मन की धरा – शिशिर मधुकर

माना उलफत है तुमको पर बातें भी तो करा करो सूख रहा है देखो सहरा आ कर इसको हरा करो मतलब की दुनिया है सारी तुमको भी मालूम है ये बिना बात इसकी खातिर तुम इतना भी ना डरा करो प्रेम तलाशो प्रेम मिलेगा मैंने तो ये ही सीखा है बैठ किनारे प्रेम धार के मन का घट भी भरा करो तुम ना आए सालों बीते मायूसी का दौर बना तोड़ के बंधन सारे आओ महकी मन की धरा करो ए फूल तू छोड़ ना फितरत खिलने और खिलाने की अपने दीवानों की खातिर डाल छोड़ कर झरा करो शिशिर मधुकर

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