभी माँ बोल पड़ी.. मुंह लगावे खूब आ गईल बऽ भैया के…. पुष्पा – ठीक बा माई… हम भैया से नाहीं बोलब। पुष्पा तुनककर अपने कमरे में चली गई । माँ – देखले नऽ… अब के मनाई पुष्पा के…. ।माँ बोलकर चश्मा हिलाती हुई पुष्पा के पीछे – पीछे चल गई। सभी जूस से भरा गिलास बबलू लाकर अपने छोटे बाबू को दिया। छोटे बाबू हाथ में गिलास लेकर जूस को एक ही झटके में गटक गये। जूस का खाली गिलास लेकर बबलू किचन की ओर बढ़ता चला गया। तभी फिर से उसकी मांँ अपने बेटे के पास आ बोली- बेटा दूर से आया है… कुछ आराम कर ले… आराम कुर्सी पर कितना देर बैठेगा…. तुम्हारी कमर टेढ़ी हो जाएगी। अजीत बाबू कुर्सी छोड़ अपने कमरे में चले गए । छोटे बाबू का ख्याल कमला के प्रति बढ़ता ही चला जा रहा था। उसके मन में अनेकों तरह के विचार रौंद कर रह जाते। थोड़ी देर बाद बबलू आकर उनसे खाना खाने के लिए आग्रह करने लगे। खाना खाने के बाद छोटे बाबू फिर से अपने कमरे में चले गए। आधे घंटे बाद अजीत बाबू का मन गणेश को बुलाने का होता है और तभी वह बबलू को आवाज लगा देते हैं। बबलू दौड़ा – दौड़ा उनके पास हाजिर हुआ, बोला का मालिक.. का आदेश बा…. अरे रामधन के बगल में गणेशवा रहता है नऽ… हाँ मालिक…. ओकरा के बोलाके ले आवऽ… कहना छोटे मालिक तुझे याद किए हैं।गणेश आता है पैर छूकर प्रणाम करता है। अरे गणेश… हां सरकार…. हेने आवऽ… बैठ जा….डरा – डरा सा गणेश जमीन पर बैठ गया। नऽ जाने कौन सी बात थी। वह उहा – पोह में और ज्यादा सोच नहीं पाया था। किन्तु छोटे बाबू के कुछ बात से पता चला कि उसे डरने की कोई बात नहीं। अच्छा तो कमला के तू जाने ले… हाँ सरकार… ऊ तऽ रामलगन सिंह के बड़की बेटी बाड़ी। बड़ा सुंदर… भोली – भाली… इंद्रासन के परी जैसी …। छोटे बाबू – बस करऽ.. बुझ गइनी। अब बतावऽ कि अपने गांव के कौना ओरी ओकर घर बा। घर छोड़ दी सरकार… ऊ तऽ रोज हवेलिये होके आपन खेत जाली… बोली तऽ बहाना मार के ले आईं हवेली में… ना रे ना… हवेली में ना। हम ओनिए जाके मुलाकात कर लेब। हाँ.. सुनऽ जब ऊ आपन खेत जाए…? तो हमारा बता दिहऽ। खबर जरूर पहुंँचे के चाहीं। दूसरे दिन ऐसा ही हुआ गणेश बताया और अजीत बाबू खेत जा रही कमला को बीच में ही ओवर टेक कर लिए। छोटे बाबू – का रे परान के फोंफी ….. रसमलाई के रस… मुअईबू का हमारा के। कमला सुन सकपकाती हुई बीच रास्ते में ही रुक गई । आज यह उसकी दूसरी मुलाकात थी। उसे डर था कि कहीं कुछ अनहोनी ना हो जाए। वह तो चिल्ला भी नहीं सकती थी। छोटे बाबू के आगे वह कर भी क्या सकती थी। बेबस होकर वह चुपचाप खड़ी थी। छोटे बाबू अपनी धुन में न जाने क्या क्या बोले जा रहे थे। कमला के आंँखे देख छोटे बाबू घायल से हो गए। उसकी अदा पर वे लड्डू बन गए थे। इस तरह के रोज-रोज के मुलाकात ने कमला के हृदय में भी प्यार जगा दिया था। धीरे-धीरे दोनों के बीच प्यार बढ़ता चला गया। कमला अपने माता-पिता और छोटे भाई के साथ रहा करती थी। कमला के पिता उसे घर पर ही शिक्षा देते थे। क्योंकि उसके पिता खुद ही एक अच्छे अध्यापक थे। कमला के पिता रामलगन सिंह अपने पद से रिटायर हो चुके थे। अब वे अपने खेतों में ही किसानी करने में मस्त थे। अच्छी फसल उगाकर अपने परिवार का भरण पोषण करते थे। अपना उनका छोटा सा परिवार सुखी परिवार के जैसा था। जब कमला छोटे बाबू को जान से भी ज्यादा चाहने लगी तो वह इस कसमकस में खोई – खोई सी रहने लगी। उनके बगैर एक पल भी रहना कमला को भारी पड़ने लगा। इस तरह अजीत बाबू से मुलाकात होती। बहुत देर प्यार की बातें हौती। उनके प्यार की लंबी टहनी मन के आंगन में फैलती चली गई। दिलो-दिमाग में प्रेम का पौधा उग आया, जिसमें प्यार के फूल खिलने से लगे। एक दिन अजीत बाबू अपने दूर के बगीचे में कमला को आने का आदेश दिए। कमला समय पर आ गई लेकिन वहाँ उसे कोई दिखाई नहीं दिया। अकेली कमला बोर होती जा रही थी। कुछ डर सा भी लगने लगा था, पर प्यार के आगे यह सब कुछ कम ही था। इधर चुपके – चुपके से आकर अजीत बाबू पीछे से उसकी आंँखें मूंँद दिये। कमला सकपका गई पर अजीत बाबू उसे और डराना नहीं चाहते थे। तत्पश्चात अपने हथेली को हटाते हुए अजीत बाबू उसके सामने आ गये। कमला अपने छोटे बाबू अजीत को देखकर उसके गले लग गई । अब कमला को छोटे बाबू पर विश्वास जमने में कोई कमी ना दिखती है। छोटे बाबू भी कमला के गले लग कर अपना प्यार जताते रहे। चंद मिनटों के बाद वे एक दूसरे से अलग हो गये । कितने देर कर दिए अजीत बाबू…. मैं तो डर ही गई थी…. अरे पगली डरने की क्या बात है…. यही तो प्यार है…. । कमला – हमरे त परान ही सुखल जात रहे।