‘‘कट रहे पेड़ हैं’’

कट रहे पेड़ हैंअनवरतचल रहे हैंचाबुकपर्यावरण पर जल रहे हैं जंगलबेबसी सेएक नन्हा सा पौधाजिसे किया था खड़ादेकर सहारादेखा था सामनेखुद से बड़ा होते हुएछू रहे थे नभ कोगोद में चहचहाती थी पक्षियाँ,शाखाएँ खाती हिलकोरेबलखाती, रिझातीतपते धूप और बारिस मेंआज पड़ी है धाराशायीबेजानरो रहे हैंसाथ बड़े हुए पौधेकह रही जैसे लोग आते हैंहमें डराते हैंबार-बारधमकाते हंैदिखाकर कुल्हाड़ीधारदारबस करो, बस करोअब, बस करो- नवीन कुमार ‘‘आर्यावर्ती’’

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2 Comments

  1. Sukhmangal singh 10/12/2019
    • Navin Kumar "Aryawarti" 20/12/2019

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