बन्धुवर अब तो आ जा गांव !

बन्धुवर अब तो आ जा गांव !कवि आलोक पाण्डेय

    बन्धुवर अब तो आ जा गांव !

खोद रहे नित रेत माफिया नदिया की सब रेतीचर डाले हरियाली सारी धरती की सब खेती ।आम-पीपल-नीम-बरगद काट ले गए, लग रहे बबूल पर दांवबन्धुवर अब तो आ जा गांव !समरसता अब खो चुकी धर्म खतरे में घट रहास्वदेशी घुट रही घर में समाज देश भी बंट रहा ।भाई भाई को लूटे , सर्वत्र विघटन के पांवबन्धुवर अब तो आ जा गांव !होली और दशहरा में लोग हिल-मिल सब डोलेसारे झगड़े वैर भुला, प्रिय मधुर सरसमय बोले।दुर्लभ वह चौपाल हो गई और वह दुर्लभतम् भावबन्धुवर अब तो आ जा गांव !रामायण की कथा खो गई , खो गई बूढ़ी मां की अमर कहानी ,खो गये वीर शिवा पेशवा महाराणा, वीरांगना झांसी की रानी ।दुर्लभ वह संस्कार हो गए ,मिट रहे नित सभ्यता के नांव;बन्धुवर अब तो आ जा गांव !बिलख रही धरती सारी सिसक रही जननी प्यारीसिमट रही दुख की भारी ,तडप रही पग पग हारी ।खग-विहग , जलचर दुखिया आहत सब प्राणी , कहां एक भाव से ठांव ;बन्धुवर अब तो आ जा गांव !सुख रहे नदी सरोवर लूट रहे वन उपवनलूट रहा पर्वत धरा-व्योम ,लूट रहा हर क्षण यौवन ।स्वार्थ में परमारथ लूटे मिल रहे नित नए घाव ।बंधुवर अब तो आ जा गांव !हा-हा कार मचा निशिदिन क्रूरता का प्रतिरूप खड़ा,दगाबाज चहुं ओर लुटेरे हिंसा-पशुता का रूप अड़ा।नित द्रौपदी पर लगते कौरव पांडव के दांव ;बन्धुवर अब तो आ जा गांव !वन उपवन अब कहां हंसते वृक्ष लता गुल्म नहीं खिलते,सहस्त्रों गाय कटने पर भी वह शौर्य हुंकार नहीं दिखते ।कंपित कत्ल की धार खड़ी अवध्या , हाय! लेकर दैन्य भाव ;बंधुवर अब तो आ जा गांव !आकाश चांदनी विलसे , मलयाचल चोटी शिर सेकर रही विलाप वसुधा आक्रांत , करुण पुकार आहत स्वर से ।जलते छप्पर-छाजन आज , नहीं शांति सुस्थिरता की छांव !बन्धुवर अब तो आ जा गांव !वर्षों से शीतल सुरभित समीर व्यथित ,मुरझा रहे सुमन खिले बहु रीत ।हर सांझ सबेरे अनाचार , डूब रही सत्य की नाव ,बन्धुवर अब तो आ जा गांव !✍🏻 आलोक पाण्डेय(वाराणसी,भारतभूमि)

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  1. vijaykr811 vijaykr811 30/12/2019

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