[2/13, 20:59] Bindeshwar Prasad Sharma: छोटे बाबू – प्राण के बात कहत हऊ कमला ।तोहार प्राण के आगे केकर प्राण भारी भईल बा। तनी बतावा. तऽ… ओकरे प्राण..निकाल के तोहरे चरण में अबहीं लाके डाल देब। कमला हंँसते हुए बोली – अच्छा छोड़ऽ… ईन सब बातन के। चलऽ दूसरी ओर पीपल के पेड़ के नीचे बइठल जाई। ईहांँ मन नाहीं लगता बा। दोनों वहाँ से चलकर उस पीपल के छाँव के नीचे आ गये। नीचे जमीन पर सुंदर-सुंदर हरे घास उन दोनों के मन को मोह रहे थे। चारों तरफ हरियाली, फूल के बागान और फूल की खुशबू के साथ मिट्टी की सोंधी महक माहौल को और रंगीन बना रहा था। दोनों ही उस हरी मखमली घास पर बैठ जाते हैं। कमला की जांँघ पर अजीत बाबू अपना सिर रखे हुए बोले – अरे कौनो गाना – वाना… नाहीं आवेला का… तनी एगो गाना गा के सुनावऽ। कमला – अरे हम कवनो… जादा पढ़ल – लिखल थोड़े बानी… कि हमारा गाना गावे आई। गाना तो… अपने जइसन पढ़ल – लिखल लोग गावेला… ।अजीत बाबू मुस्कुरा दिए। अच्छा ठीक बा गाना हमहीं शुरु करऽ तानी। बीच-बीच में साथ देवे के होई। गाना शुरू हो गया। दोनों मिलकर गाना गाए खूब मजा आया। शाम हो गई थी, फिर वह दोनों अपने – अपने घर आ गए। कमला के आंँखों से रात की नींद अब गायब सी होती जा रही थी। वह रात – रात भर जागकर सवेरा करती थी। बहुत तरह के ख्वाब कमला के मन में उथल – पुथल हो रहे थे। सोच रही थी कि कहीं अजीत बाबू धोखा तो नहीं देंगे, लेकिन वादा हैं। मैं बेवकूफ हूँ जो इस तरह की बातें मन में लाकर सोच रही हूँ। वैसे इस समय उल्टा-पुल्टा सोचना कमला को अच्छा न लगा था।दादी जी हमें इस तरह प्यार के अनेक किस्से हमें सुनाये थे । उसने प्यार के बारे में बताया था कि बड़े लोगों का प्यार करना अपना उल्लू सीधा करने के बराबर है। उनका प्यार करना एक छलावा, शौक या फिर नौटंकी है। पता नहीं कमला ये सब क्यों सोच रही है। क्या मेरे साथ भी यही होगा। बिल्कुल नहीं, यह सच नहीं हो सकता। नहीं सकता। कमला विचार करती हुई अजीत बाबू के बारे में सोचने लगती। अजीत बाबू जैसे इस दुनिया में कहाँ मिलेंगे। वह तो हमें जी जान से भी ज्यादा चाहते हैं, फिर वह इस तरह की बातें उनके बारे में क्यों सोच रही है। समझ में कुछ नहीं आ रहा था । सुबह होते ही नहा – धोकर कमला पूजा की थाल सजाकर मंदिर चली गई। डाली में फूल और थाली में रोली चंदन के साथ मंदिर में भगवान की पूजा करने लगी। पूजा के बाद आरती मंगल और फिर भजन – गीत, माहौल को सुंदर बना देता है । ये सब कर कमला वापस अपने घर आ गई । माँ देखे ही कमला को बोली – अरे कमला… पूजा करके आ गईलू का.., हांँ माई… मंदिर से आ गईनी। आज पूर्णिमा रहे नऽ.. जल्दी निंदियो खुल गईल, सोचनी जल्दी-जल्दी पूजा के काम खतम कर लीं। माई – बहुत नीक कईलू। अच्छा सुनऽ….. बबुआ खातिर नाश्ता बनावे के बा। आज इनकर परीक्षा बा….. तनी जल्दी करा कमला… । हाँ माई…. एही से नऽ मंदिर से जल्दी आ गईनी। मंदिर के पंडित जी.. एगो अऊर भजन सुनावे के कहत रहन, लेकिन बबुआ के… परीक्षा वाली बात कहनी तऽ… आवे के इजाजत दे दिहलन। युग – युग जीयत रहऽ बिटिया… भगवान करे… अइसन बिटिया सबके रहे। कमला थाली लेकर छोटे भाई के पास गई। भाई को चंदन का तिलक लगाकर पेड़े का प्रसाद दी। कमला का भाई किशोर प्रसाद खाकर फिर पढ़ने में लीन हो गया। फिर कमला अपनी मांँ – पिता को प्रसाद देकर पैर छुई और उनसे आशीर्वाद पायी। फिर वह रसोई घर में चली गई।छोटे बाबू अजीत और कमला के प्यार का चर्चा अब पूरे गांव में चल रही थी। इस बात को अब कमला के माता पिता जी भी जान गए थे। प्यार के इस खेल में कमला से अनहोनी भी हो गई । छोटे बाबू अजीत भी इस बात को जान जान गये थे। लेकिन उनको क्या था? कमला परेशान हो रही थी। मन में अनेक तरह के ख्याल आ – जा रहे थे। भावनाओं में बहकर उसने इस तरह की गलती की थी। उसने तो इस मोहब्बत को अटूट ही समझी थी। यह रिश्ता कोई खेल तमाशा नहीं था। उसे पूरा विश्वास था कि छोटे बाबू हमें जरूर अपनाएंगे । बड़े ठाकुर बोले …. का बात बा रामलगन.. बड़ा परेशान लागत बाड़ऽ… कोई खास बात बा का… कुछ पैसा – वैसा के काम.. आ गईल का। रामलगन – नाहीं सरकार। तब और का बात बा… खुल के बतावऽ। रामलगन की परेशानियां बढ़ती ही जा रही थी।