मन की आँखें – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

ग़ज़लअपनी रज़ा में जीना दुश्वार लगता हैगिरेबान में झाँको तो बुखार लगता है।बड़ी दुष्कर है जिंदगी यकीं होता नहींफरेब इतना कि सब कुछ बेकार लगता है।जिधर भी हैं जाते उनकी मर्जी चलती हैजलाते दीप भी तो अंधकार लगता है।खता करते हैं तो उलझ जाता है कोईहर शै अब मुझे तलवार की धार लगता है।सुना है गरीब के दिल इंसान बसते हैंन लालच न कोई सत्रु वह गफ्फार लगता है।भीतर घात करने वालों की खामी कहाँभले लोग फंसते जहाँ बाजार लगता है।जमाने से शिकवा नहीं है मेरे दोस्तदिल तो सबका है किन्तु बीमार लगता है। फैशननया जमाना फैशन वाला देखऽ ई आईल बाबबुआ – बबुनी के मत पुछऽ देखऽ ई पगलाइल बा।ए बी सी डी बाप न जाने लभ यू लइका जाने लाआधा पढ़के पूरा बोले सभ नइका ई जाने ला।बड़ – छोट के लाज कहांँ बा देखऽ ई अंधराइल बाबबुआ – बबुनी के मत पुछऽ देखऽ ई पगलाइल बा।पढ – लिख के कुछ काम करऽ अरु दूसर काम भी करिहऽमाई – बाबू के नाम बचइहा करजा उनके भरिहऽ।चार दिन के बा जिंदगानी बुद्धि सभके हेराइल बाबबुआ – बबुनी के मत पुछऽ देखऽ ई पगलाइल बा।।जेंटलमैन से कम का लागे पढ़े – लिखे से भागेलादिन – रात मोबाइल में भैया देख देख के जागेला।बिगड़ल उनके चाल बा भाई देखऽ ई घबराइल बाबबुआ – बबुनी के मत पुछऽ देखऽ ई पगलाइल बा।।साईकिल के कौन पूछे पल्सर से ई घूमेलागोर बबुनी दूर देखके आपन हाथ ई चूमेला।केकरा – के अब का कही “बिन्दु” मति सभके भरमाइल बाबबुआ – बबुनी के मत पुछऽ देखऽ ई पगलाइल बा।। भूखओढ़ कर चादर यहाँ कोई चोर आया हैअपने आप को छुपाकर इस ओर आया है।लगता है उसकी तिजोरी खाली कर देगासोचकर सोचकर आँखों में लोर आया है।चोर चौकन्ना रहा मुझे आभास थी उसकीचुपके से वह घर का ताला तोड़ आया है।देखता रहा बस उसको वह घर अकेला थाआँखें बंद थी वह किचन की डोर आया है।वह जम कर खाया कुछ ताजा और कुछ बासीकुछ साथ में रोटी टुकड़ा मरोड़ आया है।फिर लिख दिया उसने कि मेरा पेट भूखा थाअलविदा कहता गया कि अब भोर आया है।हैरान हूँ इतना कि घर इंसान आया थाकहीं पिट जाने की कहीं पर शोर आया है। हम तो तन्हाइयों में, उनको तड़पते देखागमगीन इतनी थी की, फिर भी महकते देखा।वो कितनी हमदम थी, हमनशीं, अल्लाह जानेदर्द- ए – दिल में, मुहब्बत को मचलते देखा। काहे दिलवा में लालच समाय गयो रेकाहे मनवां में ऐसे अमाय गयो रे।हमरी अखिया में काहे भरम होय गयालाज लागे नहीं काहे शरम होय गया।कोई भौंरा आके दिल लुभाय गयो रेकाहे मनवां में ऐसे अमाय गयो रे।हम का जाने जिगर में हलचल होय गयाबात समझे हम कैसे उलझन होय गया।हमरी दिलवा में अगिया लगाय गयो रेकाहे मनवां में ऐसे अमाय गयो रे।कैसी आई है आफत जुलुम होय गयाऐसा लागे कि सबकुछ अब गुम होय गया।हमरी अंँगिया में काँटा चुभाय गयो रेकाहे मनवां में ऐसे अमाय गयो रे।नींद आये न हमका क्या गजब होय गयाचैन चुराया है कोई अजब होय गया।अइसन सपना में हमका जगाय गयो रेकाहे मनवां में ऐसे अमाय गयो रे।डोली आई बाराती मगन होय गयादोनों दिल भी मिले और चमन होय गया।भाग्य किस्मत की हमरे जगाय गयो रेदिल से दिल का रिश्ता बनाय गयो रे। प्रदत्त शब्द पर दोहेन्याय, पाखंड और व्यवस्थाजयकारा हो सत्य की, करो हमेशा न्यायछोड़ो मन पाखंड अब, प्रेम बाँट चितलाय।उचित व्यवस्था हो अगर, तो बनता है काजन्याय रूप भगवान का, चलता इनसे राज।न्याय नहीं पाखंड है, रहे व्यवस्था मौनगौण बना इंसान है, धर्म निभाये कौन। सुभाष चंद्र बोसहर धडकन में बसने वाले मेरे सुभाष किधर होनेताओ के नायक मेरे गले की प्यास किधर हो।तेरे जैसा सच्चा साथी लाए अब हम कैसेखोज लिया दुनिया में तुमको मेरे दास किधर हो।तुमने ही वह बिगुल बजायी और आजादी दे दीआजाद हिंद फौज बनाके मेरे इतिहास किधर हो।चौदह भाई बहन थे तुम वाह रे तेरी कहानीकूटनीति चाणक्य के जैसा मेरे प्रकाश किधर हो।तुम मुझे खून दे दो मैं तुम्हें आजादी दूंगाजय हिन्द के नारों मैं तुम मेरे परास किधर हो।भ्रमण विदेशों का तेरा क्या खूब था रंग जमायाहिन्द देश की धरा पुकारे प्यारे बोस किधर हो।देश की भक्ति में इस जीवन को तुमने दान कियाशत – शत तेरा नमन है मेरा तुम सुभाष किधर हो। शक्ल से चोर लगते हैं, अक्ल से खूब है ज्ञानीइनके आँखों में देखो तो समन्दर सा है पानी।इसे जिसने भी समझा है उसे उसने ही जाना हैकर्म के खूब सच्चे हैं, धर्म अमृत सी है वाणी। 

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