“संध्या”

संध्या आती है जब सूर्य की लाल किरणों के साथदृश्य हो जाता है तब और भी अद्भुत और खासजिधर भी देखूँ वहाँ लालिमा नज़र आती हैचहुं ओर आकाश में बस लालिमा ही भाती हैसूर्य की इच्छा भी नहीं वहाँ से हटने कीपर जरूरत है समय की गरिमा रखने कीसूर्य देव इसलिए क्रोधित हैंपर समय के आगे वे भी शोषित हैंक्रोध से वे तभी लाल हो आतेन चाहते हुए भी वे डूबते से नज़र आतेछा जाता जब अत्यंत अँधियारानिराश हो आता मन का गलियारातब दीपक ही प्रकाश देता हैपर दीपक तले भी अंधेरा होता हैइसलिए सच्ची रोशनी का इंतज़ार करता हूँपर बनावटी रोशनी का भी सम्मान करता हूँजिससे कार्य अपना करता हूँअक्सर यही सोचा करता हूँकल फिर सुबह आएगीसूर्य की किरणें साथ लाएगीफिर सच्ची रोशनी का साथ होगाजो जीवन का मेरे अभिन्न भाग होगाप्रत्येक दिन यही आशा करता हूँऔर कविता को अपनी समाप्त करता हूँ……………………………………………………………………………………………………………….देवेश दीक्षित7982437710

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7 Comments

  1. vijaykr811 vijaykr811 22/02/2020
  2. deveshdixit DEVESH DIXIT 22/02/2020
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 25/02/2020
    • deveshdixit DEVESH DIXIT 26/02/2020
      • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 26/02/2020
        • deveshdixit deveshdixit 26/02/2020
  4. deveshdixit deveshdixit 26/02/2020

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