रचनाएँ – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

[1/23, 22:15] Bindeshwar Prasad Sharma: सरस्वती वंदनामैं अपने प्रतिज्ञान से माता, अवगत तुझे कराता हूँहो समर्पित चरणों में तेरा, अपना शीश झुकाता हूँ।हे महाश्वेता, हंसासना, चित्रगन्धा, तू नैना – भिरामतू स्वरात्मिका, चन्द्रलेखा, विमला, तू विश्वा सुखधाम।मैं बालक नादान हूँ तेरा, तेरा ही गुण गाता हूँहो समर्पित चरणों में तेरा, अपना शीश झुकाता हूँ।तू सौम्या, सर्वदेवस्तुता, तू ही ब्राह्मी – सौदामिनीतू शुभदा, रमा, चन्द्रवदना, तू रूप सौभाग्य दायिनी।नित्य वंदन – अभिनन्दन करने, तेरे दर ही जाता हूँहो समर्पित चरणों में तेरा, अपना शीश झुकाता हूँ।तू अम्बिका, धूम्रलोचनमर्दना, तू सुरासुर नमस्कृतातू कांता, निरञ्जना, वेदऋचा, विद्याधर सुपूजिता।धर्म – कर्म को साथ में लेके, अपनी लाज बचाता हूँहो समर्पित चरणों में तेरा, अपना शीश झुकाता हूँ।विद्या और वाणी की देवी, सुर – ताल तेरी वीणा मेंसभी रहस्य तेरे अंतस में, छुपी है राज त्रिगुणा में।मेरी नैया डगमग जब करती, तुझको में बुलाता हूँहो समर्पित चरणों में तेरा,अपना शीश झुकाता हूँ।[1/25, 13:20] Bindeshwar Prasad Sharma: प्रदत्त शब्द पर दोहेमातृभूमि जय हिन्द की, हम सब हैं संतानसाथ तिरंगा है सदा, आन, बान औ शान।ध्वज तिरंगा दे गया,वीरों की पहचानबलिदानों की भीड़ में, आजादी का गान।सुरक्षाहो सुरक्षा इनकी सदा, देश भक्ति हो साथझुकने न दो कभी इसे, रहे तिरंगा हाथ।[1/26, 18:26] Bindeshwar Prasad Sharma: हमें समझ में आ गया, बलिदानों की शानरहे तिरंगा यह अमर, हो इनका सम्मान।लेकर झंडा हाथ में, आए बच्चे साथदीवानापन था गजब, होठों पर मुस्कान।आज गणतंत्र हिन्द का , पर्व मनाते लोगकुर्बानी को याद कर, रखते इनके मान।नारा वंदेमातरम् , की करिये जय धोषदिल में रखिये जोश भी, खून रहे ऊफान।करिये सेवा देश की, बनिये पहरेदारइनकी सुरक्षा खुद करें, देकर अपनी जान।[1/27, 17:46] Bindeshwar Prasad Sharma: तहज़ीब सिखलाती है हमें, महा पौरुष की बातप्रतिपालन करें पुरखों की, जो है उनकी सौगात।राह दिखलाये जो सत्य का, साथ में धर्म – ईमानउनकी पूजा हो सदा अब, उनका भी हो गुणगान।सुगम राह को हम अपना लें, मान लें उनकी बातअपना जीवन धन्य बना लो, जान लें मेरे तात।आदत बुरी अभी से छोड़ो, पकड़ लो दामन साफकिस्मत भी बदलेगी तेरी, मिलकर करेंगे माफ।सभ्यता अपनी रख बचा कर, संस्कृति पुरानी हैसंस्कार को भूल मत अपने, ये बड़ी कहानी है ।दामन में कभी दाग लगे न, ऐसा ही तुम करनाकर्म पर तुम अडिग ही रहना,नहीं किसी से डरना।जाति धर्म की बात न करना , इतना तो विवेक हैये धरा है जान से प्यारी, हर दुखों में एक हैं ।[1/28, 20:12] Bindeshwar Prasad Sharma: दोहेतुलसी कबीर सूर की, गाथा है अनमोलउनकी गाथा बोलती, जैसे बजता ढ़ोल।धन्य भूमि है हिन्द की, जन्मे राम – रहीमइसी धरा के कृष्ण भी , इसी धरा के भीम।