वे ठाकुर से अपनी बात बताने में संकोच कर रहे थे और डर भी रहे थे। ठाकुर के इस तरह बार-बार पूछने पर उसने साहस जुटा कर बोल ही दिया। रामलगन – हम आपके… छोटे बाबू के हाथ मांगे आईल बानी। छोटे बाबू… हमार कमला से…बहुत प्यार करेलन। यह सुनते ही ठाकुर अभय सिंह आग बबुला हो गये। उनका खून खौल गया, उनकी आँखे खून की तरह लाल सी हो गई और वे बोल उठे – ई बात कहे के तहार हिम्मत कैसे भईल…. रामलगन कान खोल के सुन लऽ…. ई रिश्ता कबो ना हो सकेला…. हमरे नज़र से अबहीं दूर हो जा… नाहीं तऽ हमरा… किसनवां के बोलाबे के होई। रामलगन को ऐसा लगा जैसे उसके ऊपर घड़ों पानी एक साथ पड़ गया हो। तभी वे ठाकुर के पैरों पर गिर कर गिड़गिड़ाने से लगे। हमारे इज्जत बस आपके हाथ है सरकार… वगैरह-वगैरह… पर ठाकुर ने एक न सुनीे। उन्हें प्रताड़ित करते हुए वे अनाप – सनाप बोले जा रहे थे। एक झोपड़ी के रिश्ता महल से…. दूर हो जा…….. धरती कभी आकाश में जाए के सपना… कबो ना देखेले…… और तू ऐसन सपना देखके हवेली में आ गईला। ई बात मालूम रहत तऽ… हम तहरा हवेली में आवे के इजाजत ही ना देतीं। छोट – मोट बात ठाकुरन से होत रहेला। जवान लईका बा एने – ओने मुंँह मरबे करी। ई सब कवन बड़ी बात बा। अरे किशनवां पकड़ के निकाल तऽ बाहर। साले रिश्ता तय करे आईल हवें। किशन पकड़कर रामलगन को बाहर निकाल दिया । खींचातानी में रामलगन की कमीज फट गई और दरवाजे में ठोकर लग कर सिर फट गया। खून बहने लगा। मायूस होकर किसी तरह रामलगन अपने घर गये। उनकी पत्नी उनके इस हाल और व्यथा को देखकर चौक गई। वह भीतर ही भीतर जैसे काँंप कर रह गई। धड़कन तेज हो गई । उसे कुछ भी समझ नहीं आया कि यह सब क्या हो गया। इधर कमला को भी छोटे बाबू अंधेरे में डाल दिए। ऐन मौके पर वह बदलते से नजर आए। छोटे बाबू कमला को स्वीकारने के लिए किसी भी हालत में तैयार नहीं हुए। बदले में अनगिनत अटपटे बातें भी सुना गये। क्रोधाभाव और ग्लानि के बीच रामलगन का शरीर लाल लोहे की तरह तपने लगा। उन्हें अब कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। सोचने लगे होनी को कौन टालता। सारे गांव में खलबली सी मच गई है। उनकी पगड़ी मानो तार तार होकर कीचड़ से सन गयी थी। वे नहीं जानते थे कि ठाकुर अभय सिंह इतना शैतान होगा। जो लोग इन्हें इंसान समझते थे वे नहीं जानते थे कि वह इतना पाखंडी और गिरगिट की तरह रंग बदलने वाला आदमी है। जिस्म के सौदागर केवल अपना उल्लू सीधा करना जानता है। उसके लिए प्यार का नाटक बस दिखावा होता है, फिर तो दूध की मक्खी की तरह बाहर निकाल उसे फेंक ही देते हैं। यहाँ मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं की बात वाली कहावत चरितार्थ होती है। यह सब जानते हुए मेरी बिटिया से भूल हो गई। दूसरे ही दिन छोटे बाबू अजीत से रामलगन की मुलाकात हुई। बात-बात के दौरान रे रे – तू तू – मैं मैं हो गई। रामलगन के हृदय में जल रही अग्नि की ज्वाला भड़क उठी और वे एक बड़ा सा पत्थर उठाकर उसके सिर पर दे मारे। छोटे बाबू अजीत वही लड़खड़ा कर गिर गये। खून का ढेर लग लग गया और घटनास्थल पर ही उनकी मृत्यु हो गई । यह सब देखकर रामलगन हक्का-बक्का भाग खड़े हुये और जाकर सीधे घर में ही दम लेने लगे । इस तरह रामलगन को घबराया सा से देखकर सब का हृदय कांप उठा। रामलगन जब सारी बातें अपनी पत्नी शकुंतला को बताये तो वह दंग रह गई। यह तो अनर्थ हो गया। रामलगन जल्दी ही कहीं दूर निकल जाने की सोच अपने पूरे परिवार को साथ लेकर रफूचक्कर हो गए। इधर गांव में हड़कंप सा मच गया । पुलिस तथा ठाकुर के लोग छानबीन करने में जुट गये लेकिन उन लोगों का कुछ भी अता पता न चला। वे सब कहां गए किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। बड़े ठाकुर का दिलो – मिजाज अस बस में पड कर रह गया था । उधर रामलगन अपने परिवार के साथ एक घनघोर जंगल से होते हुए आगे की ओर बढ़ते चले जा रहे थे। रात होती जा रही थी। इन रास्तों में उन्हें खूब डर भी लग रहा था। सोच रहे थे कहीं आफत में और दूसरी आफत गले न पड़ जाए। आखिर वही हुआ, डकैतों ने उन्हें बीच रास्ते में ही घेर लिया। रामलगन अपनी आप बीती सारी कहानी उनके सामने रख दी। डकैतों के सरदार बहुत दयालु थे। उनकी बात सुनकर उन्हें बहुत दुख हुआ और उन सब पर तरस आ गया । रामलगन तो डर ही गए थे लेकिन भगवान ने इनकी इज्जत प्रतिष्ठा बचा ली। चमत्कार ही हो गया, डकैतों के सरदार अजब सिंह अपने साथियों से कुछ रुपया मंगवाकर रामधन के हाथों में डाल दिए इसलिए की रामलगन एक शिक्षक थे। सरदार को शिक्षक से बड़ा प्यार था क्योंकि उनके पिता खुद ही एक शिक्षक थे, जिसे ठाकुर अभय सिंह के पिता बद्री सिंह ने मरवा डाला था। उसने भी उन्हें मारने की ठान ली थी और डकैत बन कर उन्हें मार भी डाला। डकैत के सरदार और उनके साथी ने उन लोगों को शहर के किनारे तक छोड़ आए। दिन का समय था, अब वे शहर में आ गये थे। किराए की एक मकान लेकर उसमें रहने लगे। बात विचार और इनके परिवार से प्रभावित हो आसपास के लोग इनसे जल्दी ही घुल – मिल गए। इनका रीति – रिवाज उन सबका मन मोह लिया था। पर कमला और उसके परिवार के लोगों में डर अभी भी व्याप्त था। छोटे बाबू अजीत का मर जाना एक चिंता का विषय था ।