साथ ऐसा मुक़द्दस – शिशिर मधुकर

अधूरी प्यास ने मुझको सदा भीतर से तोड़ा है वो ही अच्छा लगे है प्यार जो दे देता थोड़ा है मुहब्बत जिसने दी मुझको उसे अपना खुदा माना साथ ऐसा मुक़द्दस देख लो मैंने ना छोड़ा है क्या लडूं वक्त से कुछ भी समझ आता नहीं मुझको कतरा कतरा लहू का दिल का इसने आ निचोड़ा है गिला कुछ भी नहीं ठोकर अगर एक सीख दे जाए मगर इंसा भी थक जाए मिले हर राह जो रोड़ा है भले तुम सोच लो कुछ भी मगर मर्जी चले उसकी अपने अनुसार ही मधुकर उसने रिश्तों को जोड़ा है शिशिर मधुकर

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