मीरा अरु रसखान की, भक्ति रही संगीतएक जिगर में बस गया , एक बनी मन मीत।नानक जन्मे इस धरा, इसी धरा गोविन्दबुद्ध अरु महावीर की, यही धरा है हिन्द।ज्ञान , विज्ञानों से भरा, कितना अनुपम देशइसके सिर पर ताज है, फिर भी नहीं क्लेश।न्यारी – प्यारी सभ्यता, प्यारी है परिवेशहै संस्कृति मिसाल की, अलग – अलग है वेश।इनकी सुरक्षा हम करें, मिलकर हम सब यारजान हथेली पर लिये, सीमा पर तैयार।[1/30, 10:01] Bindeshwar Prasad Sharma: आँखों ने किया है श्रृंगार तेरा शारदेदिल में बसाया है तेरा प्यार माँ शारदे।सुमति सिखा दो माँ, सुमिरन तेरा करते हैंशीश तेरे चरण, तन – मन तेरा करते हैं।ब्रह्मा के मुख से तेरा अवतार माँ शारदेदिल में बसाया है तेरा प्यार माँ शारदे।अवगुण मिटा दो मेरे, सतगुण संचार करोदास हूँ तुम्हारा माता, कुछ तो बिचार करो।ऐसा ही कुछ कर दो उपकार माँ शारदेदिल में बसाया है तेरा प्यार माँ शारदे।हँस की सवारी तेरी, सचमुच न्यारी – न्यारीराग – अनुराग है, सुर – ताल तेरी प्यारी – प्यारी।स्वर- सरगम, वीणा की झंकार माँ शारदेदिल में बसाया है तेरा प्यार माँ शारदे।अज्ञान को प्रकाश भर, बुद्धि में विकास देनाआत्मबल बढ़े मेरा इतना विश्वास देना।मूरख – चपाट हूँ कर उद्धार माँ शारदेदिल में बसाया है तेरा प्यार माँ शारदे।नैया मझधार मेरी, अब डगमग डोल रहीकहाँ – कहाँ ढ़ूँढे तुझे , आँख ये टटोल रही।विपदा मिटाओ मेरी अंधकार माँ शारदेदिल में बसाया है तेरा प्यार माँ शारदे।[1/31, 09:52] Bindeshwar Prasad Sharma: वसंती हवाहवा है अनोखी, वसंती हवा हैबह जाती पुरवाई, सनकी हवा है।ये भौंरे तितलियाँ, अठखेल करतीये मधुमक्खियाँ,अजब गुलेल करती।फूलों का मौशम, कलियों का यौवनभीनी हवाएंँ, ये मदहोश मधुवन।।जहाँ चाह उड़ती, मचलती हवा हैबहती है पुरवाई, सनकी हवा है ।सरसो – तीसी, ये नीली, वो पीलीदलहन – तिलहन, कितनी लचीली।गेहूंँ की बाली झूमें मतवालीलीची, आम के बौर लगी हर डाली।।जहाँ भी ये जाए, बहकती हवा हैबह जाती पुरवाई, सनकी हवा है।बहार का मौसम, संगीतों का सरगमहरियाली खेतों में भी है दमखमनई तरुणाई , देख लो अंगड़ाईबूढ़े जान में भी, आए जम्हाई।।पल – पल में देखो, झनकती हवा हैबह जाती पुरवाई, सनकी हवा है।टेसू रंगीला , ये फागुन छविलाऋतुराज वसंत , करे रासलीला।कोयल की बोली, सभी को लुभाताबिरहन के मन को, रह – रह डुलाता।।राहें बदलती ये , सुलगती हवा हैबह जाती पुरवाई , सनकी हवा है।[1/31, 17:15] Bindeshwar Prasad Sharma: नव पल्लव नव चेतना, जीवन सुखद वसंतहरियाली से सज गयी, धरा हुई बलवंत।ऋतुराज रज सुगंध का, अभिनन्दन हो आजफाग – चैत दो मास है, उस पर करिये राज।मदमाती मधुमास है, विरह वेदना संगकोयल की फनकार से, यौवन होती तंग।[2/2, 22:17] Bindeshwar Prasad Sharma: पर्यावरणखेत का बहता पानी बोलेमुझको अभी बचा लोतेरा ही मैं काम आऊँगाजीवन सभी बचा लो।