कमला का भाई किशोर सातवें वर्ग का एक अच्छा विद्यार्थी था। कमला तो अभी – अभी इंटर पास की थी। नई उलझन से परिवार के सभी लोग चिंतित थे। कमला दिन भर उदास उखड़ी-उखड़ी सी रहती थी। ऐसा लग रहा था जैसे वह बिन ब्याही एक विधवा बन गयी हो। दूसरी और कमला को संतोष था कि उसके पेट में पल रहा बच्चा पाप की नहीं प्यार की एक निशानी है। उसने अपनी मर्जी से प्यार को सच्चा समझकर ऐसा किया था। यह उसकी भूल थी या नासमझी उसे पता नहीं। चाहनेवाला कितना भी नीच, जलील, शैतान क्यों न हो पर एक नारी के लिए प्रेम प्रिय साक्षात देवता का ही एक सच्चा रूप होता है। उसे इतनी साहस थी कि वह अपने बच्चे को जन्म जरूर देगी। मेरा आधार यही होगा। मैं उसको बड़ा करूंगी और कोई अच्छा इंसान बना कर लोगों को दिखाऊँगी। अजीत बाबू की तरह नहीं जो एक इंसान के रूप में शैतान था । जीवन भर दुख सह लूंगी पर उनके परिवार को रास्ते पर लाकर ही दम लूंगी। विधाता ने कमला के साथ जो खेल खेला वह कोई असाधारण खेल नहीं था। कुछ एक लोग कमला के परिवार के बारे में गलत – सलत बातें भी करते पर सून – सून कर मन मसोसकर रहना पड़ता। कमला की माँ उसे घर में ही छुपा कर रखती, लेकिन इस तरह कब तक। वह वक्त भी सामने आ गया जब कमला अपने बच्चे को जन्म दी। रामलगन वही उस शहर के एक प्राइवेट अंग्रेजी स्कूल में अध्यापक बन गए थे। परिवार अच्छा खासा उससे मेंटेन होने लगा। गोल – मटोल लाल – लाल सुंदर स्वरूप बड़ी ललाट और प्यारी – प्यारी सी सुंदर आंँखें अपने बाप के बराबरी में थोड़ा भी कम ना था उसका प्यारा। कमला जान गई थी कि मेरे यहां रहने से मेरे माता – पिता और भाई बदनाम के शिकार हो जायेंगे। वह अपने माता-पिता के बोझ नहीं बनना चाहती। वह इन सबों से दूर बहुत दूर चला जाना चाहती थी। ऐसा ही हुआ। रात हुई और वह घर से निकल गई।[2/14, 21:38] Bindeshwar Prasad Sharma: कुछ ही देर में वह एक बस में दाखिल होकर कहीं दूर चले जाने का प्लान तैयार करने लगी थी। बस अपने निर्धारित समय पर खुल गई। अब – तक बस करीब सात सौ किलोमीटर की दूरी तक चल चुकी थी। इतनी दूर की सफर वह अपने जीवन काल में पहली दफा ही कर रही थी। जब बस अंतिम पड़ाव पर आकर रूकी, सभी यात्री उस बस पर से उतर गये, पर कमला अब भी बैठी रही। तभी कंटक्टर वहाँ आया और सहानुभूति प्रकट करते हुए पूछा… कहाँ जाना है बहन.. । कमला थोड़ी देर के लिए सहम गयी और कुछ भी न बोल पाई। बच्चे को गोद में लिए वह बस से नीचे उतर गयी। कंडक्टर उसके मनोभाव को परख लिया। कमला वहीं पास के डाकखाने के बरामदे में रात भर ठहर गयी। पाठक जी उसी डाकखाने के बगल वाले कमरे में रहते थे। सुबह नींद खुली और उठकर दरवाजे खोले तो सामने एक युवती और उसके गोद में एक बच्चा नजर आया। उसके मायूस और उदास चेहरे को देख कर उन्हें समझने देर न लगी कि वह कोई संकट में है। पाठक जी बहुत ही दयालु थे। जाड़े का मौसम था। उनका मन कह रहा था उसे अपने कमरे में बुला लें, लेकिन तत्क्षण ही उनके सोच बदल गए। जमाना खराब है। अकेले अनजान मर्द के घर में किसी जवान लड़की का दाखिल होना आज के जमाने के लिए ठीक न था । कमला भी किसी का एहसान नहीं लेना चाहती थी । वह वहाँ से कहीं दूसरी जगह जाने को तैयार हो गयी। तभी करीब पचास – साठ वर्ष का एक बूढ़ा वहाँ आ गया। कहाँ जाना है बेटी….. कहाँ से आ रही हो…..? कमला अभी कुछ बोल पाती कि बूढ़े को समझ में आ गया, यह जरूर कोई संकट में है। साथ में बच्चा है, इसके साथ जरूर कुछ न कुछ अनहोनी हुई है । बूढ़े को उस पर तरस आ गई और वह उसे अपने घर चलने का आग्रह कर दिया। चलो बेटी…. मेरे घर चलो….? – नहीं बाबा… मैं आपके घर नहीं जाउंँगी….। तो फिर कहाँ जाओगी…? कमला उस बूढ़े के साथ जाने में सकपका रही थी। फिर वह सोचने लगी, उसके मदद के लिए कहीं भगवान ने तो उसे नही भेजा है। इस तरह के उधेड़ बुन में कमला उलझ कर रह गयी। उसके चेहरे बता रहे थे कि वह अपने घर से भागी हुई कोई अबला है। बाबा उसे अपने घर चलने की जिद कर दिए । कमला के पास और दूसरा विकल्प भी तो नहीं था। वह उस बूढ़े के साथ चलने के लिए तैयार हो गयी। बूढ़ा आदमी कमला को अपने घर ले आया। कमला सोचने लगी, बोली इतनी बड़ी महल में बाबा अकेले हैं। हाँ बिटिया…। काहे कि आपन परिवार में…अऊर केहू नाही बा…… । हाँ बिटिया….. हमरे ई दुनिया में…. केहू नाही बा…. एक तोहरे अइसन… हमार बिटिया भी रहे….. कहते-कहते बाबा का माथा घूम गया। चक्कर सी आने लगी तो वह वहीं पर बैठ गए। क्या हुआ बाबा…..