फूल – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

फूल चमन कादिल से दिल को मिलाते चलोफूल चमन के खिलाते चलो।मत करना शरारत किसी सेमत करना शिकायत किसी से।अब ना सोचो कि जाए कहाँचल दिए हम हैं मंजिल जहाँ।सबको ऐसे लुभाते चलोफूल चमन के खिलाते चलो।।लालच मन का मिटाओ अभीइज्जत अपनी बचाओ अभी।हौसला ये तेरा कम न होविपत्ति आए तो भी गम न हो।

बैर मनों का मिटाते चलोफूल चमन के खिलाते चलो ।।

पाप रख्खो न दिल में छुपाकरक्या करोगे पैसा कमाकर।गलत किये उसे तुम भुला दोलोभ को फाँसी पर झुला दो।सबको हसते – हसाते चलोफूल चमन के खिलाते चलो।।बढ़ाओ मत दिल की दूरियाँचलाओ नहीं चाकू – छुरियाँ।सुधर जाओगे तुम जो अगरहम अब रहे न रहे पर मगर।सिलसिला ये चलाते चलोफूल चमन के खिलाते चलो।।क्या है कर्म तेरा तुम जानोधर्म क्या है अपना पहचानो।क्यों बिगड़ा चलन है शहर काक्या सफ़र है सुहाने डगर का।घोल अमृत है पिलाते चलोफूल चमन के खिलाते चलो।।ये सभ्यता भूलो नहीं तुमसाथ रहना सीखो अभी तुम।जन जीवन का पाठ पढ़ाओनहीं ऐसे सबको लड़ाओ।गंगा प्रेम की बहाते चलोफूल चमन के खिलाते चलो। रघुनंदनउनकी अलग कहानी होती, जिनके दिल बसते रघुनंदनऐसे मानव प्राणी को हम, मिलकर करें सभी अभिनन्दन।जब धरा पर पाप है बढ़ता, तब आना प्रभु का होता हैऐसे निश्छल चमत्कारी का, अवतार यहाँ पर होता है।आपस में बस प्रेम जगा लो, सबको ऐसे गले लगा लोक्यों बनते हो तुम अभिमानी, उर के तम में दीप जला लो।ये सूरत सबको है प्यारी,वो विपदा हरने वाले हैंइनका नमन रोज हो बंदन, कल्याण ये करने वाले हैं।कर्म – धर्म का ज्ञान बताये, अपना कौशल खूब दिखायेतर गये देख कितने प्राणी, दलन हुए कितने अभिमानी।भक्ति में भगवान मिल जाते, भक्त को वरदान मिल जातेजिनकी नैया डगमग करती, भव सागर से पार उतरती।मुश्किल से तन मानव मिलता, कुकर्मो से ही दानव बनतालालच ईर्ष्या छोड़ो दिल से, देकर दिल को जोड़ो दिल से। नव वर्षक़दीम काल बीता रे भाईनवल देखो फिर आई।हर्ष विषाद का पल गुजरा थाखुशियाँ नई फिर लाई।बीस सदियों का बीस बर्ष हैक्या खोया और पायाराजनीति के इस महफिलों मेंकितना है रंग जमाया।ज्ञान – विज्ञान की हुई तरक्कीपड़ी रोजगार भारीपहले लूटा सभी ने मिलकरअब देखो महामारी।गरीब – वश्य – मजदूर मर रहेकिसान बैठ कर रोएखादी – खाकी मौज में रहतेदबंग मजे में सोए।कनक समान सुंदर था भारतशासक इसे लूट लियालालच में कुछ लोग थे अपनेऐसे उसने छूट दिया।सभ्य समाज, सत, कहाँ रहा अबभूले संस्कृति अपनीछल,कपट,मद,मनुज में, भर गयाभूल गये प्रीति अपनी।नव युग का अब निर्माण करें हमइस नये वर्ष में आकरजागृत हो भेद – भाव मिटाएंहिय नया सवेरा लाकर।भाईचारे की पाठ पढ़नाप्रेम से मीठा बोलोप्रीत की बगिया हरी – भरी होमन में मिश्री तो धोलो।स्वरचित मौलिक – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दुबाढ़ – पटना9661065930 किसानधरती के भगवान को, आओ नमन हम कर लेंइस उपवन के बगिया को, फिर से चमन हम कर लें।खेतों की हरियाली तुमसेगेहूं – धान की बाली तुमसे।अन्नदाता किसान तुम्हीं होखरा इक इंसान तुम्हीं हो।।इनके स्वाभिमान को, मिलके जतन हम कर लेंइस उपवन के बगिया को, फिर से चमन हम कर लें।आत्मदाह की बात न करनासाथ हम तेरे तुम न डरना।हर मुसीबत साथ हैं तेरेसूखे में भी पाथ हैं तेरे।।इनके हम अनुदान को, अब सत्य कथन हम कर लेंइस उपवन के बगिया को, फिर से चमन हम कर लें।बीच का वो दलाल मस्त हैआदम, आदमी से त्रस्त है।नेता – खाकी गोली देतेअपनों में सरकार पस्त है।इनके हम अभिमान को, ऐसे दफ़न हम कर लेंइस उपवन के बगिया को, फिर से चमन हम कर लें।कभी बाढ़ आँधी है सूखाइससे कभी उनका दिल दुखा।कभी मस्त है इनकी टोलीकभी परिवार सब है भूखा।इनके हम पहचान को, मिलके गठन तो कर लेंइस उपवन के बगिया को, फिर से चमन हम कर लें।

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  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 15/01/2020

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