इसे प्रदूषित मत तू करनान होने दो खिलवाड़जल और वायु तेरा जीवनकाट मत जंगल झाड़।इतना आप संरक्षण कर लोबनो तुम पहरेदारबात नहीं कोई माने तोसमझो उसे बेकार।जन – मन में यह बात फैला दोरहे न बाकी कोईअगर अब भी नहीं सम्भले तोसमझो जीवन खोई।पर्यावरण को जानो – समझोप्रकृति संतुलन बनाओइसे मत करना छेड़ – छाड़ तुमकचरा दूर हटाओ।स्वस्थ होगे कैसे तुम सबगंदा अब फैलाकरसाफ – सफाई छोड़ दिए तोमरना पैसा खाकर।जीवन को तुम व्यर्थ न करनाचार वर्णो के भाईक्षणिक सुखों में डूबे क्यों होकर्मो की हो कमाई।[2/3, 21:44] Bindeshwar Prasad Sharma: सत्यम शिवम सुंदरम , शंकराय त्रिलोचनम।चंड – रुद्र विभूषितम, खंड – खंड विभंजनम।हर शम्भू महेश्वर, पिनाकी शशिशेखरम ।वामदेव विरूपाक्ष, कपर्दी नीललोहितम।।भूतपतिम अनिश्वरम , महाकाल शिवाप्रियम।कृपानिधि मृत्युंजयम , प्रजापतिम गिरिश्वरम।।बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दुबाढ़ – पटना[2/5, 19:43] Bindeshwar Prasad Sharma: कलम लड़खड़ा जाए तो सलाम लिखनाअपने मोहब्बत का तुम कलाम लिखना।लैला – मजनू , हीर – राझा से कम नहींदिल के किताब में हमारा नाम लिखना।वफ़ा – बेवफ़ा की बात ही कुछ युदा हैचाँद हो तुम चाँदनी का पैगाम लिखना।[2/6, 11:19] Bindeshwar Prasad Sharma: वसंती होलीरंग – गुलाल के इस मौसम मेंमस्ती देखो आईघर – घर में खुशियों का आलमहर – बस्ती में छाई।फूलों से सज जाती बगियाहरी – भरी ये धरतीउन पर भौंरे गीत सुनातेतितली खूब उमड़ती ।आम्र – लीची के चढ़ी जवानीतितली हुई दिवानीबूढ़े – जवान, बच्चे भी अबकर देते नादानी।फागुन का दिन बड़ा निरालाहोता हुड़दंग होलीहवा वसंती जब – जब चलतीकसमस करती चोली।कुहू – कुहू कोयल भी गातीमन को बड़ा लुभातीहर बिरहन के मन को देखोकैसे ये भरमाती।इधर सोंधी मिट्टी की खुशबूउधर फूलों की महकसुरभित कर दे मन की बगियामहुआ रस की गमक।चौपालों पर झाल – मजीरालेकर होरी गाएझूमे – नाचे और खुशी मेंसबका दिल बहलाए।भेद नहीं कुछ मन में रखतेसाथ में भाई – भाईदुश्मन भी दोस्त बन जातेभर जाते सब खाई।चढ़ जाती खुमार होली कीमजे में देवर भाभीभंग की गोली खाकर भैयाबंद अकल की चाभी।[2/7, 19:15] Bindeshwar Prasad Sharma: मुँदरीआयो कपटी अरु गयो लपटीमुँदरी हमरी ले गयो झपटीकेहु देखत है केहु सूनत हैकेहु बोलत है डपटी – डपटी।गोरि रोवत है मन टोवत हैकेहु पाके सब कुछ खोवत हैसभी सखिया मिल समझावत हैकेहु बातन में अझुरावत है।ताक रही अरु कहीं झाक रहीराह देखत है ठहरी – ठहरीनिरेख लियो सब भितरी – बहरीशोक के बादल गहरी – गहरी।होय गया भूल नादानी मेंबिगड़ती बात क्यों जवानी मेंकछु शेष नहीं अब निशानी मेंमुँदरी वह गयो है पानी में ।

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  1. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 12/02/2020

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