क्या हुआ….. कहती हुई कमला कुछ घबराई थी। उनके चेहरे और लिलार पर पसीने की कुछ बूंदें छलकने से लगे थे। कमला यह सब देखकर घबरा सी गई। वह जल्दी से बच्चे को बेड पर सुलाकर – का हो गइल बाबा… चुप काहे हो गईलऽ.. । तभी बाबा धीरे से बोल उठे – नाहीं बिटिया.. तनिका चक्कर आ गईल…. घबराए के कवनो बात नाहीं बा। कमला कमरे में इधर-उधर झांकती रही, फिर एक कोने में रखी एक सुराही दिख गई। उसमें से एक गिलास पानी लाकर जल्दी ही बाबा को दी। कमला सोच रही थी कि मैंनें बाबा से पूछ कर कोई भूल तो ना कर दी। कहीं मेरी वजह से उन्हें अपने परेशानी तो नहीं बढ़ गई है। पानी पीकर बाबा किचन की ओर चले गये। कमला देखती रह गयी। वह स्टोब जलाते ही कि कमला बाबा के पास आ स्टोब जलाने नहीं दी। दोनों मिल कर चाय बनाये। दोनों मिलकर चाय पीये। कमला ने भी अपनी सारी कहानी बाबा को सुना दी। कुछ देर बाद बाबा मुन्ना के पास गये। उसे गोद में भींच कर लाड़ – प्यार करने लगे। कमला भी वहाँ आ गयी। लग रहा था जैसे बाबा को उससे बरसों की जान पहचान रही हो। बाबा बोल पडे – का नाम है कमला हमरे बबुआ के… बाबा एकरे नाम अभी तक नाहीं पड़ल बा। धत पगली….. बिना नामों के केहू रहेला का। आज से हमरे बबुआ के नाम रणजीत रही। रण के जीते वाला जोधा। तभी दूधवाला दरवाजे पर आ गया। दरवाजा खटखटाते हुए आवाज़ लगाया। बाबा दरवाजा खोलते हैं, रख दे हय डेकचिया में… अऊर सुन… कल से दू शेर दूध ले अइहे। हाँ मालिक कहकर वह चला गया।उधर बड़े ठाकुर अभय सिंह के यहां डकैती हो जाती है। करोड़ों का माल लूट लिया जाता है। उन लोगों ने कितनों को मौत के घाट उतार दिये। चारों तरफ खून के धब्बे दिखाई देने लगे। भगदड़ और हड़कंप सी मच गयी। पर घटना में ठाकुर अभय सिंह बाल बाल बच गये थे।इधर रामलगन को भी चैन नहीं मिलता। कमला को खूब ढूंढते, पर कुछ भी पता नहीं चलता। आज कमला को गये कुल चार वर्ष बीत गये, लेकिन आज भी कमला का पता नहीं चला। इधर कमला नर्स की काम खोज ली। रणजीत पढने लायक हो गया। उसे स्कुल में दाखिला भी दिला दिया गया। बाकी का समय रणजीत बाबा के साथ हंस – खेलकर और पढ़ने – लिखने में बिताने लगा। बाबा खुद सरकारी कलर्क थे। रिटायर होने के बाद उन्हें पेंशन भी मिलनी शुरू हो गयी थी। फिर क्या गम था।कमला का भाई किशोर भी अब बड़ा हो गया था। वह बी एस सी की परीक्षा प्रथम श्रेणी से पास कर मेडिकल कॉलेज में दाखिला ले लिया था। रामलगन और उसकी माता शकुंतला बहुत खुश थे। आस – पास में इनका नाम भी फैलने लगा। राम लगन अब उसी स्कूल के प्रधानाचार्य बन गये। वे आदर मान और सम्मान के साथ जीने लगे। जब कमला की याद आती तो उस दिन घर में जैसे मातम ही छा जाता। इत्तेफाक से इसी मेडिकल कॉलेज में ठाकुर की लाडली बेटी प्यारी पुष्पा को भी दाखिला मिल जाती। दोनों एक ही सत्र के विद्यार्थी थे। बाद की मुलाकात से उन दोनों में प्यार हो जाता है। वे एक – दूसरे को चाहने लगे। कालेज में ही दोनों की नजदीकियाँ बढ़ती गयी। मेडिकल की परीक्षा पास कर दोनों तीन साल के लिए लंदन चले गये। किशोर बिल्कुल ही नहीं जानता था कि वह ठाकुर की इकलौती बेटी पुष्पा है। किशोर को लंदन जाने में कुछ असुविधाएं जरूर हो रही थी, लेकिन किशोर को कालेज के फंड से उसे लंदन भेज दिया गया। माँ – पिता जी यह सब जानकर बहुत खुश होते थे। आज उनका सपना पूरा होता सा दिख रहा था।इधर रणजीत भी बड़ा हो गया था। वह अपनी माँ से नर्स की नौकरी छोड़ देने की आग्रह करता। पर कमला उससे सहमत नहीं होती। बेटा कॉलेज में पढ़ने लग गया था। माँ को अपने आप में खुशी होती । कमला सफेद – सफेद वस्त्र में खूब अच्छी लगती थी। बाबा सोचते थे, बेचारी अपनी आधी से अधिक जिंदगी इसी तरह से पार कर गई। कितना बड़ा त्याग किया है इसने। कितनी बड़ी साधना से तप कर लोगों के सामने आई है। कितनी परेशानियों से लड़कर इस मुकाम पर पहुँची है। बाबा ने तो कई बार शादी की भी बात भी उससे चलाई थी, पर कमला इससे साफ मना करती रही। बलिहारी है इसकी, यह तो देवी के समान पूज्य है। मां अपने बेटे रणजीत को इतना ज्यदा प्यार करती थी कि कभी उसके जेहन में अपने बाप का ख्याल ही नहीं आने दिया। बाबा ने भी रणजीत को खूब प्यार दिया। एक दिन रणजीत – अरे माई… सर्कस देखे चलबे का…. । सर्कस…। हाँ माई… बड़ा अच्छा सर्कस आइल बा। सभी लोग कहत रहें… जाके जरूर देखऽ। अईसन सर्कस हमरे नगर में कबो ना आईल। मांँ – अच्छा हाँ… तनी जाके बाबा से बोलऽ। बाबा चारपाई पर पड़े – पड़े ही इन सब की सारी बातें सुन रहे थे।