चाँद, आज आना जरूर

ऐ चाँद,सुनो ना..सुन सकते हो क्या मेरीतुम यूँ हर रोज आसमां मेंक्यों आते रहते होक्या किसी को निहारने आते होया फिर तुम्हें भी किसी का इंतज़ार रहता हैबचपन से देखता आया हूँतुम हर रोज ही शाम ढले आते होऔर सुबह होते ही चुपके सेचले भी जाते होमैं जब भी ढूंढने जाता हूँ तुम्हेंसूरज की रौशनी मेंतुम कहीं दिख ही नहीं पाते होक्या तुम मुझे कुछ कहना चाहते होपर कह नहीं पाते होजैसे मैं भी कह नहीं पाताअपने जज्बात किसी सेऐ चाँद ,आज आओ नामेरे छत परदिसम्बर की सर्द रात मेंआसमां से लटके-लटके तुम भी तो ठिठुर गए होगेदो प्याली चाय पीते है अदरक वालीऔर सुनाते हैं इक दूसरे कोअपनी-अपनी कहानीतुम भी अपने दर्द बाँटनामैं भी अपने गम साझा करूँगातुम बताना की क्या हुआ तुम्हारे साथ ऐसाजो तुम हर रोज थोड़ा-थोड़ा घटते जाते होक्या तुम्हें भी मेरी तरह का गमरोज-रोज मारता हैक्या तुम्हारे आँसू भी बह-बह कर तुम्हें सिमटाने लगते हैंऔर फिर एक रात तुम खुद को आसमां से गायब ही कर देते होऔर ये तुम सूरज से अपना मुंह क्यों छिपाते होआज आना जरूरऔर बताना जरूरक्या तुम्हारा भी कोई अपना तुमसे रूठ गया हैया तुम्हारा भी साथ किसी से छूट गया हैऐ चाँद,मेरे चाँदआज आना जरूर—-अभिषेक राजहंस

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