नूर कुदरत का – शिशिर मधुकर

जिंदगी को जीऊं कैसे मुझे अब तक ना आया है
मेरा घर तो मेरे अपनों ने ही हरदम जलाया है

टूटता हूं मैं भीतर से मगर कुछ भी नहीं कहता
दर्द शब्दों पे पीछे ही फकत मैंने छुपाया है

किसी को दोष भी मैं तो कभी कुछ दे नहीं सकता
रोग जीवन में ये अपने खुद ही मैंने लगाया है

जो अपने साथिया को बस खुदा सा मान ना देगा
वहां पे नूर कुदरत का नहीं होता नुमाया है

सफर में चल रहा हूं पर सुकूं कोई नहीं मिलता
बोझ ही बोझ मधुकर ने अपनी रूह पे उठाया है

शिशिर मधुकर

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4 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 05/12/2019
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 05/12/2019
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 05/12/2019
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 05/12/2019

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