उनका बूढ़ा शरीर कहीं घुम – फिर नहीं सकता था और ना ही कोई शौक उनसे अधूरा रहा था । रणजीत सर्कस देखने की इच्छा अपने बाबा से जाहिर करने लगा। प्लान कइसन रही बाबा… ।तभी बाबा कमला से बोलते हैं – देखऽ नऽ रणजीत सर्कस देखेला तंग कईले बा…। कमला – हाँ.. हाँ.. देखऽ नऽ जिद कईले बा।[2/15, 20:44] Bindeshwar Prasad Sharma: अरे कमला… .कल छुट्टी के दिन बा नऽ। बाबा – जाके तू लोग सर्कस देख आवऽ… हम त जाए नऽ सकब। रणजीत – बाबा… अपने के त हम ले जाईब… रिक्शा लेके आ जाईब हम। दूसरे दिन रंजीत सर्कस का टिकट बुक करा लिया। रिक्शा भी आ गई। सब सर्कस देखने गये। खूब मजा आया, कमला तो ऐसी सर्कस कभी देखी ही नहीं थी। वे लोग सर्कस देख कर सीधा घर आ गये। कमला खाना बनाई। तभी सुरेश दौड़ा – दौड़ा आता है। आंटी जी एक खुशखबरी…। माँ चक्कर खा जाती है – खुशखबरी…. हाँ हाँ हाँ …. पहले मुंँह मीठा करावऽ…. तब जाके बताईब। रणजीत जान रहा था कि उसका परीक्षाफल अच्छा आया होगा। माँ दौड़ी दौड़ी मिठाई का पैकेट ले आती है। अच्छा लऽ मिठाई…. कर लऽ मुंह मीठा…. अब त बतावा। हमरे भैया फर्स्ट डिवीजन से पास कइले बाड़न। फर्स्ट डिवीजन से..। हाँ – हाँ … फर्स्ट डिविजन से। हम अखबार में देखके अबहीं आईल बानी । यह सुनकर कमला रंजीत को गले लगा लेती है। रणजीत ने माँ और दादा जी के पैर छूकर आशीर्वाद प्राप्त किया। रणजीत बी ए में दाखिला ले लिया। कुछ दिनों के बाद कॉलेज में खेल प्रतियोगिता शुरु होती है। जिसमें रंजीत ही भाग ले लेता है। वैसे रणजीत करीब सभी खेलों में अपनी रुचि रखता था। वह एक अच्छा खिलाड़ी के रूप में उभरता हुआ एक सितारा था। खेल प्रतियोगिता के करीब सभी खेलों में वह प्रथम आता था। ढेर सारे पुरस्कारों से भी वह सम्मानित किया जा चुका था। कॉलेज की तरफ से एक गोल्ड मैडल उसे दी गई थी। इस तरह आज वह सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में अव्वल था। माँ कमला और उसके बाबा इस तरह के खिताब से बहुत खुश थे।अब बाबा काफी बूढ़े हो गए थे। कमला बाबा की सेवा के लिए नर्स की काम छोड़ दी। कमला की सेवा और ख्याल बात से ही अब तक बाबा जिंदा थे। वरना वह कब के गंगा लाभ हो गए होते। बाबा के लिए अब गिनती के थोड़े ही दिन शेष रह गये थे।किशोर और पुष्पा लंदन से वापस आते हैं। शहर पहुंचते-पहुंचते रात हो जाती है। किशोर का घर उसी शहर में जहाँ वह पुष्पा से अपने घर चलने का आग्रह करता है लेकिन पुष्पा उसके घर नहीं जाती है। चांदनी रात देख कर उसे शैर करने की बात याद आती है। वे अपने बैग – वैग लेकर नदी किनारे पहुंच जाते हैं। किनारे कई नावें उसे दिखाई पड़ती है। पुष्पा जल्दी ही उनमें से एक पर सवार हो जाती है। किशोर भी पतवार के पास बैठ जाता है। नाव नदी में चल पड़ती है। एक गाना शुरू होता है और इसके साथ वे जीने मरने की कसमें खाते हैं।इधर रंजीत पुलिस इंस्पेक्टर बन जाता है और उधर बाबा की तवियत बिगड़ जाती है। ऐसा लगता है कि अब बाबा यमराज के पास जाने के लिए पूरी तरह से तैयार हो गए हैं। अपनी सारी जायदाद रणजीत के नाम कर देते हैं। रंजीत की आंँखों में आंँसू भर आती है। कमला सिरहाने बैठकर बाबा के माथे को सहलाती है। बाबा रनजीत को बधाई देते हैं। इंस्पेक्टर का नाम सुनते ही बाबा गदगद हो जाते हैं। रणजीत झुककर बाबा के कलेजे से सट जाता है। डॉक्टर साहब सामने खड़े – खड़े उन्हें ही निहार रहे थे। अंतिम समय आ गया था। चंद ही मिनटों के बाद बाबा के प्राण पखेरु उड़ गए। कमला चित्कार मारके रोने लगी। रणजीत की आँखों से भीआँसू छलक गये। वह अपनी माँ को ढांँढस बंधाने लगता। रोने की आवाज सुन आसपास के लोग इकट्ठे हो गये।उनका रंथी खूब अच्छी तरह से सजाया जाता है। दरवाजे पर ढेर सारे लोगों का आना – जाना जारी रहता है। एक तरफ खुशी तो दूसरी तरफ दुख की भावना से आस-पास के सभी लोग घबरा जाते हैं। डी. एस. पी साहब भी अपनी जीप लेकर वहाँ पहुंँच आते हैं। इस तरह का हाल देखकर वह भी अपना दुख प्रकट करते हैं। रणजीत को घबराए देख वह भी घबरा जाते हैं लेकिन इस तरह से घबराना पुलिस अधिकारी का काम नहीं था । वह रंजीत को समझाते हुए दिलासा देते हैं। उनका दाह संस्कार काफी धूमधाम के साथ किया गया। अब रणजीत अपने कामों में व्यस्त हो जाता है। सरकारी कपड़े में अपने बेटे रंजीत को देखकर कमला मन ही मन बहुत खुश होती है। आज कमला के अपने अरमान पूरे हो गये थे।