दोस्ती के सफ़र में

मैं था सिर्फ मैं ही थामेरे सिवा मेरे भीतर कोई नहीं रहता थापर अब तुम भी होतुमसे पहले कुछ तो अधूरा थाशायद तुमसे मिल कर ही जिसे होना पूरा थाक्या पता था,तुम ही वो थेजो मेरे हो सकते थेजब से तुम आयेसब ठीक होने लगा थातेरी उंगलियाँ पकड़ करमैं धीरे-धीरे खुद को जोड़ने लगा थातुम्हें कैसे बताऊँ,जब से तुम आयेवो खुदा भी मेरा सुनने लगा थामुझे पता नहीं था ,मैं तुम्हारे लिए इतना खास कब से हो गया थाऔर कैसे तुमने मुझेअपनी दोस्ती के लिए कुबूल कर लिया थादिसम्बर का महीना ही था ना वो जब मैंने खुद को मजबूत कर पहली बारपूछा था तुमसेक्या तुम मेरी दोस्त बनोगीमेरे साथ दोस्ती के सफर में चलोगीपर कहीं न कहीं मुझेडर भी लगता था क्यों कि अपनी किस्मत पर इतना भरोसाआखिर कैसे कर सकता थातुम्हें पाने से पहले ,तुम्हें खोने का डर सताने लगा थापर अब सब अच्छा हो चला हैऔर हम दोनों साथ-साथ निकल पड़े हैदोस्ती के सफ़र में—-अभिषेक राजहंस

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  1. deveshdixit DEVESH DIXIT 17/01/2020

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