भीड़

धोखा-धड़ी कीइस भीड़ में

नहीं मैंअकेला हूँ

और भी हैंकतार में

यही खुद को मैंसमझाता हूँ

चालाकी नहींखून मैं

अक्सर यही सोचताहूँ

स्थिति बड़ीबेहाल है

इसलिए अक्सरझल्लाता हूँ

सोच-सोच कर रहजाता मैं

कैसे अपनीव्यथा कहूँ

मन बहुत हीपरेशान है

फिर भी दिल कोबहलाता हूँ

अत्यधिक जबउलझ जाता मैं

तब कविता लिखलेता हूँ

कलम तो पैनी धारहै

इसी से सारबनाता हूँ

धोखा-धड़ी कीइस भीड़ में

नहीं मैंअकेला हूँ

और भी हैंकतार में

यही खुद को मैंसमझाता हूँ

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देवेश दीक्षित

7982437710

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6 Comments

  1. C.M. Sharma 28/11/2019
  2. Shishir "Madhukar" 03/12/2019
  3. डी. के. निवातिया 05/12/2019
  4. DEVESH DIXIT 11/12/2019
  5. vijaykr811 30/12/2019
  6. DEVESH DIXIT 30/12/2019

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