क्योंकि अब उसका बेटा रणजीत नहीं बल्कि इंस्पेक्टर रणजीत था।उधर किशोर अपने घर जाकर अपनी माँ, पिता जी का पैर छूकर प्रणाम करता है। माँ और पिता उसे सीने से लगाकर अपना प्यार जताते हैं। आशीर्वाद देते हुए इसका श्रेह अपने बेटे किशोर को देते हैं। मेहनत और लगन का फल किशोर को मिल गया था। किशोर कहता है – ई सब आप लोगन के आशीर्वाद के फल बा बाबू जी… आप सब के कृपा नऽ रहत तऽ हम कुछो नऽ कर पईंती । बबुआ विलायत से आईल हवन… कुछो मीठा – पानी ले आवा। पिता जी की बात सुनकर माई – अरे हाँ… हम त भूलिए गइनी। कह कर शकुंतला दूसरे कमरे में चली गई । जाते-जाते अपने बेटे की आवाज सुनकर वह रुक जाती है। बेटा – रहे दे माई… हम कवनो मेहमान बानी… जे हमारा बिछावन चाहीं। माई – अरे बबुआ… जब बाबू जी के मन बा त बिछा लेवे दऽ । किशोर – छोड़ दे माई… बिछावन अऊर तकिया… असहीं ठीक बा। ले हमारा अटैची ठीक से रख दे ।किशोर नंगे चारपाई पर बैठ कर पिता जी से बात करने लगता है। माँ शरबत बनाकर लोटे और गिलास लेकर किशोर के पास आती है। माई – ले बबुआ पिलऽ तनी.. थक के आईल होइबऽ… मिजाज हरियर हो जाई। किशोर – अरे माई पहिले बाबूजी के द नऽ.. हमहूँ पीयऽ तानी। इस तरह किशोर शरबत पीने लगता है।इत्तेफाक से इंस्पेक्टर रणजीत का इसी शहर में तबादला हो जाता हैं। उनकी ड्यूटी वहीं टाउन थाना में मुकम्मल हो गई। घर से बराबर आना – जाना संभव न था तो उसने शहर में ही एक अच्छा खासा अपने लिए किराये का मकान ले लिया था। अपनी मांँ शकुंतला के साथ वह वहीं पर रहने लगा था। दूध वाले की देख – रेख में वह वहाँ का मकान छोड़ आई थी ।इधर डॉक्टर किशोर और इंस्पेक्टर रणजीत में दोस्ती भी हो गई थी। दोस्ती के नाते किशोर उसे अपने घर लेकर आ जाता है। किशोर की माँ उसे बहुत इज्जत करती है। उसके पिता उसे बहुत अच्छे लगते थे। इस तरह से रणजीत का आना-जाना उसके घर में निरंतर चलता रहा। इनके बीच क्या रिश्ता है किसी को कुछ भी पता नहीं था । उन्हें मालूम नहीं कि हम दोनों एक ही खानदान के हैं, और ये हमारी नानी और नाना जी हैं।पुष्पा अपने पिता बड़े ठाकुर से एक पार्टी करवाती है। जिसमें कुछ मान्य लोगों को बुलाया जाता है। किशोर अपने दोस्त इंस्पेक्टर रणजीत के साथ वहाँ आता है। एक नए इंस्पेक्टर के नाते बड़े ठाकुर उसे अपने आसन पर बड़ी इज्जत के साथ बैठाते हैं। ऊपर नाच गाने का प्रोग्राम चलता रहता है। किशोर के साथ इंस्पेक्टर और फिर इंस्पेक्टर के साथ बड़े ठाकुर। हाथ में एक लंबी सी छड़ी लिए आपस में इधर-उधर की बातें करते हैं। तभी पुष्पा आती है। किशोर अपने दोस्त इंस्पेक्टर रंजीत को आँख मारता है। फिर इशारों-इशारों में उसे कुछ बता देता है। इंस्पेक्टर रणजीत को अपने दोस्त किशोर से पुष्पा के बारे में सब मालूम हो जाता है। किशोर अपने दोस्त इंस्पेक्टर से पुष्पा को मिलाते हैं। पार्टी खूब धूमधाम से चल रही होती है। ठाकुर अभय सिंह इंस्पेक्टर रणजीत को फिर से आने की दावत देते हैं। रणजीत भी वापस आने के लिए हाँ में हाँ भर रहे थे। किशोर एक प्राइवेट अस्पताल खोलता है। इन दिनों किशोर की तरक्की खूब होने लगी है। उनका नर्सिंग होम भी अच्छा – खासा चल पड़ा है। वह शहर के नामचीन डॉक्टरों में एक माने – जाने लगे हैं। इधर ठाकुर साहब बीमार पड़े हैं। पुष्पा अपने पिताजी को इसी अस्पताल में लाकर भर्ती करवाती है। देख – रेख के सारे काम और उनका इलाज दोनों मिलकर करते हैं। पुष्पा सुई लगाती तो किशोर पानी चढ़ाता।इधर कमला अपने बेटे इंस्पेक्टर रंजीत को अपनी सारी कहानी सुना देती है। रणजीत बातें सुन-सुन कर घबरा जाता है। उसकी आंँखों में आंँसू छलक कर रह जाती है। दो – चार महीने पहले वह उसी गांँव में जा चुका था।अब इंस्पेक्टर रणजीत के मन में कुछ अलग – थलग से ख्याल आ – जा रहे थे। उसके विचारों में भी अनेक तरह के प्रश्न उत्पन्न होने से लगे थे। शायद वही ठाकुर है। जिसके पास वह गया था। वही ऊंँची संगमरमर की शानदार लाल कोठी और फिर कृपापुर..। इस तरह के अनेक ख्यालों से वह बेचैन हो घबरा सा गया। मांँ से इतनी बातें सुनकर पागल के समान होता चला गया थाउ। उसके ऊपर जैसे पहाड़ से टूट कर रह गये। मन मस्तिष्क और दिलो-दिमाग उसके अस्तित्व से बाहर जाने लगे। तभी फोन की घंटी बजी। तत्क्षण रणजीत को एस पी साहब से बात होती है। वह किसी खास काम के लिए अपने पास उन्हें बुलाते हैं। इंस्पेक्टर रणजीत जल्द ही उनके पास पहुँच जाते हैं। वहाँ काम काज करने के बाद रणजीत डॉक्टर किशोर के अस्पताल में मिलने चले अाते हैं। जहाँ उन्हें किशोर बहुत परेशान दिखता है। रणजीत उनसे बोल उठता है.. क्या बात है डॉक्टर साहब.. बड़ा परेशान लागत बड़ा। डॉ किशोर ज्यादा कुछ बोल नहीं पाये। उसके उदास और बेचैन मन और चेहरे को देखकर रणजीत भी घबरा गया है। किशोर कमरा नंबर 7 मैं पहुंँचे। उसके पीछे – पीछे रणजीत भी चला आया। सामने ठाकुर बेड पर पड़े द ह उनकी हालत खराब थी। पानी की 2 बोतलें उनके शरीर से कनेक्ट था। पुष्पा वहीं स्टूल पर उदास बैठी थी। उनकी हालत देख रणजीत भी उदास हो गए। कुछ देर वहीं बैठे फिर अपनी जीप लेकर डेरा पर आ गए। रणजीत भी अपनी माँ से सारी बातें शेयर करता है। रणजीत और उसकी माँ जीप में बैठकर अस्पताल पहुंचते हैं। उधर किशोर भी अपने माता पिता को लेकर पुष्पा और ठाकुर साहब से मिलने के लिए पहुँच जाते हैं। इधर बहुत कोशिश के बाद ठाकुर अभय सिंह को होश आया था। वे सारे एक जगह इकट्ठा हो गए थे। एक दूसरे को देखकर अचंभित और स्तब्ध रह गए थे। कमला अपनी मां, पिताजी को पहचान जाती है। अपनी बेटी कमला को पहचानने में भी शकुंतला को देर नहीं लगती और वह एक दूसरे से लिपट जाती है। कमला माँ, पिताजी के पैर छूकर अपने पिताजी के गले लग जाती है। आँखों में आंँसू भर आती है। इधर कमला अपने ससुर और उसके पिता ठाकुर को देख कर डर जाती है। ठाकुर अभय सिंह को यह सारी कहानी मालूम हो जाती है। ठाकुर अपने हाथ जोड़कर रामलगन से माफी चाहते हैं। डॉ किशोर और इंस्पेक्टर रणजीत यह सब देखकर आश्चर्यचकित रह जाते हैं ठाकुर अपने होने वाले दामाद को ढूंढते हैं…फिर आवाज़ लगाते हैं। किशोर उनके पास जाता है। अपनी बेटी पुष्पा का हाथ किशोर के हाथ में देकर वह संसार के विदा हो जाते हैं। उनके प्राण – पखेरु काया कल्प करने शरीर से निकल जाते हैं। बड़े ठाकुर अभय सिंह अपने बेटे अजीत की मृत्यु के बाद काफी टूट से गए थे।अब उनका कोई भी सहारा शेष न बचा था। पुष्पा किशोर के बारे में सारी जानकारियां हासिल कर ली थी। किशोर से बहुत ज्यादा प्यार था। फिर उस तरह की कोई घटना ना हो उसने सारी बातें अपने पिताजी अभय सिंह को बतला दी थी। पिताजी पुष्पा को जी-जान से चाहते थे। उसने पुष्पा की सारी बातें मान ली। हाँ कमला के बारे में उसे तनिक भी पता न था कि वह कहाँ और कैसी है। पुष्पा किशोर को इसकी भनक तक लगने नहीं दी। मृत्यु के एक दिन पूर्व ही ठाकुर अभय सिंह वसीयतनामा तैयार करवा लिए थे। साथ में वह फाइल भी बंद करवाने को लेकर जज साहब से सारी बातें हो गई थी। अभी कुछ दिन पहले ही वह फाइल एस पी साहब इंस्पेक्टर रणजीत को सौंपे थे। उस फाइल को देखने के लिए वक्त भी ठीक से नहीं मिल पाया था कि वह कुछ कर सके। हाँ जब इंस्पेक्टर रणजीत ठाकुर के हवेली में गए थे तो ठकुराइन से जरूर वायदे करके आए थे कि मुजरिम जो भी होगा मैं उसे ढूंढ निकालूंगा। ठकुराइन पुष्पा की खुशी के लिए सब कुछ भूल जाती है। अब वह और झमेला नहीं लेना चाह रही थी। जाति भी एक थी, हांँ में हांँ भरने में तनिक देर ना हुई।इधर ठाकुर साहब को देखने के लिए बहुत सारे लोग अस्पताल में इकट्ठे हो जाते हैं। तब ठकुराइन का रो – रो कर बुरा हाल हो रहा था। डॉक्टर किशोर अस्पताल की सारी प्रक्रिया पूरी करने में लगे थे। उन्हें उनके गाँव कृपापुर ले आया गया। इंस्पेक्टर रणजीत के साथ पूरा परिवार भी कृपापुर आ गये। गाँव के लोग उन सबों को देखकर आश्चर्यचकित होते हैं। बूढ़े बुजुर्ग उनके पिताजी को पहचानने में कोई देर नहीं करते। दाह संस्कार के बाद कमला और रंजीत अपने घर लौट आया । कुछ दिन इस तरह ही बीत गये। वकील साहब हवेली में आते हैं और ठकुराइन को कल दिन 10:00 बजे कचहरी आने की आग्रह करते हैं। ऐसा ही होता है, ठकुराइन कचहरी पहुंँचती है सारी प्रक्रिया वकील साहब तैयार कर रखे थे। ठकुराइन जज के सामने बोलती है। वह जज साहब से अपनी केश वाली फाईल को बंद करने को कहती है। केस रफा-दफा हो जाता है। मुदई बाइज्जत बरी हो जाते हैं। गांव के लोग बहुत खुश हो जाते हैं। हवेली के सारे मुसटंडे को पैसे देकर उन्हें छुट्टी कर दी जाती है। फिर से वहाँ अमन-चैन आ जाती है। सभी लोग बड़े प्यार से रहने लगते हैं। पुष्पा और किशोर की शादी खूब धूम – धाम से कराई जाती है। सारे लोग इकट्ठा होते हैं। कमला यह सब देखकर बहुत खुश होती है। फिर वह उदास सी होकर अजीत बाबू को याद करती रहती है। कमला अपने भाग्य पर कोसकर फिर संभल जाती है। फिर कमला को ठकुराइन भी अपने बहू के रूप में उसे स्वीकार कर लेती है। खुशियों में जैसे चार चांद लग जाता है।

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