ख्वाइशें – राकेश आर्यन

आंखों को बंद आंखों से देखता रहा रात भर
कुछ पुराने ख्वाबों की तफ्तीश कर रहा हो जैसे
नदी में कागज़ की कश्ती पर बैठा
लंफ्ज़ों की पतवार से खुद को ही ढूंढ रहा हो जैसे
कुछ ख्याल नज़र आया भी किनारे पर
लहरों ने लाकर अभी अभी फेंका हो जैसे
जगह जगह कटे फटे से ठिठुरते कुछ ख्वाब
धुंधली ख्वाइशों को…. इशारा कर रहा हो जैसे
किरदार जो हर खिले जजबात का हिस्सा था कभी
आज मुख़्तलिफ़ नज़रों में… कुछ हया समेट रहा हो जैसे
सब हैं चारो ओर, तन्हाइयों से करार फिर भी ऐसा है
भीड़ में बैठा हुआ ये मन….. शून्य खोज रहा हो जैसे
पुराने जिस्म में रूह कोई नई सी बस गई हो जैसे
एहसास जो उमड़ते थे कभी, लबों तक आके रुक गई हो जैसे
कच्चे दरख़्तों से कुछ निशानियाँ यूँ झाँक रही है मुझको
आंखें खोल कर मुझको जीना सीखा रही हो जैसे

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया 22/11/2019

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